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कोरोना का भय, मृत्यु और योग

मृत्यु तो संसार में सभी की होती है परन्तु कोई मरना नहीं चाहता। संसार में सर्वाधिक समृद्ध, सर्वोच्च सत्ता-संपन्न व्यक्ति भी मृत्यु से मुक्ति पाने में समर्थ नहीं रहा है। अतः कोई भी मृत्यु पर विजय प्राप्त नहीं कर सका। मृत्यु के आगे सभी हार गए। मृत्यु अपरिहार्य रूप से जीवन से जुड़ा बड़ा सत्य है। परन्तु एक सत्य यह भी है कि कोई व्यक्ति इस तरह नहीं मरना चाहता जैसे कि आजकल कोरोना काल में मर रहा है। व्यक्ति डर-डर कर घुट-घुट कर भयभीत अवस्था में तड़फ-तड़फ कर मर रहा है। आज पूरे समाज में डर और भय का वातावरण है, भय का आतंक व्याप्त है। यह अतिरेक पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं अपितु यथार्थ है। व्यक्ति डरा हुया है और भयावह है ये अफ़वाहें नहीं हैं। ऐसे में हमारे सामाजिक दायित्व स्वतः बढ़ जाते हैं। इस स्थित में हमारा दायित्व यह होना चाहिए कि डर का माहौल न बनाया जाए, अफ़वाहों से बचा जाए। क्योंकि भयभीत होना और किसी को भयभीत करना, डरना और डराना अप्रत्याशित नकारात्मक घटनाओं और अंदेशों को जन्म देता है और जीवन में कुछ बुरा घटित होने के अंदेशे से उत्पन्न दर्द से भय की इब्तिदा (आगाज़) होती है। 

 सैद्धान्तिक रूप से यह माना जाता है कि भय कमज़ोर मानसिक अवस्था का परिचायक है। भय मन का हिस्सा है। मन डरपोक होता है और डरपोक होना स्वाभाविक है क्योंकि मन ख़ाली और शून्य होता है। भय हमें असंवेदनशीलता से संवेदनशील और अतिसंवेदनशील बनाता है। इसी अतिसंवेदनशील मन में भय अपना आश्रय बनाता है, घर बनाता है तथा बड़ी ही मुश्किल से बाहर निकलता है क्योंकि भय जिस घर में अर्थात् मन में आश्रय पाता है उसी को अपना ग्रास बनाता है। भय से मनुष्य टूट जाता है और धीरे-धीरे उसका व्यक्तित्व भी ढह जाता है।  अनुसंधानकर्ताओं की माने तो जिस व्यक्ति के अंदर स्थायी रूप से भय ने अपना स्थान बना लिया है, वह मृत्यु से पहले ही अनगिनत बार मरता है।

इस संपूर्ण सैद्धान्तिक, दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक विवेचना को निम्नलिखित उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है— एक गाँव में गाँव के एक सिद्धपुरुष को मृत्यु के कालदेवता गाँव में आते हुए दिखे। तब सिद्ध पुरुष ने हिम्मत करके पूछा कि इस गाँव में आपके प्रवेश करने का प्रयोजन क्या है? कालदेव ने कहा कि  ‘मैं एक संक्रामक रोग के माध्यम से इस गाँव में 10 हज़ार लोगों की जान लेने आया हूँ। 10 हज़ार मौतों के बाद मैं स्वयं इस गाँव का परित्याग कर वापस लौट जाऊँगा।’ गाँव में महामारी फैली एक-एक करके दस हज़ार से कई गुना अधिक लोगों की अकाल मौत हो गई। जब कालदेवता देवलोक को प्रस्थान कर रहे थे तो सिद्धपुरुष ने कालदेव से पुनः पूछा कि आपने तो कहा था कि आप इस गाँव में केवल 10 हज़ार लोगों की जान लेने आए हैं, लेकिन मरने वालों की संख्या तो 50 हज़ार से भी अधिक है। कालदेवता क्षणिक स्तब्ध हुए और फिर बड़े धीरज से बोले ‘मेरा विश्वास करो, मैंने तो केवल 10 हज़ार लोगों की जान ली है, शेष की मृत्यु तो मृत्यु के भय के कारण हुई है। अब तुम्हीं बताओ, भला मैं उन व्यक्तियों की मृत्यु के लिए किस प्रकार दोषी हूँ। जिन्हें मैंने ख़ुद नहीं मारा! मानव जीवन में 'भय के जानलेवा मनोविज्ञान' का यह सत्य उदाहरण है। आज हम कोरोना महामारी से उत्पन्न भय से पैनिक हो रहे हैं। अतिरेक में हैं, असहज हैं, अपनों की अप्रत्याशित मृत्यु से दुःखी हैं।

