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गाँव में

मूल लेखक : परशु प्रधान
मूल नेपाली से अनुवाद : कुमुद अधिकारी

 

अब गाँव शुरू हो रहा था। पर यहाँ शहर ही कब था  फिर भी यह गाँव अन्य गाँवों से बहुत अलग था। नाम मात्र की पगडन्डी जिस पर एक एक पग कठिनाई से आगे बढ़ता। पगडन्डी के दोनों तरफ बिच्छु के पेड़ की झाड़ियाँ थी। थोड़ा इधर उधर किया कि उनके डंक से जल जाने का भय। फिर पगडंडी गन्दगी से भरी पड़ी थी और चलने योग्य नहीं थी। गाँव में  काफी घासफूस की झाड़ियाँ होंगी, मेरी इस कल्पना को इस वक्त धोखा हुआ था। पेड़ की शाखाओं में छोटे छोटे गुच्छों के अलावा कुछ दिखाई नहीं दिया। जो जंगल और पेड़ थे वे शायद वर्षों पहले समाप्त हो गये थे और अब गाँव मरुस्थल बन रहा था। शायद इसलिए वहाँ तपती गर्मी थी। रास्ते के दोनों तरफ पत्थर के छतों वाले छोटे छोटे झोंपड़े दिखाई देते। पर उनके दरवाजे और खिड़कियाँ देखते ही मन कड़वा हो जाता। कैसे अन्दर घुसा जा सकता है इतने छोटे दरवाजे और खिड़कियों से ?

रास्ते में कुछ वृद्ध-वृद्धाएँ मिले जो मौत के कगार पर थे। उनके कपड़े देखते ही विरक्ती पैदा हो जाती। दस जगहों पर पैबन्द लगे वे कपड़े पन्द्रह बीस साल पुराने तो थे ही, शायद उन्हे धुले हुए भी बरसों हो गये थे। उनकी आँखों में विषाद की छाया से अलग कुछ न था। उन्हीं में से एक वृद्ध को मैंने पूछा, “आपकी उम्र क्या है?”

वह मुस्कराने की चेष्टा करने लगा। लेकिन न जाने क्यों असफल रहा। उसने वहाँ की स्थानीय भाषा में धीमी आवाज मे कुछ बातें कही। जो मैं समझ न सका। बस, मैं इतना समझ पाया की उसे अपनी उम्र याद नहीं।

मैं फिर आगे बढ़ गया - रास्ता प्राय: चढ़ाई वाला था। कहीं समतल रास्ता मिल जाता तो शरीर हलका महसूस होता। नहीं तो पूरा शरीर थकावट से चूर था। चढ़ाई में कुछ अधेड़ मिले। उनके डोको भी कुछ फर्क किस्म के थे।

"क्या ढो रहे हैं” मैने पूछा।

“चावल !!” जवाब आया।

“कितने दिनों से ढो रहे हैं?”

“हो गये पाँच-सात दिन।”

“इस गाँव में धान उगता नहीं क्या?”

“धान के लिए खेत नहीं हैं। सिर्फ थोड़ी गेहूँ की फसल होती है। हम लोग वही खाते हैं। यह चावल भी दशहरे के लिए जुगाड़ है।” वहाँ की स्थानीय भाषा में उसने कहा। मैं बस थोड़ा ही समझ सका।

आहिस्ता आहिस्ता मैं गाँव में घुस गया था। गाँव क्या था-दो चार पत्थर के झोंपड़े, मैले-कुचैले लड़के लड़कियाँ। पुराने और पैबन्द लगे उनके कपड़े। फिर उनके हाथ-पैर ऐसे मानो कुष्ठ रोग ने उन्हें जकड़ लिया हो। लगा जैसे वे हाथ-पैर गलने को हैं और वे मौत की तैयारी में हैं। मैंने एक वृद्ध को पूछा-

“क्या हुआ है इन बच्चों के पैरों में?”

“इन्हें पिस्सुओं ने काटा है हुजूर। यह कुष्ठ नहीं है।”

“पिस्सुओं को मार नहीं सकते क्या?” मैंने फिर पूछा। इस प्रश्न का जवाब उसके पास नहीं था। लेकिन उन लड़के लड़कियों की हाथ-पैर इतने गन्दे थे की मुझे उबकाई सी होने लगी। उन सबके पैर सूज गये थे, उन में मवाद भरा हुआ मालूम पड़ता था और वे चल भी नहीं सकते थे। स्कूल वहाँ से बहुत दूर था और वे स्कूल जाने की स्थिति में नहीं थे।

अब कुछ खाना जरूरी हो गया था। मैं बहुत भूखा अनुभव कर रहा था। लेकिन मुझ अकेले को खिलाने के लिए वहाँ बड़ी समस्या थी। गेहूँ के सूखे चपाती और नमक-मिर्च के अलावा वहाँ कुछ नहीं था। चावल ढूँढने के लिए भागदौड़ शुरू हो गयी। कुछेक घन्टों में खाना तो तैयार हो गया लेकिन मुश्किल से दाल-भात और नमक मिर्च। सब्जी भी खाने में आवश्यक है - इस बात की न वहाँ जानकारी थी न ही परम्परा।

दूसरे घर में एक औरत बहुत मुश्किल से रोटी बना रही थी। मुझे लगा कि वह बहुत बीमार है। रोटी खाने के लिए वह जीवन से संघर्ष कर रही थी। कुछ दूरी में एक छोटा बच्चा रो रहा था। वह चार हाथ पैर पर खड़े होकर जोर लगा रही थी जैसे एक और बच्चा जनने वाली हो। लेकिन वैसा कुछ न था। उसने आज ही बच्चा जना था और किसी और से खाना न बनवाने की वहाँ की प्रचलन की शिकार हुई थी। वह खुद ही खाना बनाने को बाध्य थी और कल से ही उसे गेहूँ की फसल काटने के लिए जाना था। मुझे लगा आज ही वह बच्चा मर जाएगा, उसे भवसागर से मुक्ति मिल जाएगी। जब वह असमर्थ होती दहाड़े मार कर रोती, बिलखती और चिल्लाती। मैंने माथे पर हाथ रखकर परमेश्वर को याद किया।

गाँव में तरुण तरुणी कोई दिखाई नहीं दिए। शायद कोई जात्रा व पर्व में दिखाई पड़ें। औरतों के वक्षस्थल मुरझा गए थे। उनके शरीर में यौवन की कोई निशानी नहीं थी। 25-30 की औरतें 50-60 की और बेहद गन्दी लगतीं। उन्हें अपने शरीर के बारे में कुछ ज्ञान नहीं था। वे बच्चे जनने के लिए जन्मीं थीं। उन्हें जीने की चाह नहीं थी। उनकी आँखों में मात्र सन्त्रास की परछाइयाँ खेलती दिखाई देतीं जिन में आकाँक्षाएँ, भावनाएँ और सपनों के पौधे नहीं होते। क्या वे औरतें ही हैं, मैं वैसा ही कुछ सोचता रहा, बहुत देर तक।

मुझे और भी दूर जाना था। रास्ते में अनेक ऐसे गाँव आते और पीछे छूट जाते। मुझे लगता वे गाँव नहीं हैं, सिर्फ मुर्दों की बस्तियाँ है। वहाँ कोई जीवन नहीं था, उत्साह व उमंग का वातावरण मीलों परे था। लगता था गाँव में अभी-अभी लड़ाई छिड़कर थमी है। सिर्फ ऊँचे ऊँचे नंगे पहाड़ थे वहाँ। कोई हरा पौधा मिलना बहुत मुश्किल था, न कोई झरना, न जल प्रवाह। शाम होने को आई थी और मैं जल्दी में था। लेकिन मेरे पैर नाकाम हो रहे थे। मैं अपने को बहुत थका हुआ महसूस कर रहा था। मैं चाह रहा था, कहीं जाके आराम करूँ और शान्ति से रात काटूँ। मेरा मन बहुत उदास और हताश था।

