अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

संशय

घर में घुसते ही सुदीप ने पूछा -

"क्यों रमा वह कौन था, जो बस में तुम्हें नमस्ते कर रहा था?"

"मुझे नहीं पता।"

"उसने तुम्हें नमस्ते की। ऐसे कोई किसी को नमस्ते करता है?"

रमा को हँसी आ गई - "पता नहीं कौन है। मुझे खुद ताज्जुब होता है।"

"हाँ, पिछली बार भी की थी, मैं तो वहीं खड़ा-खड़ा देख रहा था।"

"हाँ, मुझे मालूम है। तुम मेरे साथ ही थे।"

"मुझे तो कभी नहीं करता।"

"अच्छा! हो सकता है। मैंने ध्यान नहीं दिया।"

कुछ दिन बाद फिर वही। वह बस में मिला उसने रमा को देखा फौरन नमस्ते की।

"आज फिर उसने तुम्हें नमस्ते की?"

"हाँ।"

"और तुमने जवाब दिया?"

"कोई नमस्ते करे, तो जवाब कैसे न दूँ?"

"हुँह, न जान न पहचान। फिर नमस्ते का क्या मतलब?"

"जब कोई नमस्ते कर रहा है तो जवाब में अपने सिर हिल जाता है। आदत ही ऐसी पड़ी है। न करूँ तो बड़ा अजीब लगेगा।"

"अजीब क्या? और जब वह अकेली तुम्हें नमस्ते करता है, मैं उल्लू सा खड़ा देखता रहता हूँ, तब तुम्हें अजीब नहीं लगता?"

चौथे-पाँचवें दन फिर वही।

बस में सवार होते ही देखा वह बैठा है।

एकदम रमा को हाथ जोड़े। रमा के पीछे सुदीप आगे-पीछे हो रहा है, फिर रमा के कंधे पर हाथ रख जताने की चेष्टा की कि वह भी उपस्थित है। तब तक वह खिड़की से बाहर देखने लगा था।

 बस से उतरते ही सुदीप ने कहा-  "देखा?"

सुधा ने इधर-उधर देखा - "क्या?"

"आज फिर उसने नमस्ते की और सिर्फ़ तुम्हें। जब कि साथ में मैं भी था।"

 "अच्छा,  की होगी। तुम पीछे थे मैंने देखा नहीं।"

"अच्छा क्या? तुम भी तो खूब मुस्करा कर जवाब देती हो उसे। तभी तो हिम्मत बढ़ रही है उसकी।

"कैसी बातें करते हो। तुम तो पीछे थे, तुमने कैसे देख लिया मैं मुस्करा रही हूँ?"

"साइड से अन्दाज़ नहीं मिलता जैसे। कैसे बन रही हो जैसे तुम्हें पता ही नहीं। तम्हें मज़ा आता है। और मुझे वह बिल्कुल अच्छा नहीं लगता।"

"अच्छा-बुरा लगने का सवाल ही कहाँ? न हम लोग उसे जानते हैं न उससे कोई मतलब है।"

"कम से कम मैं तो नहीं जानता। तुम्हारी तुम जानो। और मतलब कैसे नहीं?"

फिर उसने और जोड़ दिया - "जानती नहीं तो उसकी हिम्मत कैसे बढ़ती?"

"हिम्मत से क्या मतलब तुम्हारा?"

"किसी अनजान महिला को इस तरह नमस्ते करना!"

"हो सकता है वह मुझे जानता हो, मुझे ध्यान न आ रहा हो।"

"और सिर्फ़ तुम्हें ! हर बार.. तुम्हारा ही ध्यान है उसे? वह भी जब पति साथ में हो?"

"उफ़्ओह, तुम तो तिल का ताड़ बनाते हो।"

"तुम तो ऐसे कहोगी ही।"

"बेकार बात मत करो ! जानती होती तो छिपाने से मुझे क्या फ़ायदा? जैसे और पचास लोगों को जानती हूँ, उसे भी जानने से क्या फ़र्क पड़ता !"

"अच्छा-अच्छा रहने दो। अब इतनी भी सफ़ाई देने की क्या ज़रूरत है?"

 
सुदीप कुछ खिंचा-खिंचा सा रहता है, और काफी गंभीर भी।

कुछ दिन बाद सब सहज हो गया।

पर उस दिन फिर -

सुदीप और रमा खरीदारी कर रहे थे, कि सुदीप के कानों में रमा की आवाज़ पड़ी -"अरे, वह यहाँ है।"

सुदीप भी उसकी ओर देखने लगा और उसने झट से रमा की ओर हाथ जोड़ दिये  -सिर्फ़ रमा को। रमा ने सिर झुका कर प्रत्य्त्तुर दिया।

सुदीप का चेहरा कठोर हो गया।

*** 2

बस में जगह नहीं एक हाथ में बंडल पकड़े कोहनी में पर्स लटकाये, दूसरे से ऊपर का रॉड थामे रमा बार-बार हिचकोले खा रही है।

दोनो में से किसी ने देखा नहीं पाया कि उधर वह बैठा हुआ है।

वह तुरंत अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ, रमा से बोला "आप यहाँ बैठ जाइये।"

रमा ने एक क्षण सोचा नहीं बैठूँगी तो उसका अपमान होगा सबके सामने। और ऐसे हिचकोले खाते लोगों से टकराते रहना ! यह तो औऱ भी तमाशा बनना है।

वह बंडल सम्हाले छड़ का सहारा लेती हुई, उसकी सीट पर जा कर बैठ गई - "बहुत बहुत धन्यवाद !"

सुदीप के चेहरे पर तनाब की रेखायें खिंच गईं।

भीड़ बढ़ती जा रही है। पर रमा ने सुदीप की प्रतिक्रिया देख ली।

सोच रही थी ऐसे तो अनजाने आदमी भी महिलाओं को सीट दे देते हैं। क्या बैठने से मना कर देती? कोई खास बात तो है नहीं। पर सुदीप?

मन में क्या है साफ़-साफ़ नहीं कहेगा। निगाहों से बता देगा और व्यवहार से कोंचता रहेगा।

सीट देनेवाला जाने कहाँ उतर गया। सुदीप को भी बैठने को जगह मिल गई है।

आगे -पीछे लोग खड़े हैं। रमा अपने ही सोच में कि पीछे से तुर्श आवाज़ आई - "उतरना भी भूल गईँ क्या?"

वह चौंक कर उठ खड़ी हुई।

चुपचाप घर पहुँचे, चुपचाप खाना हुआ।

अंत में सुदीप ने कहा- "देखो रमा बात हद से आगे जा रही है।"

"क्या मतलब है तुम्हारा?"

"अब भी मतलब पूछ रही हो? जैसे समझती नहीं हो।"

"क्या कहना चाहते हो, साफ-साफ़ कहो।"

"ज्यादा भोली मत बनो ! कैसे उठ कर उसने जगह दी, कैसे प्यार से तुमने धन्यवाद दिया। मैं भी तो खड़ा था मेरी तरफ़ देखा भी नहीं।"

"हिचकोले खाती महिलाओं को भले लोग अक्सर अपनी सीट दे देते हैं।"

 "तो वह भला लोग भी हो गया। बस में भी जब मिलता है, अकेली तुम्हें नमस्ते। बेशर्म कहीं का ! मैं साथ में हूँ पर उसके लिये तुम्ही सब कुछ। मैं तो कुछ हूँ ही नहीं जैसे। और तुम्हें इसमें मज़ा आता है।"

"बात का बतंगड़ मत बनाओ। उसके जगह देने पर उठने पर न बैठना तो असभ्यता होती। बस में तमाशा करना मुझे ठीक नहीं लगा।"

"और धन्यवाद देने के बहाने बोलना भी जरूरी था। एक बार मना कर देतीं आगे उसकी हिम्मत नहीं पड़ती। न नमस्ते करने की न कुछ और की।"

"मैं कोई गँवार औरत नहीं हूँ जो साधारण सी औपचारिकता भी न निभा सकूँ।"

"गँवार नहीं हो शहर की पढ़ी-लिखी हो इसीलये तो ज्यादा कलाकार बनती हो।"

"बस करो सुदीप ! इससे ज्यादा सुनना मेरे बस का नहीं।"

"तो क्या करोगी, बुला लोगी उसे, चली जाओगी उसके पास?"

"बात मत बढ़ाओ। जब तक कोई सुबूत न हो बेकार तोहमत मत लगाओ।"

"तोहमत? सुबूत? सामने -सामने सब हो रहा है।"

रमा की समझ में नहीं आता कैसे सुदीप को विश्वास दिलाये कि वह उसे जानती तक नहीं। वह हमेशा नमस्ते ही तो करता है। क्या करूँ मैं?

उत्तर में अनदेखी करना उससे नहीं होता अपने आप सिर हिल जाता है। कहीं कुछ ऐसा नहीं जो मन को खटके। वह खाली रमा को नमस्ते करता है तो रमा क्या करे? लौट कर कहे कि इन्हें भी नमस्ते करो, ये मेरे पति हैं?