कोरोना संक्रमण के साथ यह वृत्तांत सटीक प्रतीत हो रहा है। क्योंकि आज कोरोना मनोवैज्ञानिक स्तर पर समाज को प्रभावित कर रहा है। व्यवहारिक मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि कोरोना का मनोवैज्ञानिक अटैक से यदि 5% लोग संक्रमित होते हैं तो लगभग 40% मानसिक रूप से भय के कारण बीमार होते हैं। यदि स्थिति में बार-बार सोशल मीडिया अथवा व्हाट्सएप पर जो ग़लत जानकारी आती है इनके कारण भी एंग्ज़ाइटी में वृद्धि हो रही है। इस प्रकार के समाचारों को प्रेषित नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे मानसिक रोग विकसित हो रहे हैं। अतः कोविड के नकारात्मक समाचार से बचना चाहिए और सकारात्मक रहना चाहिए। 

’भय का जानलेवा मनोविज्ञान’

’भय का जानलेवा मनोविज्ञान' चरम पर है। यह स्वीकार किया कि बिना कारण भय नहीं होता परंतु आज की स्थितियों में भय का कारण ’सुस्पष्ट' है। भारत कोरोना के रौद्र रूप की चपेट में है। भारत में कोविड-19 से संक्रमण के कुल मामले 1,59,30,965 है। प्रतिदिन संक्रमण के 3,49,786 मरीज़ आ रहे हैं। संक्रमित लोगों के स्वस्थ होने की दर गिरकर 86.62 प्रतिशत रह गई है। संक्रमण से स्वस्थ होने वाले लोगों की संख्या बढ़कर 1,34,54,880 हो गई है और मृत्यु दर गिरकर 1.20 प्रतिशत हो गई है। यद्यपि कोरोना टीकाकरण की रफ़्तार बढ़ रही है और अब तक 13,23,30,644 लोगों को वैक्सीन लग चुकी है।

मौत के इस प्रत्यक्ष तांडव का कारण पर्याप्त जीवन रक्षक सुविधाओं /अधोसंरचना की कमी है। अस्पतालों की कमी, अस्पतालों में सुविधाओं की कमी, आधारभूत संरचना का अभाव, जीवनरक्षक दवाओं अर्थात् रेमडेसिविर की कमी, वैक्सिनेशन की धीमी गति और कमी, ऑक्सीजन की कमी, इन हालातों में चिकित्सकों द्वारा रात-दिन काम करना और अपने-अपने घर परिवार से अलग रहकर काम करने के उपरांत भी कमियों के कारण संक्रमित की जान न बचा पाना हमें विवश करता है कि हम सोचें यह सब क्यों हुआ क्यों हो रहा है . . . इतना हो और फिर पत्तों की तरह झड़ते हुए, मृत्यु को प्राप्त करते हुए संक्रमित, कीड़े-मकोड़ों की तरह मरते हुए मरीज़ों को देखते हुए डॉक्टर अपने को हताश और ठगा हुआ अनुभव कर रहे हैं। डॉक्टर भी अवसाद, गंभीर तनाव और दहशत के मनोविज्ञान में जकड़े हुए हैं। कुछ न कर पाने के करण उत्पन्न अवसाद की स्थिति के शिकार होते जा रहे हैं। आज हौसला रखने और विचलित न होने की ज़रूरत है।