रास्ते में कुछ बदलाव नहीं हुआ  वही तंग पगडन्डी, बिच्छु के पेड़ के झुरमुट और गँदगी। जहाँ कहीं दुर्गन्ध ही दुर्गन्ध। फिर रास्ते में कड़े व नुकीले पत्थर थे जिनपर पैर रखने पर ऐसा लगता मानो अंगारों पे चल रहे हों। मैं वहाँ से दूर खड़ी सेती हिमाल देखने की चाह में था, लेकिन वह हिमाल वहाँ नजदीक तो था नहीं। और मुझे बहुत जल्दी थी क्योंकि रात होने को आई थी। रात में अच्छी जगह कहीं मिलेगी सोने की, यही सोचकर मैं आगे बढ़ता रहा।

रास्ते में दो चार लोग नीचे उतर रहे थे, वे सब पिये हुये थे और उनके पैर डगमगा रहे थे। उन लोगों के बीच में कोई झगड़ा भी चल रहा था, शायद ताश के कारण हो। वे स्थानीय भाषा में चिल्ला रहे थे जो मैं नहीं समझता था। वे मुझे रोकने की कोशिश करने लगे। लेकिन मैं उनको छलकर दूसरे रास्ते की तरफ हो लिया। मुझे मालूम था वे दिनभर रक्सी (देशी शराब) पीकर और ताश(जुवा) खेलकर लौटे हैं। अब उनका काम घर पहुँचकर अपनी औरत को मारना था।

दूसरा रास्ता और भी कठिन था। मैं सशंकित हो रहा था कहीं मैं सही जगह पर पहुँचूँगा भी या नहीं। लेकिन मुझे जैसे भी हो पहुँचना ही था। इस रास्ते में बिच्छु की झाड़ियाँ कुछ अधिक ही थीं। एक बिच्छु के झाड़ में एक औरत दिखाई पड़ी। वह एक चिमटा लेकर जल्दी जल्दी बिच्छु की कलियाँ चुन रही थी। अब रात होने को आई थी। मैं उसके नजदीक पहुँचा और बिन पूछे न रह सका

“बहन, क्या कर रही हैं ?

“बिच्छु की कलियाँ चुन रही हूँ।” वह जल्दी में थी।

“क्यों चुन रही हैं?”

“हमारे लिए खाने को सिर्फ यही है। और कुछ नहीं है।” उसने अपनी विवशता प्रकट की।

“क्यों, गेहूँ नहीं होता क्या?”  

“ना...” वह शरमा रही थी, लेकिन शरमाने जैसी बात कोई नहीं थी। मुझे मालूम था वे सिर्फ बिच्छु के पेड़ की कलियाँ ही खाते हैं। वह थोड़ी समझदार लगी मुझे। मैने फिर पूछा

“इस गाँव में आप लोगों को क्या-क्या चाहिए?”

“.........” वह नहीं समझी।

“आप नहीं समझी - आपको पानी, रास्ता, स्कूल में से किस चीज की ज्यादा जरूरत है”  - मैंने उसे फिर स्पष्ट करते हुए पूछा।

“हमें कुछ नहीं चाहिए।” उसका छोटा जवाब था।

मुझे उससे बातें करना अच्छा लग रहा था। लगा वह कहीं बाहर होकर आई है। क्योंकि उसकी भाषा में थोड़ी ही सही स्पष्टता थी।

फिर भी..... मैंने जोर लगाया।

“हम लोगों को बिच्छु के पेड़ की कलियाँ तक भगवान ने नहीं बक्सा। एक किस्म का कीड़ा इसे नष्ट कर रहा है। सारे पेड़ में कीड़े पड़ जाते हैं, पत्ते तक नहीं रहते। हमें सिर्फ काँटें मिलती हैं खाने को”..... वह रुआँसी हो गयी।

फिर ......

“आप हमें वह दवा दीजिए जो इन कीड़ों को मार सकें....हमारी जरूरत बस इतनी है।” वह जाने की जल्दी में थी।

“और कुछ नहीं चाहिए.....?

“कुछ नहीं.......”

जब मैंने आँखें खोली तो वह वहाँ से निकल चुकी थी। मैं बहुत देर तक सोचता रहा, सोचता रहा और फिर आहिस्ता आहिस्ता चढ़ाई चढ़ने लगा।

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