और चार दिन निकल गये। सुदीप गंभीर रहने लगा। आपस में बस जरूरी बातें।

** 3

उस दिन काम से लौटा तो बड़ा खुश था। सीटी बजाता घर में घुसा। गुनगुनाता रहा।

चलो ठीक हो गये रमा ने सोचा।

सुदीप ने ही चुप्पी तोड़ी -

"रमा, तुमने उसे कभी अपने घर में देखा था? वही जो तुम्हें नमस्ते करता है।"

अब यह कैसी बात?

"पिता जी के पास कॉलेज के इतने लड़के आते हैं। मैं किसे-किसे देखती फिरूँ?"

"हूँ। ठीक है।"

"देखो,  मैंने एक बार कह दिया कि मैं उसे नहीं जानती। अब तुम नई-नई बातें मत निकालो।"

"हाँ हाँ, तुम कैसे जानोगी उसे?"

"यह कैसी टेढ़ी बात? क्या मतलब है सुदीप?"

रमा को बड़ा अजीब लग रहा था।

सुदीप कहने लगा, "तुम्हारे पिता जी का स्टूडेंट रहा है वह। दो-एक बार तुम्हारे घर गया तभी देखा था उसने तुम्हें।"

"अच्छा !"

"आज पता चल गया।"

"क्या?"

"कि वह कौन है।"

 "कैसे पता चला?"

"मुझे मिल गया था। तुम्हारे भाई के साथ था। उसने परिचय कराया। बात-चीत होने लगी। मैने कहा बस में कई बार आपको देखा है। कौन सी बस में यह भी बताया।

उसने कहा उस बस से तो वह अक्सर जाता है।

"मैंने कहा उस बस में मैं भी होता हूँ कभी-कभी अपनी पत्नी के साथ। पर आपको कभी मेरी ओर देखने की फ़ुर्सत कहाँ होती है?"

"पर आप कब मिले मुझे?"

फिर मैने याद दिलाई। बस की बात भी, अपनी सीट दे देने की बात।

"फिर बताया   -वही है मेरी पत्नी रमा !

"तो आप उनके पति हैं।"

"पता होता रमा बहन के पति हैं तब तो ..ध्यान जाता। आपको तो आज जाना है।"

"अब समय आ गया है मिलने का। उसने एकदम कहा -हाँ मैं तो आनेवाला था दीदी को निमंत्रण देने।"

"मैंने पूछा औऱ मैं? मुझे निमंत्रण भी नहीं? "

फिर उसी ने बताया मुझे- "हाँ रमा, अगले हफ़्ते उसकी शादी है। बहन का रोल तुम्हें ही निभाना है।"

रमा बल्कुल चुप रही।

*** 4

रमा बड़ी चुप-सी है। सुदीप बार-बार बात निकालता है।

"मैने तो सोच लिया था किसी तरह पता करना है कि ये है कौन। फिर मौका भी खूब लग गया। असल में कैंटीन में तुम्हारा भाई मिला था। और यह उसके साथ था।"

"तो तुमने सबसे पहले उससे क्या पूछा?"

"मैंने कहा मैंने कई बार आपको बस में देखा है। पहले सोचा कह दूँ मेरी बीवी से परचित हो मुझसे नहीं, पर कहा नहीं। और अच्छा हुआ जो नहीं कहा। नहीं तो वह क्या सोचता!"

"हाँ, वह क्या सोचता उसकी इतनी चिन्ता है, और मैं क्या सोचती हूँ सका कुछ नहीं लगता तुम्हें? नहीं तो क्या मुझसे  इतना कहते रहते? कभी सोचा मैं क्या समझूँगी तुम्हें?"

"अरे, तुम्हारे समझने से क्या फ़रक पड़ता है? अब तुम्हारे साथ भी सोच-विचार कर बोलूँ? सही-गलत कुछ भी कह लूँ। पत्नी हो मेरी ! पर सुनो तो ..जब विकास ने परिचय कराया ...।"

"तो तुमने क्या कहा?"

मैंने पूछा था, "आप मेरी मिसेज़ को जानते है? "

वह बोला,  "आपको? आप कौन हैं मैं तो यह भी नहीं जानता उन्हें कैसे जानूँगा? "

"फिर मैने जब याद दिलाया - कहा मैं भी वहीं खड़ा था।

और जानती हो उसने क्या पूछा? पूछने लगा -आप रमा बहिन को जानते हैं?

