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दलबदल का वायरस

किफायती लाल मेरे शहर के नामी-गिरामी नेताओं में शुमार हैं। वे विधायक से लेकर सांसद तक के ओहदे तक पहुँच चुके हैं। सुबह की सैर के वक़्त मुझे मिल गये। हालचाल पूछने के बाद उन्होंने मुझसे कहा कि इन दिनों राजनीति के क्षेत्र में दलबदल वायरस हावी हैं। मुझे लगता है कि वैज्ञानिकों को इस वायरस के दवा की भी खोज करनी चाहिए। आगे कहा मैं सोचता हूँ कि कहीं यह वायरस भी कोरोना वायरस की तरह लाइलाज तो नहीं हैं।

मैं ज़रा सतर्क होते हुए उनसे पूछा, "इस वायरस से आमआदमी को कोई ख़तरा तो नहीं है?"

वे बोले, "आमआदमी को ख़तरा कैसे नहीं है? इस वायरस की वज़ह से देश की राजनीति बदल जाती है। सरकारें बदल जाती हैं। इसका पूरा असर आमआदमी से लेकर समूची अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।"

उनकी बातों को सुनकर मैं और सतर्क हो गया और दूरियाँ बनाकर साथ चलने लगा।

वे बता रहे थे कि दलबदल का वायरस मुख्य रूप से राजनेताओं को अपना शिकार बनाता है। इसमें सांसद और विधायक से लेकर राजनीतिक दलों के नेता तक शामिल होते हैं। दुनिया में कई तरह के वायरस होते हैं। इनमें से एक दलबदल का भी वायरस शामिल है।

किफायती लाल ने बताया कि जब किसी विधायक को दलबदल का वायरस लग जाता है तो उसे होम क्वारंटाइन के स्थान पर रिज़ोर्ट क्वारंटाइन करना पड़ता है। इसका मुख्य कारण यह है कि इससे अन्य विधायकों के संक्रमित होने का ख़तरा बढ़ जाता है। इस स्थिति में विधायकों के मोबाइल छीन लिये जाते हैं और अन्य लोगों से उनसे मिलने या बातचीत करने पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है।

मैंने कहा, "यह काम ठीक उसी तरह से होता है जैसे किसी मुहल्ले में कोरोना संक्रमित के मिलने पर उसके घर को सील कर दिया जाता है और उसके दरवाज़े पर नोटिस चिपका दिया जाता है – कोविड-19 का मरीज़। नोटिस के नीचे लिखा होता है– इस घर में आम लोगों का प्रवेश निषेध है।"

वे बोले, "हाँ। इस तरह दलबदल के संक्रमित मरीज़ को भी रखा जाता है।"

मैंने कहा, "लेकिन कोविड-19 के मरीज़ को घर में रखा जाता है। दलबदल से संक्रमित मरीज़ को रिज़ोर्ट में ही क्यों रखा जाता है?"

वे बोले, "दलबदल से संक्रमित मरीज़ कोरोना संक्रमित से ज़्यादा ख़तरनाक होता है। उसका वायरस कोरोना वायरस से ज़्यादा तेज़ी से फैलता है। दलबदल वायरस से संक्रमित मरीज़ सरकार बनाने और बिगाड़ने के खेल में ज़्यादा सक्रिय रहता है।

"इसलिए उसे रिज़ोर्ट क्वारंटाइन में रखना पड़ता है। कोरोना का मरीज़ 14-15 दिनों तक होम क्वारंटाइन में रहने के बाद निगेटिव हो जाता है लेकिन दलबदल का संक्रमित मरीज़ तब तक सक्रिय रहता है जब तक विधानसभा में विश्वास का प्रस्ताव परित नहीं हो जाता है। यही कारण है कि ऐसे मरीज़ को तब तक रिज़ोर्ट में रखा जाता है जब तक कि सरकार बन नहीं जाये। सरकार बनते ही दलबदल के संक्रमण का ख़तरा कम हो जाता है और मरीज़ को छोड़कर वायरस ख़ुद चला जाता है। उसे किसी प्रकार की चिकित्सा की भी ज़रूरत नहीं पड़ती है। न ही
रिज़ोर्ट में उनकी आवभगत में लगे कर्मियों को पीपीई किट्स पहनने की ज़रूरत पड़ती है।"

मैं चूँकि प्रातःकालीन भ्रमण में उनके साथ चल रहा था और मुँह में मास्क लगाये हुए था। इसलिए सोच रहा था अच्छा हुआ मैं विधायक नहीं हुआ; इस तरह के वायरस से अब तक बचा हुआ हॅूं। नहीं तो मैं भी उस वायरस से ग्रस्त हो सकता था।

वे आगे बोले, "इस तरह के मरीज़ प्रायः राजनीतिक दलों या विधान सभाओं में पाये जाते हैं।"

इसके बाद हम दोनों के रास्ते अलग-अलग हो गये। वे अपनी राह पर चले गये और मैं अपनी राहों पर।

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