रंजन कुमार मूलतः फ़ाइन आर्ट के स्नातक, एक संवेदनशील पोर्ट्रेट मेकर और जन्मजात स्टोरी टेलर हैं। उनकी रचनात्मक यात्रा चित्रकला और साहित्य—दोनों धाराओं में समान रूप से प्रवाहित होती रही हैं।
लेखन की शुरुआत उन्होंने 1959 में अपने प्रथम नाटक ‘औरंजेब’ से की। 1965 तक वे लगातार नाटक लेखन और मंचन से जुड़े रहे। 1970 में उन्होंने ‘अरेन्जमेंट’ नाटक का प्रकाशन किया तथा इसी वर्ष ‘डिफ़ेक्टिव’ नामक साप्ताहिक अख़बार का संपादन-प्रकाशन भी प्रारंभ किया—जो उनके सामाजिक और वैचारिक सरोकारों का प्रमाण है।
दीर्घ अंतराल के बाद 2005 से 2010 के बीच उनकी रचनात्मकता पुनः नए आयामों में प्रकट हुई। इस अवधि में दो कथा-संग्रह—‘चेहरे’ और ‘रूट बिज़ी’, तथा दो उपन्यास—‘अगिनदेहा’ और ‘कुँवर नटुआ दयाल’ (जो अंग की लोकगाथा ‘बहुरा गोढ़िन’ पर आधारित है) प्रकाशित हुए। साथ ही ‘अंगिका लोकसाहित्य’ जैसी महत्वपूर्ण आलोचनात्मक कृति ने उनकी वैचारिक दृष्टि को स्थापित किया।
इसके बाद रंजन कुमार ने स्वयं को नवोदित रचनाकारों के मार्गदर्शक और उत्प्रेरक के रूप में समर्पित किया, जबकि उनकी चित्रकला—विशेषतः पोर्ट्रेट निर्माण—निरंतर चलती रही।
2025 में उन्होंने लेखन में पुनः सक्रिय होकर लघुकथा और आलोचना के क्षेत्र में सशक्त उपस्थिति दर्ज की।
रंजन कुमार की रचनात्मकता का मूल आधार अनुभव, संवेदना और लोक-चेतना है। वे उन विरल सर्जकों में हैं जिनके लिए कला और जीवन अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के विस्तार हैं।
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