कैसे नहीं जानूँगा, मुझे हँसी आ गई,  मैंने कहा,  अच्छी तरह जानता हूँ। पर आप कैसे? "

"विकास ने बताया, "हाँ क्यों नहीं जानेगा ! मेरे साथ प्रोफ़ेसर सा.. के यहाँ कई बार गया है।

वह बोला था -रमा बहन को जानता ही नहीं मानता भी हूँ। मुझे उनमें अपनी बहन दिखाई देती है।

"वो भी आपको जानती होंगी? "

"एकाध बार उनके घर गया था। कभी परिचय या बात की नौबत नहीं आई। वे जाने चाहे न जाने, मेरे गुरु की पुत्री हैं मेरे दोस्त की बहिन, इतना काफ़ी नहीं है क्या मेरे लिये? समय आने पर वह भी जान लेंगी।"

"मुझे हँसी आई, मैंने पूछ वह कैसे? आप तो  बस ं ही मिलते हैं? मैंने विकास से  भी कहा था। किसी दिन हमारे घर पर आओ।. इनको लेकर ।"

"अगर ये सफ़ाई तुम उससे नहीं माँगते तो क्या हो जाता?" रमा की आवाज़ जाने कैसी  हो गई थी।

"अरे, तो क्या फ़र्क पड़ गया ?"

"फ़र्क तुम्हें नहीं पड़ता, मुझे तो पड़ता है।"

"मैं सफ़ाई काहे को माँगता। वो तो बात पे बात निकलती गई। उसकी बहन दो साल हुये एक्साडेन्ट में मर गई। उसे लगता है वह तुम्हारे जैसी थी।"

"तो तुम्हारा समाधान हो गया? अब तो तुम खुश हो?"

"अरे, निश्चिंत हो गया मैं तो ! .खुशी- नाराज़गी की बात ही क्या ! जब पता नहीं हो तो मन में कितनी तरह की बातें आती है - यह तो आदमी का दिमाग़ है।"

"हाँ, आदमी का दिमाग़ ! शक करना बहुत आसान है। प्रमाण पा कर विश्वास किया तो क्या किया?"

"तुम तो बात का बतंगड़ बनाती हो। पता लगाने में क्या हर्ज?"

"तुमने मुझमें कोई दुर्बलता या उसमें कोई कुत्सा देखी जो तुम्हारे मन में तमाम बातें....? "

"अब ये तो मन है। दस तरह की बातें होती हैं दुनिया में। सोचने में तो आती हैं ....?"

"तुम्हारे मन में अविश्वास था। उस पर तो था ही जिसे जानते तक नहीं,  लेकिन मुझ पर भी .?"

"अब तो सब साफ़ हो गया।"

"जासूसी पूरी कर ली, जब कोई कारण नहीं मिला तो मजबूर हो कर ..।"

"तो क्या हुआ? मेरा मन बहुत हल्का हो गया।"

"पर वह बोझ मेरे मन पर आ गया। अगर मैं कहती वह मेरा प्रेमी है तो तुम मान लेते? विश्वास कर लेते कि वह मेरा यार है।"

"यह मैं कब कह रहा हूँ। पर पिछली कई बार से जो देखता रहा चुभा करता था मुझे।"

रमा चुप है।

"अब जब सब ठीक हो गया तो तुम बेकार तमाशा कर रही हो !"

"मैं तुमसे तो कुछ कह नहीं रही।"

"तुम्हारे मन में गुस्सा है, कहती नहीं तो क्या हुआ।"

फिर वह रमा को समझाने लगा -

 "अरे, क्या फ़र्क पड़ता है वह तो वैसे भी अपने घर आता। उसकी शादी होनेवाली है, बहिन रही नहीं तुम्हें ही तो बुलायेगा उसने कहा है?"

सुदीप हँसने लगा, "उसने क्या कहा पता है  -हम तो आपके बुलाने से पहले ही निमंत्रण-पत्र ले कर आनेवाले थे।"

"सब कुछ जानने के बाद बुलाया था तुमने न?"

"हाँ, तभी तो। पहले बुलाने की कौन सी तुक थी?"

"संशय तुम्हें व्याकुल  किये था अब तुम्हे चैन पड़ गया लेकिन मैं ....? "

"लेकिन -वेकिन क्या? मैं खुश हूँ तो तुम भी खुश रहो। फ़ालतू बातों से क्या फ़ायदा?"

रमा बिलकुल चुप है।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

......गिलहरी
|

सारे बच्चों से आगे न दौड़ो तो आँखों के सामने…

...और सत्संग चलता रहा
|

"संत सतगुरु इस धरती पर भगवान हैं। वे…

 जिज्ञासा
|

सुबह-सुबह अख़बार खोलते ही निधन वाले कालम…

 बेशर्म
|

थियेटर से बाहर निकलते ही, पूर्णिमा की नज़र…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता

कहानी

ललित निबन्ध

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

साहित्यिक आलेख

किशोर साहित्य कविता

बाल साहित्य कहानी

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं