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22 - किंग

5 मई 2003

कनाडा पहुँचने से पहले ही बेटे ने एक किंग ख़रीदा था। था। देखने में बड़ा सुंदर और शक्तिशाली!। जैसा नाम वैसा ही काम- इतना मज़बूत कि 10 मोटे–ताज़े भी उस पर चढ़ जाएँ तो थकने का नाम नहीं। आप बड़े असमंजस में होंगे कि यह कैसा किंग है! चलिए राज़ की बात बता ही दूँ। असल में यह एक किंग साइज्ज़ पलंग है। यह मुझे बेहद पसंद है। इसलिए नहीं कि उसका मूल्य डेढ़ लाख है बल्कि इसलिए कि मोटे-मोटे डबल गद्दे वाले पलंग पर मैचिंग तकिये, लिहाफ़ चादर– कुल मिलाकर राजसी छ्टा बिखरी पड़ती है।

चाँद का दोस्त तुषार भी पलंग की तलाश में था। ख़रीदने से पहले उसने इस किंग से मिलना ठीक समझा और एक दिन अपनी माँ के साथ हमारे घर आन पहुँचा।

वे तो उस भव्य पलंग की शान देख निहाल हो गईं और बोली- “बेटा, तू तो आँख मींचकर ऐसा ही पलंग ख़रीद ले। कम से कम आख़िरी दिनों में तो मेरे दिल की एकमात्र इच्छा पूरी हो जाए।“

“-माँ इतना उतावलापन ठीक नहीं। मुझे सोचने–समझने का मौक़ा तो दो।“

“अरे क्या सोचना? तेरे डैडी ने तो कभी मेरी इच्छा के बारे में सोचा ही नहीं और तू, तू बस सोचता ही रह जाएगा।“

तुषार से कुछ कहते नहीं बन रहा था। ऐसी नाज़ुक स्थिति से उसे बचाने के लिए मैं उसकी माँ को लेकर डाइनिंग रूम में ले गई।

एकांत पाकर वे तो पूरी तरह बिखर ही पड़ीं। ऐसा लगा बहुत दिनों का दबा लावा फूटकर बाहर आना चाहता है।

“बहन जी, रिटायरमेंट के बाद इन्होंने नया घर ख़रीदा और मेरी दिली इच्छा थी कि गृह प्रवेश से पहले एक ख़ूबसूरत पलंग ख़रीदकर कमरे को सजाऊँ पर तक़दीर की मारी – मेरे घर में दाख़िल होने से पहले ही राक्षसनुमा पलंग ने आसान जमा लिया था। इनका कोई दोस्त उसे बेचकर अमेरिका जा रहा था और उनको वह भा गया। बोले – इसकी लकड़ी बहुत अच्छी है। बाज़ार ख़रीदने जाओ तो दुगुने दाम में पड़ेगा। मैं मन मसोस कर रह गई।

इस बात को तीन साल हो गए लेकिन आज भी जब तब महसूस होता है कि कोई इस पर करवटें बदल रहा है। कभी खिल्ली उड़ाने की आवाज़ें आती हैं— हा—हा—हमारे इस्तेमाल किए पलंग पर सो रहे हो। तुम दोयम दर्जे के हो -दोयम दर्जे के। हा—हा-।

यह आवाज मेरे कानों में शीशा सा पिघला देती है जिसकी यंत्रणा का कोई अंत नहीं। हर रात अतीत की ढेरी से एक चिंगारी निकलकर मुझे अंदर से झुलस जाती है। एक ही बात उस समय जेहन में आती है – इस पलंग को बदलना है। कभी-कभी अपने भीतर उमड़ते तूफ़ान से विचलित हो दूसरे कमरे में सोने का उपक्रम करती हूँ लेकिन क्या सो पाती हूँ? एक बार मेरे पति ने इस चहलक़दमी का कारण पूछा। समझाने पर भी मेरी अनुभूतियों की गहराई में न उतर सके।“

भावुक दिल की भड़ास निकाल कर वे कुछ शांत हुईं पर उनकी आँखें आँसुओं से लबालब थीं जो पनपते विक्षोभ को सम्हाले हुए थीं।

“आप अपने को सँभालिए। ज़िंदगी कभी-कभी ऐसे गुल खिलाती है कि उस पर हमारा वश नहीं,” मैंने उन्हें सांत्वना देने की कोशिश की।

“क्या मेरे जैसे दोयम दर्जे के और लोग भी हैं या मेरे साथ ही ऐसा होता है,” आहत सी बोलीं।

“ऐसी बात नहीं,किसी के साथ भी ऐसा घट सकता है।“ मेरी यादों में एक क़िस्सा उभर कर आ रहा है। हाँ याद आया— मैंने वह क़िस्सा अपनी चाची से सुना था।

वे कहा करती थीं – “हमारे पड़ोस में एक लड़की लीला रहती थी। उसकी माँ के मरने के बाद पिता ने दूसरी शादी कर ली। कुछ समय बाद ही लीला की नई माँ दो बच्चों की माँ बन गई। काम के बोझ के कारण लीला की उसने पढ़ाई छुड़वा दी और रात-दिन उसे घर के काम में जोत दिया। मुसीबतों और कष्टों की भरमार ने उसे समय से पहले ही बड़ा कर दिया।

छोटी बहन की शादी हो गई पर लीला की शादी माँ ने नहीं होने दी। उसकी शादी करने से मुफ़्त की नौकरानी हाथ से जो निकल जाती। पर शादी के दो साल के बाद ही छोटी बहन की मृत्यु हो गई। उसके 6 मास के दूधमुँहे बच्चे को लीला सीने से चिपकाए रहती। अचानक सौतेली माँ की जीभ से कंटीली झाड़ियाँ न जाने कहाँ ग़ायब हो गईं और उससे फूल झरने लगे। लीला के खान-पान और आराम का ध्यान रखा जाने लगा। एक दिन सुनने में आया उसकी शादी उसकी मृत बहन के पति से होने वाली है। ताकि घर का जमाई, जमाई ही बना रहे और एक बच्चे को माँ मिल जाए। यहाँ भी उसे बहन की उतरन ही मिल रही थी। यह लीला की बर्दाश्त से बाहर था। उसने उसी रात घर छोड़ दिया।”

“लीला क़िस्मत वाली थी जो उसे बहन की उतरन से छुटकारा मिल गया। मेरे तो दूसरे का इस्तेमाल किया पलंग अभी तक चिपका हुआ है। होगा एक समय जब वह किंग साइज़ पलंग किंग सा लगता होगा पर अब तो लुंजू–पुंजू थका-थका सा हो गया है। उस पर बैठते ही मेरी उम्र में 10 साल जुड़ जाते हैं और उसी की तरह जीर्ण–शीर्ण थरथराता कंपायमान मेरे अंग अंग में समा जाता है।”
अपनी वेदना व्यक्त कर वे तो हलकापन महसूस करने लगीं पर उसका हलाहल मेरे गले से न उतर सका।

क्रमशः-

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