इन उपरोक्त स्थितियों के कारण उत्पन्न 'भय के जानलेवा मनोविज्ञान' में व्यक्ति चीख़ रहा है, तड़फ रहा है। व्यक्ति ऐसे जीवन से घबराता है जहाँ जीवन घिनौना, डरावना, सहमा-सकुचाया, कुंठित, रुदन-क्रंदन और चीत्कार भरा हो तब इसका मन निरीह और असहाय महसूस करता है। मृत्यु से मनुष्य को डर नहीं पर वह यह देखकर मृतप्रायः हो जाता है कि मरते समय भी उसका अपना कोई उसकी आँखों के सामने न हो। मरने के बाद एक एयर बेग में उसे बंद कर दिया जाए। अंतिम संस्कार के लिए भी लंबी लाइनों में इंतज़ार करना पड़े, दाह करने के लिए स्थान और जलाने के लिए लकड़ियाँ तक न मिल पा रहीं हों, क़ब्र खोदने के लिए स्थान तक न मिले, मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार के विधि-विधान भी पूरे नहीं हो पा रहे हो, परिवार, इष्ट मित्र मृतक के अंतिम दर्शन तक नहीं कर पा रहे हों, ऐसे दिन और ऐसे समय से व्यक्ति भयभीत है। इन स्थितियों का सामना करने के लिए मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान का आह्वान हमें मनोवैज्ञानिक धरातल पर राहत दिलाता है। उन्होंने कहा कि "हमें कोरोना के भय को मन से निकालना होगा। कोरोना सामान्य सर्दी-ज़ुकाम की तरह ही है, यदि समय से इसका इलाज ले लिया जाए तो यह ठीक हो जाता है। हम डरे नहीं, आत्मविश्वास रखें तथा इसे पराजित करें। हम निरंतर प्रयासों से शीघ्र ही इस पर पूर्ण नियंत्रण पा लेंगे"।

योग और मैडिटेशन का चमत्कार

डर, भय, तनाव, अशांति, आशंका, नकारात्मक अंदेशा, अति संवेदनशील, अवसाद, हताशा, घबराहट, एंग्ज़ाइटी, अविश्वास, असंतुलन, एंग्ज़ाइटी डिसॉर्डर्स, असहाय भाव, रुदन, क्रंदन यह सब मन से उत्पन्न होने वाले विकार है। ये सिर्फ़ शब्द नहीं इनका स्वरूप और इन शब्दों से उत्पन्न होने वाले रोगाणुओं का वर्गीकरण और संसार बहुत ही व्यापक है। मनुष्य इस शब्दों और उनसे उत्पन्न मन के भावों के मकड़जाल में उलझा रहता है और संपूर्ण जीवन इन्हीं से निर्मित पर्यावरण में जीता है और मर जाता है।  आज कोरोना काल में जहाँ चारों ओर सिर्फ़ मृत्यु की ही चर्चा है क्योंकि मनुष्य ने अपने जीवन काल में इतने क़रीब से मृत्यु को नहीं देखा जितना कि आजकल देख रहे हैं। यह भय का प्रधान कारक है। आज दुःख पर भय हावी है। भय के कारण व्यक्ति दुःख भी नहीं मना पा रहा है। कोरोना वायरस के कारण पूरा विश्व  अनिश्चितता के भँवर में  है। माइक्रो स्केल पर कोरोना वायरस कोरोना की ख़बरों से लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है। ऐसे लोग जो कि पहले से ही बेचैनी और ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर (ओसीडी) से गुज़र रहे हैं उनके लिए कोरोना एक बड़ी मुश्किल बन गया है। अनिश्चितता को सहन न कर पाने के डर से लोग कई प्रकार के एंग्ज़ाइटी डिसॉर्डर्स से गुज़र रहे हैं। 

अवसाद से विमुक्ति की एकमात्र औषधि है ध्यान। योग, ध्यान एवं योगाभ्यास को मानसिक संतुलन की व्यवहारिक एवं मनोवैज्ञानिक औषधि बन गया है। मन में शांति, चित्त में धैर्य और जीवन में आत्मविश्वास योग साधना की प्रेरणा शक्ति है। ध्यान अर्थात् जागरुकता, अवेयरनेस, होश, साक्षी  भाव और दृष्टा भाव और विचारों पर नियंत्रण ही ध्यान है। ध्यान का अर्थ स्मरण और एकाग्रता भी है, जिससे आप रिफ़्रेश और रिचार्ज हो जाते हैं। ध्यान उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करता है। शरीर में स्थिरता को बढ़ाता है, जिससे शरीर मज़बूत तथा मन व मस्तिष्क शांत होता है। ध्यान आपके चित्त से भावनाओं और विचारों पर आच्छादित तनाव एयर भय के बादलों को हटाकर आपको विशुद्ध शुद्ध रूप में निर्लिप्त और साक्षी भाव में स्थापित करता है। आज तो चिकित्सक और विशेषज्ञ भी ध्यान की शक्ति एवं प्रभाव को इस रूप में स्वीकार कर रहे हैं कि ध्यान व्यक्ति की प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाता है। अतः ध्यान से शरीर में प्रतिरक्षण क्षमता (इम्यून) का विकास होता है। ध्यान करने से तनाव नहीं रहता है। दिल में घबराहट, भय और कई तरह के विकार भी नहीं रहते हैं। नकारात्मक मानसिक हलचल को नियंत्रित करने और मन पर आच्छादित भय और भ्रम के  पर्यावरण से मुक्त करने में योग संजीवनी का कार्य करता है।

आज कोरोना के कारण व्यक्ति हाइपोक्सिया समस्या से गुज़र रहे हैं। हाइपोक्सिया से शरीर में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। इस स्थिति में दिमाग़ के अलावा फेफड़े, हृदय व अन्य अंगों को कुछ समय में ही क्षति पहुँचने लगती है। साथ ही सभी कोशिकाओं को कार्य करने में बाधा आने लगती है जिस वज़ह से व्यक्ति को साँस लेने में तकलीफ़ होती है। इस स्थिति में दवाओं के अलावा ऐसी अनेक गतिविधियाँ और पद्धतियाँ है जो ऑक्सीजन के स्तर का अभिवर्द्धन कर सकती है और शरीर में ऑक्सीजन की कमी को दूर किया जा सकता है। कोरोना वायरस का संक्रमण फेफड़ों को कमज़ोर कर देता है। ऐसे में इम्युनिटी पॉवर बढ़ाना ज़रूरी है वहीं फेफड़ों को सुरक्षित और मज़बूत बनाए रखना भी ज़रूरी है और सबसे ज़रूरी है शरीर के भीतर का ऑक्सीजन लेवल बढ़ाना। ऑक्सीजन का स्तर कम होने पर सबसे जल्दी और सबसे बुरा असर हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता पर पड़ता है। ऐसी स्थिति में कोई भी वायरस और बैक्टीरिया हमारे शरीर पर जल्दी हावी हो सकते हैं। योगाभ्यास द्वारा फेफड़ों की कार्यक्षमता में वृद्धि तो होती ही है  अपितु योग फेफड़ों को सुरक्षित और मज़बूत भी बनाए रखता। 

कोरोना से बचाव के लिए कुछ प्रमुख योग व्यायाम एवं प्राणायाम, ध्यान महत्वपूर्ण हैं। इनका नित्य अभ्यास करने से शरीर, मन, बुद्धि और आंतरिक रूप से श्वास तंत्र को दुरुस्त करने के साथ ही आंतरिक अंगों को मज़बूती प्रदान करते हैं:- 

प्रमुख प्राणायाम:-

(1) उज्जयी प्राणायाम:- गले से साँस अंदर भरकर जितनी देर रोक सकें उतनी देर रोकें। इसके बाद दाएँ नाक को बंद करके बाएँ नाक के छिद्र से छोड़ें।

(2) शीतली प्राणायाम:- इस प्राणायाम में होंठ खुले, दाँत बंद करें। दाँत के पीछे जीभ लगाकर, दाँतों से धीमे से साँस अंदर लें और मुँह बंद करें। थोड़ी देर रोकने के बाद दाएँ नाक से हवा बाहर निकाल लें और बाएँ से हवा अंदर लें।

(3) भस्त्रिका:- सबसे पहले ध्यान या वायु मुद्रा में बैठकर भस्त्रिका व्यायाम करें। यह मुख्य रूप से डीप ब्रीदिंग है। कोरोना का सबसे पहला अटैक हमारे रेस्पिरेट्री सिस्टम पर होता है, ऐसे में डीप ब्रीदिंग के माध्यम से हम कोरोना की संभावनाओं को काफ़ी कम कर सकते हैं। करीब पाँच मिनट तक रोज़ाना डीप ब्रीदिंग करें, इससे आपका रेस्पिरेटरी सिस्टम मज़बूत हो जाएगा। साथ ही इम्यूनिटी पॉवर बढ़ जाएगी। 

(4) कपालभाति:- दूसरा सबसे महत्वपूर्ण व्यायाम कपालभाति है। इसके माध्यम से हम अपने अंदरूनी अंगों को मज़बूती प्रदान कर सकते हैं। इस प्राणायाम के अभ्यास से अंग मज़बूत होंगे और कोरोना आपके हृदय, लिवर, पेनक्रियाज़, फेफड़ों आदि को नुक़सान नहीं पहुँचा पाएगा। इस प्राणायाम को आप 5 मिनट से शुरू करके 15 मिनट तक कर सकते हैं।

(5) अनुलोम विलोम:- यह प्राणायाम हमारे पूरे नर्वस सिस्टम के लिए, हृदय, फेफड़ों और मस्तिष्क के लिए ज़रूरी है। इससे हाइपरटेंशन जैसी बीमारियाँ ख़त्म होती हैं। इसे भी आप 05 से 15 मिनट तक रोज़ाना कर सकते हैं। 

(6) भ्रामरी:- रोगमुक्त और तनाव मुक्त जीवन जीने के लिए भ्रामरी एक बहुत ही उपयोगी प्राणायाम है। 

(7) उद्गीथ प्राणायाम:- यह भ्रामरी से थोड़ा अलग है। इसमें मुख से आवाज़ करते हैं जबकि भ्रामरी में नाक से ध्वनि निकाली जाती है। इस दौरान ओम का उच्चारण करना शारीरिक और मानसिक दोनों ही स्थिति में बेहद लाभदायक है। जितनी लंबी और देर तक आप अपनी श्वास खींच पाएँगे उतना ही आप कोरोना के दौरान होने वाली ऑक्सीजन की कमी के ख़तरे से ख़ुद को बचा पाएँगे। 

(8) पेट के बल सोएँ, वेंटिलेटर की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। कहते हैं कि इस प्रकार सोने से हमारे फेफड़े पूरी तरह काम करने लगते हैं और शरीर में ऑक्सीजन का स्तर ठीक बना रहता है। सोने के तरीक़े में बदलाव करने भर से ऑक्सिजन की कमी होने पर वेंटिलेटर की ज़रूरत को काफ़ी हद तक कम किया जा सकता है। वहीं शरीर में ऑक्सीजन के प्रसार को  बेहतर किया जा सकता है।

प्राणायाम के अलावा योगासन भी आपके शरीर को मज़बूती प्रदान करने वाले आसनों में (1) मंडूकासन (2) वक्रासन (3) गोमुखासन (4) भुजंगासन (5) नौकासन (6) सर्वांगासन (7) विपरीतकर्णी (8) मार्जरी आसन

— प्रो. रामदेव भारद्वाज, कुलपति 

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