अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य ललित कला

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा वृत्तांत डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

दीपावली बहु आयामी पर्व

दीपावली एक ऐसा पर्व है, जो सृष्टि के आदि काल से ही मनाया जाता रहा है। इसकी पृष्ठभूमि में ’तमसो मा ज्योतिर्गमय’ की भावना  ही मूल रूप से निहित रही है। ऐसा कोई युग नहीं था, जब अंधकार नहीं था। और न ऐसा युग कभी होगा, जब अंधकार नहीं होगा। अतएव अपने जीवन के आरम्भ से ही मानव महाशक्तियों से अंधकार से आलोक की ओर ले जाने की माँग करता रहा है। अंधकार बाहर का हो या अन्दर का; अंधकार तो अंधकार ही होता है। एक गीत का आमुख याद आता है: "लाखों दीप प्रकाश न देंगे, मन में अगर अंधेरा हो"। अतएव बाहर का अंधकार दूर करने के लिए अन्दर का अंधकार भी दूर करना अनिवार्य होता है। दीपावली का आध्याiत्मक रूप हमें अंदर का अंधकार दूर करने की प्रेरणा देता है तो धार्मिक और साँस्कृतिक स्वरूप बाह्य अंधकार दूर करने की प्रेरणा जुटाता है। सतयुग से ही यह शारदीय नवस्येष्टि पर्व के रूप में मनाया जाता रहा है।

सागर से महालक्ष्मी, धन्वन्तरि वैद्य तथा अमृत के प्रादुर्भाव की कथा भी तब से ही इस पर्व से संयुक्त हो गई थी। अमृत वितरण के समय विष्णु के मोहनी अवतार को भी दीपावली से जोड़ दिया गया था।

कहते हैं जब असुरों का संहार करने के लिए जगदंबा ने महाकाली का रूप धारण किया था तो वह इतने आवेश में आ गईं थीं कि सारे ही असुरों का विनाश करके भी शान्त नहीं हो पाईं थीं और उन्होंने मानवों और देवताओं का संहार करना आरम्भ कर दिया था। तो भगवान शिव उनके सामने लेट गए और महाकाली उन पर चढ़कर नृत्य करने लगी थीं। तब ही उनका आवेश शान्त हो पाया था। यह घटना कार्त्तिक कृष्ण पक्ष अमावस्या को ही घटी। अत: इसकी स्मृति में दीपावली का पर्व मनाया जाता रहा है।

उद्यालक ऋषि के द्वारा अपने पुत्र नचिकेता को यम को दान दिए जाने के उपरान्त नचिकेता ने यमराज से ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया था। यह रात्रि कार्त्तिक अमावस्या ही थी। अत: नचिकेता की सफलता और सिद्धि पर धरती का उत्सव मनाया गया था।

त्रिभुवन विजयी दानवीर राजा बलि ने वामन रूपी विष्णु को अपना स्र्वस्व दान कर दिया था। तब विष्णु जी ने उसे वरदान दिया था। कहते हैं, उसी वरदान के कारण हर वर्ष पृथ्वी पर पाँच दिन बली का शासन रहता है। उसी की स्मृति में दीपावली मनाई जाती है।

भारत के इतिहास में द्रविड़ सभ्यता का काफी महत्व है। कहते हैं कि द्रविड़ लोग कार्त्तिक अमावस्या को दीप महोत्सव मनाया करते थे। बड़ी-बड़ी मशालों के उजाले में गृह उपयोगी पशुओं का जुलूस निकाला जाता था।

त्रेता युग में भगवान श्रीराम का रावण पर विजय प्राप्त करने के पश्चात्‌ अयोध्या वापस लौटना दीपावली का मुख्य कारण और आकर्षण बन गया।

एक मत के अनुसार पवन-पुत्र हनुमान जी का जन्म भी कार्त्तिक कृष्ण चतुर्दशी को हुआ था।

द्वापर युग में भगवान कृष्ण दीपावली वाले दिन ही वन में पहली बार गायें चराने गए थे। उनके सकुशल लौटने पर लोगों ने दीप जलाकर दीपावली मनाई थी। कालान्तर में नर्क चतुर्दशी के दिन भगवान श्रीकृष्ण ने सत्यभामा की सहायता से नरकासुर नामक असुर का वध करके सोलह हज़ार रानियों को उसके कारावास से छुड़वाया था। अत: दूसरे दिन उसके उपलक्ष्य में दीपावली मनाई गई।

महाभारत के अनुसार महाराज युधिiष्ठर ने इस दिन ही राजसूय यज्ञ किया था, जिसके अभिनन्दन स्वरूप जनता ने अनगिन दीप जलाकर दीपावली मनाई थी।

कहते हैं कि कार्त्तिक अमावस्या को ही भगवान श्रीकृष्ण ने धरती से महाप्रयाण किया था।

जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थकर महावीर स्वामी ने इस दिन ही निर्वाण प्राप्त किया था।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र से पता चलता है कि लोग कार्त्तिक अमावस्या को अपने-अपने गृहों, मंदिरों और जलाशयों पर दीपक जलाते थे।

एक पौराणिक आख्यान के अनुसार महामुनि गणेश स्वामी के समाधि लेने पर अठारह राज्यों के राजाओं ने ज्ञान दीप बुझ जाने के बदले मिट्टी के दीप जलाये जो दीपावलि कहलाये।

मुग़ल सम्राट अकबर के शासन काल में उसको मुख्य महल के सामने चालीस गज़ ऊँचे बाँस पर एक बहुत बड़ा कंडील टाँगा जाता था। अकबर स्वयं दीपावली उत्सव में, विशेष रूप से गोवर्द्धन पूजा में भाग लिया करता था। सम्राट जहांगीर तथा शाह आलम द्वितीय के समय में भी महलों में दीपावली बड़े समारोह के साथ मनाई जाती थी।

अमृतसर में सिखों के स्वर्ण मन्दिर की नींव दीपावली वाले दिन ही रखी गई थी। कार्त्तिक अमावस्या को ही सिखों के छठे गुरु हर गोविन्द सिंह जी मुग़ल सम्राट जहांगीर के बंदीगृह से छूट कर आये थे; जिसके उपलक्ष्य में उनके अनुयायियों ने दीपावली मनाई।

आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द सरस्वती के कार्त्तिक अमावस्या वाले दिन ही निर्वाण प्राप्त किया था। इसीलिये उनके अनुयायी दीपावली को ऋषि निर्वाण दिवस के रूप में मनाते हैं।

वेदान्त के प्रकाण्ड विद्वान स्वामी रामतीर्थ कार्त्तिक अमावस्या वाले दिन ही उत्पन्न हुए थे और इस दिन ही संसार से विदा हुए थे। ऐसी अनेकानेक घटनायें दीपवली के पर्व से जुड़ी हुई हैं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि दीपावली का पर्व भिन्न-भिन्न स्मृतियों से जुड़ा हुआ एक महान बहु आयामी पर्व है। मैं दीपावली के पावन पर्व पर जीवन-ज्योति के समस्त पाठकों को हार्दिक बधाई देती हूँ। दीपावली शुभ हो!

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अणु
|

मेरे भीतर का अणु अब मुझे मिला है। भीतर…

अध्यात्म और विज्ञान के अंतरंग सम्बन्ध
|

वैज्ञानिक दृष्टिकोण कल्पनाशीलता एवं अंतर्ज्ञान…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

साहित्यिक आलेख

सामाजिक आलेख

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं