अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

रंजन कुमार

रंजन कुमार मूलतः फ़ाइन आर्ट के स्नातक, एक संवेदनशील पोर्ट्रेट मेकर और जन्मजात स्टोरी टेलर हैं। उनकी रचनात्मक यात्रा चित्रकला और साहित्य—दोनों धाराओं में समान रूप से प्रवाहित होती रही हैं।

लेखन की शुरुआत उन्होंने 1959 में अपने प्रथम नाटक ‘औरंजेब’ से की। 1965 तक वे लगातार नाटक लेखन और मंचन से जुड़े रहे। 1970 में उन्होंने ‘अरेन्जमेंट’ नाटक का प्रकाशन किया तथा इसी वर्ष ‘डिफ़ेक्टिव’ नामक साप्ताहिक अख़बार का संपादन-प्रकाशन भी प्रारंभ किया—जो उनके सामाजिक और वैचारिक सरोकारों का प्रमाण है।

दीर्घ अंतराल के बाद 2005 से 2010 के बीच उनकी रचनात्मकता पुनः नए आयामों में प्रकट हुई। इस अवधि में दो कथा-संग्रह—‘चेहरे’ और ‘रूट बिज़ी’, तथा दो उपन्यास—‘अगिनदेहा’ और ‘कुँवर नटुआ दयाल’ (जो अंग की लोकगाथा ‘बहुरा गोढ़िन’ पर आधारित है) प्रकाशित हुए। साथ ही ‘अंगिका लोकसाहित्य’ जैसी महत्वपूर्ण आलोचनात्मक कृति ने उनकी वैचारिक दृष्टि को स्थापित किया।

इसके बाद रंजन कुमार ने स्वयं को नवोदित रचनाकारों के मार्गदर्शक और उत्प्रेरक के रूप में समर्पित किया, जबकि उनकी चित्रकला—विशेषतः पोर्ट्रेट निर्माण—निरंतर चलती रही।

2025 में उन्होंने लेखन में पुनः सक्रिय होकर लघुकथा और आलोचना के क्षेत्र में सशक्त उपस्थिति दर्ज की।

रंजन कुमार की रचनात्मकता का मूल आधार अनुभव, संवेदना और लोक-चेतना है। वे उन विरल सर्जकों में हैं जिनके लिए कला और जीवन अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के विस्तार हैं।

लेखक की कृतियाँ

पत्र

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं