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गाँधीजी का पर्यावरण चिंतन और मानव अस्तित्व

श्रीमान मोहन दास करमचंद गाँधी जिन्हें हम प्यार से बापू कहते हैं, ने 2 अक्तूबर सन 1869 को जब इस धरा पर आविर्भाव किया तब किसी को यह ज्ञात नहीं था कि माता पुतलीबाई और पिता करमचंद जी के घर में एक युगपुरुष का आविर्भाव हुआ है जो आगे चल कर सदियों से दासता की बेड़ियों में जकड़ी, दबी कुचली, शोषण और दमन से त्रस्त भारत माता को पराधीनता से मुक्त करवाएगा और एक ऐसे भारत के निर्माण का सूत्रधार बनेगा जिस रहने वाले में सभी व्यक्तियों को आर्थिक, सामजिक, धार्मिक और आध्यात्मिक स्वतन्त्रता, के साथ-साथ जीवन यापन के लिए आवश्यक सभी आगतों की आवश्यकताएँ समग्र रूप से न केवल उपलब्ध रहेंगी बल्कि भारत का निर्धन से निर्धन व्यक्ति भी अभिमान से सर उठा कर चल सकेगा और अपने देश, अपनी संस्कृति, अपनी वेशभूषा और अपनी मातृभाषा पर गौरवान्वित हो सकेगा।

बापू के विचारों को तत्कालीन भारत के सभी नेताओं ने न केवल समग्र रूप से ग्रहण ही किया बल्कि अपने अपने जीवन में उतारा भी। हमारे देश के संविधान निर्माता बाबा साहेब भीम राव रामजी आंबेडकर जी ने संविधान निर्माण के समय राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी कि इन्हीं बातों को न केवल ध्यान में रखा बल्कि सभी देशवासियों को एक समान मानते हुए किसी भी प्रकार का भेदभाव भी नहीं होने दिया। उस समय शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसने बापू के बताये मार्ग का अनुसरण न किया होगा। मैंने बचपन में “सत्य के प्रयोग” नामक बापू की आत्मकथा को बार-बार पढ़ा और यह जाना है कि अपने जीवन के उन वर्षों में जब से बापू अफ्रीका से भारत लौटे थे तभी से भारत भ्रमण कर के, भारत के गाँव-गाँव जा-जा कर उन्होंने भारत की दयनीय स्थिति को न केवल गहराई से समझा, उसके कारणों का पता लगाया और फिर उन्हें दूर करने का प्रयास तन-मन-धन लगा कर किया, जिस के फलस्वरूप आज हम स्वाधीन हैं; और हमारा एक विस्तृत संविधान हमारे देशवासियों ने स्वेक्षा से अंगीकार किया है जो इतने विशाल देश को; जिसमें न जाने कितनी विविधता है, को एक सूत्र में पिरो कर रख रही है। यद्यपि मेरा यह सौभाग्य तो न बन पाया कि बापू के बलिदान से पूर्व पैदा होता और उन्हें साक्षात देख सका होता और उनके वचनामृत का श्रवण कर सकता परन्तु आज जो भी मुझे बापू के बारे में ज्ञात है वह उन के द्वारा लिखे गए लेखों से ही और अपने बचपन में अपने बाबा जी के द्वारा सुनायी गयी कहानियों के माध्यम से, जो कि स्वयं एक बहुत बड़े गाँधीवादी थे और जिनके कक्ष में गाँधी जी का एक बहुत बड़ा चित्र सजा रहता था; और सत्य के प्रयोग भी उन्हीं की आलमारी से प्राप्त हुआ था। कालांतर में कुछ अन्य साहित्य भी पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। जितना हम सब गाँधी जी के बारे में समझ पाए हैं वह संक्षेप में यह है कि गाँधी जी एक “सादा जीवन उच्च विचार”, की प्रतिमूर्ति थे। सत्य, अहिंसा और तन, मन तथा आचरण की शुचिता और पवित्रता उनके जीवन के महान उद्देश्य थे। सविनय अवज्ञा और सत्याग्रह उनके हथियार थे। अपनी धुन के पक्के और बड़े ही कर्मठ थे हमारे बापू जी।

जहाँ तक पर्यावरण का प्रश्न है और उससे जुड़ा हुआ हम मानवों का अस्तित्व है, इस के विषय में महात्मा गाँधी जी के चरित्र से ही सीखा जा सकता है। गाँधी जी का निश्चित मत था कि “प्रकृति में हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति करने की पूर्ण क्षमता है परन्तु हमारे लालच को पूर्ण कर पाना संभव नहीं है”। बापू के समय में पर्यावरण शब्द तो कहीं प्रयुक्त नहीं होता था बल्कि उनके लेखों में “प्रकृति” शब्द का निरूपण बहुत बार हुआ है। गाँधी जी का निश्चित मत था कि जिस प्रकार मनुष्य को अपने मन, वचन तथा कर्म में एकरूपता रखनी चाहिए उसी प्रकार शारीरिक शुद्धता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। साबरमती के आश्रम में गाँधी जी ने जो सबसे निकृष्ट कार्य, जिसे कोई भी नहीं करना चाहता था वह अपने ज़िम्मे रखा था; और वह कार्य था “स्वच्छता” का जिसमें शौचालय की नित्य सफ़ाई भी शामिल थी। नई दिल्ली स्थित वाल्मीकि कॉलोनी; जो एक समय में सफ़ाई कर्मचारियों के रहने की सबसे गंदी जगह थी, उसके शौचालयों की अपने हाथ से सफ़ाई कर के बापू जी ने हमारे देश में पर्यावरण की स्वच्छता का सूत्रपात किया था। कालांतर में हमारे देश के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्रभाई मोदी जी ने भी “स्वच्छ भारत अभियान” की शुरुआत भी इसी वाल्मीकि कॉलोनी में जा कर सफ़ाई करने से की है। 

एक बार गाँधीजी ने कहा था कि “मनुष्य के जीवन में स्वच्छता का स्थान सर्वोच्च है। इसलिये ग़रीबी के कारण या उसकी आड़ में कोई भी शहर स्वच्छता की व्यवस्था से मुक्ति नहीं पा सकता। जो भी मनुष्य थूक कर वायु तथा ज़मीन को दूषित करता है या ज़मीन पर कचरा फेंकता है वह प्रकृति के विरुद्ध पाप करता है”। हम स्नान करने में आनन्द महसूस करते हैं किन्तु कुएँ, जलाशय अथवा नदी को मल त्याग द्वारा गंदा करते हैं। हमें इन आदतों को पापाचार मानना चाहिये। हमारी उपरोक्त आदतों के कारण हमारे गाँव तथा नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं। ऐसी अस्वच्छता बीमारियों का प्रसार करती हैं ऐसा बापू का निश्चित मत रहा है। गाँधी जी श्रीमद्‌भगवदगीता के उपदेशों को अपने जीवन में उतार चुके थे जिस हेतु उन्हें पाप और पुण्य का सम्यक्‌ ज्ञान प्राप्त था, वे जान चुके थे कि वातावरण की अशुद्धता और गन्दगी मनुष्यों के बीमार कर देगी और इसी लिए जब बार-बार कहने से भी कई पूरी सफ़ाई और शुद्धता हेतु प्रयत्नशील नहीं होता था तब वे स्वयं ही उस कार्य को करने लग पड़ते थे। 

गाँधीजी का पर्यावरणवाद नैतिक सिद्धान्तों पर आधारित था। गाँधीजी का अपने शरीर तथा मन पर पूर्ण नियंत्रण था। आत्मबल तो उन में कूट-कूट कर भरा ही था जिस की बदौलत वे कठिन से भी कठिन परिस्थितियों का डट कर मुक़ाबला कर सके। इसलिए उन्होंंने कभी भी ऐसा कोई उपदेश नहीं दिया जिसका वे अपने व्यक्तिगत जीवन में स्वयं पालन नहीं करते हों। यही उनका प्रकृति चिन्तन है। बापू का यह भी मानना था कि “सभी प्राकृतिक संसाधन जैसे पृथ्वी, वायु, भूमि तथा जल हमारे पूर्वजों से प्राप्त सम्पत्तियाँ नहीं हैं। वे हमारे बच्चों की धरोहर हैं। वे जैसी हमें मिली हैं वैसी ही उन्हें भावी पीढ़ियों को सौंपना होगा”। गाँधीजी का दृष्टिकोण, पर्यावरण के प्रति व्यापक था। उन्होंने देशवासियों से, तकनीकों के अन्धानुकरण के विरुद्ध, जागरूक होने का आवाहन किया था। उनका मानना था कि पश्चिम के जीवन स्तर की नक़ल करने से, पर्यावरण का संकट पनप सकता है। उनका मानना था कि यदि विश्व के अन्य देश भी आधुनिक तकनीकों के मौजूदा स्वरूप को स्वीकार करेंगे तो पृथ्वी के सारे संसाधन नष्ट हो जायेंगे। 

गाँधीजी की सोच, पर्यावरण के प्रति अगाध मैत्री पूर्ण थी। उस सोच में समाज के अंतिम से अंतिम व्यक्तियों के हितों का भी ध्यान रखा गया है। उनका विश्‍वास था कि ग़रीबी और प्रदूषण एक दूसरे के पोषक हैं। गाँधी जी का सरल जीवन का नुस्ख़ा, प्राकृतिक साधनों के असीमित उपभोग तथा अंतहीन शोषण पर रोक लगाता है। यह उनके पर्यावरण सम्बन्धी सोच का सबसे बड़ा उदाहरण है। महात्मा गाँधी की उपरोक्त सोच उस कालखंड में विकसित हुई जब वैज्ञानिक जगत भी पर्यावरण के कुप्रभावों से लगभग अपरिचित था। गाँधीजी की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उनकी समग्रतामूलक दृष्टि थी। उनके लिए जीवन समग्रता में है, अतएव जीवन का मूल भी एक है, उसका नियमन करने वाला नियम भी एक है। वह मानव और मानवेतर जगत के एकत्व में विश्वास करते थे जिसे उनकी ‘अस्तित्वमूलक दृष्टि’ कहा जा सकता है। सम्पूर्ण प्रकृति के प्रति उनकी एकात्म दृष्टि को निम्नानुसार स्पष्ट किया जा सकता है। 

बापू इस धरती के सभी प्राणियों में अवस्थित एक ही आत्मा को ही देखते थे जो श्रीमद् भगवदगीता का मूल विचार भी है और इस कारण सभी पर दया करने के जिसे बाद में “अहिंसा” की संज्ञा दी गयी और “अहिंसा परमोधर्म:” नामक उद्घोष जो कि जैन धर्म से लिया गया है क्योंकि गाँधी जी प्रायः गुजरात प्रदेश के एक महान भक्त “नरसी मेहता” जी से अत्यधिक प्रभावित थे। बापू ने कहा था कि, “मैं अद्वैत में विश्वास करता हूँ, मैं मनुष्य की मूलभूत एकता में भी और केवल मनुष्यों की ही क्यों सभी जीवधारियों की एकता में विश्वास करता हूँ। कारण मेरा तो ऐसा विश्वास है कि एक मनुष्य के अधोपतन के साथ एक हद तक सारे संसार की अधोगति होती है।” एक स्थान पर बापू जी ने कहा है कि, ‘‘मैं केवल मानवों के साथ ही तादात्म्य अथवा बंधुत्व स्थापित करना नहीं चाहता अपितु पृथ्वी पर रेंगने वाले कीड़ों-मकोड़ों के साथ भी तादात्म्य अथवा बंधुत्व स्थापित करना चाहता हूँ। क्योंकि हम सभी उसी ईश्वर की संतान है और इसलिए जीवन जिस रूप में भी दिखाई देता है, तत्वतः एक होना चाहिए।’’ गाँधीजी अनुभव करते थे कि हम प्रकृति के वरदानों का उपयोग तो कर सकते हैं किन्तु हमें उनको मारने का अधिकार नही है। गाँधीजी यह भी मानते थे कि अहिंसा तथा सम्वेदना न केवल जीवों के प्रति बल्कि अजीवित या मृत पदार्थों के प्रति भी होना चाहिये। अजीवित पदार्थों का अति दोहन जो लालच तथा ज्यादा लाभ के लिये किया जाता है वह जैवमण्डल को नुक़सान पहुँचाता है। वह हिंसा है। इससे अन्य लोगों को जो उसका उपयोग करना चाहते हैं; बहुत हानि होती है। 

गाँधी जी जीवन भर शाकाहारी रहे। वे जानते थे कि प्राकृतिक संतुलन के लिए भगवान् के द्वारा बनायी गए व्यवस्था की सर्वोत्तम हैं जिसमें सभी जीवों की निश्चित भूमिका है। वे कहते थे कि, “जब तक मानव-संस्कृति के भौतिक नियमों के केन्द्र में अहिंसा नहीं होगी, हम प्रकृति के विरुद्ध हिंसा को रोकने के लिए, पर्यावरण सम्बन्धी गतिविधियाँ नहीं चला सकते। तथा वन्य जीवन, वनों में कम हो रहा है किन्तु वह शहरों में बढ़ रहा है”। गाँधीजी की दृष्टि मनुष्यकेंद्रिता से बिल्कुल विपरीत थी। वह मनुष्य को प्रकृति का ही अंग मानते थे, उसका स्वामी नहीं। अतः उनके लिए यह विचार बिल्कुल असहज नहीं था कि प्रकृति मनुष्य के उपभोग के लिए नहीं है। वह मनुष्य और मनुष्येतर जगत के समान अधिकार को स्वीकार करते हुए कहते थे कि, ‘‘मैं यह अवश्य मानता हूँ कि ईश्वर की सृष्टि के समस्त प्राणियों को भी जीने का उतना ही अधिकार है जितना हमें।’’ गाँधी जी जानते थे कि हमें समय आने पर यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि सृष्टि के निम्नतर प्राणियों पर हमारा प्रभुत्व इसलिए नहीं है कि हम उन्हें मार डालें, बल्कि वह हमारे और उनके पारस्परिक हित-संवर्धन के लिए हैं। 

महात्मा गाँधी जी द्वारा प्रतिपादित मनुष्य और मनुष्येतर जगत के समान अधिकार का तर्क एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय दृष्टि है। हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि प्रकृति के विकास में मनुष्य में चेतना की अब तक की सर्वोच्च अभिव्यक्ति हुई है। मनुष्य ही उचित-अनुचित, विवेक-अविवेक को तय कर सकता है अतः उसकी ज़िम्मेदारी ज़्यादा हो जाती है। चेतना की सर्वोच्च अभिव्यक्ति होने के नाते मनुष्य का दायित्व है कि वह अपनी प्रकृति की रक्षा करे और उनके समान अधिकार का सम्मान करे। गाँधी जी का मत था कि ‘‘भविष्य के मापदंड में केवल मानव जाति का नहीं, समस्त प्राणि जगत का ख़्याल रखा जायेगा”। एक स्थान पर उन्होंंने अपना मत दिया है कि “मैं यह निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि ईश्वर ने उन प्राणियों को भी वैसी ही आत्मा दी है जैसी कि मुझे।’’ गाँधी जी मानते थे कि जब मनुष्य अपनी श्रेष्ठता को एक उत्तरदायित्व के रूप में ग्रहण करता है तो वह सम्पूर्ण सृष्टि के प्रति एक नैतिक कर्तव्य को जन्म देता है। यह स्पष्टतः कहा जा सकता है कि गाँधीजी की पर्यावरण दृष्टि का आधार उनका समग्रतामूलक दृष्टिकोण और अहिंसा दृष्टि है। इसी से ही पर्यावरण के अनुकूल जीवन शैली का उद्भव होता है। यह संयोग मात्र नहीं है कि इसी अहिंसक पर्यावरणीय दृष्टि के कारण गाँधीजी जिस जीवन शैली और विचार को स्वीकार करते हैं उसमें भी एकत्व मौजूद है। गाँधीजी की अहिंसक पर्यावरणीय दृष्टि में अनेक अन्तर्दृष्टिया~ भी प्राप्त होती हैं जिनका सामना हमें आज भी करना पड़ रहा है। 

प्राकृतिक संसाधनों को लेकर चलने वाली लड़ाई का एक पक्ष पर्यावरण पर समान अधिकार की आवाज़ भी है। आम जनता की आजीविका की लड़ाई में गाँधीजी ने सशक्त हस्तक्षेप किया जो पर्यावरणीय दृष्टि से भी अनुकूल था। उनके द्वारा प्रतिपादित चरखा और स्वदेशी ने (मशीनों द्वारा संसाधनों के अंधाधुध दोहन पर आधारित) व्यापक उत्पादन के स्थान पर लोगों के द्वारा लघु स्तर पर व्यापक उत्पादन को स्थान दिया जिसका एक सशक्त पर्यावरणीय पक्ष भी है। आज न केवल गाँवों और आदिवासी समूहों में अपितु शहरों में भी आम जनता व कमज़ोर समूह संसाधनों तक पहुँच से वंचित होते जा रहे हैं। संसाधनों के केंद्रीकरण के प्रति गाँधीजी ने सीधी चेतावनी दी थी। ‘‘मैं , नगरों की बढ़वार को एक बुराई मानता हूँ, यह मानव जाति और दुनिया के लिए दुर्भाग्य का विषय है, यह इंग्लैंड और, निश्चित रूप से, भारत के लिए दुर्भाग्य का विषय है। अँग्रेज़ों ने शहरों के माध्यम से भारत का शोषण किया है”। इसी कारण अपनी अहिंसक पर्यावरणीय दृष्टि के कारण गाँधीजी ने एक ऐसी जीवन शैली के प्रयोग किए जिसमें गाँव केंद्र में था। इसी को केंद्र बना कर ‘महासागरीयवलय’ की राष्ट्रीय परिकल्पना प्रस्तुत की। इसमें विकेंद्रीकरण, रचनात्मक कार्यक्रम, ग्रामोद्योग इत्यादि पर ज़ोर था। इन सबका स्रोत तात्विक एकता में निहित था।

उन्होंंने इंग्लैंड प्रवास के दौरान औद्योगीकरण के अभिशाप को देखा था जिसका वर्णन कई बार किया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि उपनिवेशवाद के कारण ख़तरे में पड़े पर्यावरण पर भी अपना ध्यान केंद्रित किया। साम्राज्यवाद को संसाधनों के शोषण के साथ जोड़ कर देखा। भारत का उदाहरण उनके सामने मौजूद था जो इस शोषण का शिकार हो रहा था। उन्होंंने चेतावनी दी कि संसाधनों का यह अंधाधुंध दोहन मानव अस्तित्व के लिए ख़तरा साबित होगा– ‘‘ईश्वर न करे कि भारत कभी पश्चिमी ढंग के उद्योगवाद को अपनाए। अगर तीस करोड़ की आबादी वाला समूचा राष्ट्र पश्चिमी ढंग के आर्थिक शोषण पर उतर आए तो वह टिड्डी दल की तरह सारी दुनिया को चट कर जाएगा।’’ गाँधीजी के कथन का संदर्भ हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्र भारत में हमने उसी उद्योगवाद और आर्थिक शोषण को अपनाया जिसके प्रति गाँधीजी ने आगाह किया था परिणामस्वरूप आंतरिक उपनिवेशवाद को जन्म दिया।

यदि आप गाँधीजी की पर्यावरणीय दृष्टि का परवर्ती व समकालीन पर्यावरणीय विचारों एवं आंदोलनों पर असर देखना चाहते हैं तो इसका एक तरीक़ा इन विचारों एवं आंदोलनों को उपर्युक्त बतायी गयी कसौटियों पर खरा उतरना होगा। बहुत से पश्चिमी विचारकों में गाँधी जी की विचारों की प्रतिमूर्ति दिखती है जिनमें प्रमुख हैं अर्नेनेस्स (गहन पारिस्थितिकी), ई,एफ. शूमाकर इत्यादि। इन सब के विचारों को गाँधीजी की पर्यावरणीय दृष्टि का ही विस्तार कहा जा सकता है साथ ही विभिन्न पर्यावरणीय आंदोलनों को भी गाँधी दृष्टि के आंदोलन कहा जा सकता है। गाँधी जी का मानना था कि बड़े बड़े शहरों ने पलट कर गॉंवों का शोषण किया है। शहरों का भवन-निर्माण गाँवों की रक्तरूपी सीमेंट से हुआ है। वे कहते थे कि, “मैं चाहता हूँ कि जो रक्त आज नगरों की धमनियों में बह रहा है, वह फिर एक बार गाँवों की रक्तवाहिकाओं में बहने लगे"। गाँधीजी की पर्यावरणीय दृष्टि का एक सशक्त आधार है जो अस्तित्वमूलक एकता से चालित होता है। उनकी एक प्रसिद्ध उक्ति हर समय के लिए एक महत्वपूर्ण मार्ग निर्देशक है कि “संसार में इतने संसाधन है कि वह प्रत्येक व्यक्ति की आवश्यकता पूरी करने में समर्थ है किन्तु यह एक व्यक्ति के लालच के लिए भी पर्याप्त नहीं है”। महात्मा गाँधी ने अपने प्रकृति चिन्तन में निम्न बिन्दुओं को महत्व दिया था–

  • स्वच्छता,

  • ग्रामों की आत्मनिर्भरता - ग्राम स्वराज,

  • कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन,

  • आयातित उपभोक्ता वस्तुओं पर नियंत्रण,

  • कृषि में सुधार,

  • अक्षय समाज,

  • आर्थिक समानता,

  • अहिंसा तथा जीवों के प्रति संवेदना।

 महात्मा गाँधी के अनुसार ग़रीबों का शोषण रोकने के लिये बड़े-बड़े उद्योग-धन्धों और ग्रामोद्योगों को साथ-साथ संचालित करना चाहिये। गाँधीजी का सोचना था कि औद्योगीकरण मानव जाति के लिए अभिशाप है। इससे लाखों नागरिकों को काम नहीं मिलेगा तथा प्रदूषण की समस्या उत्पन्न होगी। आधुनिक विकास के कारण हुई पर्यावरणीय हानि की अनेक बार क्षतिपूर्ति संभव नहीं होती। गाँधीजी का विश्वास था कि कुटीर उद्योग तथा ग्रामोद्योग हज़ारों लोगों को सुविधायें तथा संसाधन उपलब्ध कराते हैं। उन्हे बढ़ावा देने से अनेक लोगों को काम मिलता है तथा राष्ट्रीय आय बढ़ती है। गाँधीजी की सोच थी कि जीवित मशीनों को मृत मशीनों से मुक़ाबला नहीं करना चाहिये। गाँधीजी का ग्रामीण संसाधनों पर आधारित मॉडल पर्यावरण को न्यूनतम हानि पहुँचाता है। उसके उपयोग से हुई पर्यावरणीय हानि का नवीनीकरण या सुधार संभव है। सदियों से भारत एक अधिसंख्यक देश रहा है और गाँधीजी को यह ज्ञात था कि यदि हमारा देश पश्चिम की नक़ल करते हुए मशीनीकरण की ओर भागेगा तो बहुत से लोग बेरोज़गार हो जायेंगे। इसलिए गाँधी जी का यह भी कहना था कि जहाँ मानव श्रम द्वारा काम संभव नहीं हो तभी जन उपयोगी भारी भरकम कामों को मशीनों से कराया जाय। गाँधी जी के अनुसार, मशीनीकरण तभी उपयोगी है जब काम करने वाले व्यक्तियों की संख्या कम तथा जल्दी कार्य पूरा करने की अनिवार्यता हो। भारत में मज़दूरों की संख्या बहुत अधिक है इसलिए मशीनों का उपयोग हानिकारक है। इस सोच के कारण, वे मशीनों के प्रति अत्यधिक रुचि के विरुद्ध थे। वे, ऐसे उपकरणों के पक्षधर थे जो अनावश्यक मानव-श्रम को कम करते हैं। वे, विशाल उत्पादन नहीं, अपितु बहु-श्रमिक उत्पादन चाहते थे। इसके साथ ही साथ उन्हें इस बात की पूरी जानकारी थी कि भारी मशीने अंधाधुंध प्रदूषण फैलाएँगी, जिस की चपेट में आ कर हज़ारों लोगों की जानें समय से पूर्व ही काल कवलित हो जायेंगी। महात्मा गाँधी जी का निश्चित रूप से यह मानना था कि:

  • विश्व में एक नियमितता है। जो भी अस्तित्व में होता है उसके नियमन के लिए अपरिवर्तनशील नियम है। अन्धा नियम, किसी भी मनुष्य के व्यवहार को नियमित नहीं कर सकता।

  • हम, विश्व में वनों के प्रति जो कुछ कर रहे हैं वह केवल उसका प्रतिबिम्ब है, जो हम अपने तथा एक दूसरे के साथ करते हैं।

  • विकास का त्रुटिपूर्ण ढाँचा, गाँवों से शहरों की ओर पलायन को प्रोत्साहित करता है।

 यद्यपि उनका लगभग सम्पूर्ण जीवन ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध संर्घष में बीता, किन्तु वे सदा सर्वदा प्रकृति तथा शान्ति से जुड़े रहे। उनकी ताक़त, उनका आत्मबल था। उनका संदेश पर्यावरण संरक्षण तथा समग्र विकास आधारित था। उनके सन्देश, भारत ही नही अपितु सम्पूर्ण विश्व के लिए आज भी उपयोगी हैं। भारत में ग़रीबी, बेरोज़गारी, आय की असमानता, भेद-भाव इत्यादि को देखते हुए गाँधी जी ने चरखे के उपयोग को, प्रतीक के रूप में, प्रोत्साहित किया था। उनका उद्देश्य, खादी तथा ग्राम आधारित उद्योगों को प्रोत्साहित कर बेरोज़गारी तथा ग़रीबी को कम करना था। गाँधी जी का पूरा जीवन तथा उनके समस्त कार्य, मानवता के लिए पर्यावरण सम्बन्धी विरासत हैं। उन्होंंने जीवन पर्यन्त, व्यक्तिगत जीवन शैली द्वारा, समग्र विकास की अवधारणा को प्रतिपादित किया। इस के अतिरिक्त गाँधी जी यह भी चाहते थे कि देश के सभी राज्यों में सभी को एक समान अवसर मिले जो कार्य, राज्य की अधिकारिता में हों तथा जन-कल्याण उसका उद्देश्य हो। केन्द्रीकृत तथा विकेन्द्रीकृत तरीक़ों से उत्पादन किया जाए। आय तथा धन का वितरण समान हो तथा जन साधारण के हित साधे जा सकें। आज का हमारा पंचायती राज्य व्यवस्था महात्मा गाँधी जी के इन्हीं विचारों से ही प्रेरित है।

महात्मा गाँधी के प्रकृति चिन्तन के विपरीत आज का मानव अंतरिक्ष में कॉलोनी, रोबोट द्वारा चलित मशीनें, कम्प्यूटर जैसी बुद्धि का विकास करने के लिये लगातार प्रयासरत है। उपरोक्त नियति निर्धारण के कारण, विश्व में उपभोग की प्रवृत्ति तथा विविध उत्पादनों में अप्रत्याशित वृद्धि हो रही है जिसके कारण, वैश्विक पर्यावरण तथा स्थानीय मौसम पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। इसके उदाहरण हैं – वैश्विक ऊष्मता में वृद्धि, ओज़ोन परत का ह्रास, अम्लीय वर्षा, समुद्र स्तर में वृद्धि, वायु, जल तथा भूमि संक्रमण और मरुस्थलों के क्षेत्रफल में हो रही वृद्धि। यह वही नियति है जिससे बचने की बात महात्मा गाँधी ने अपने प्रकृति चिन्तन में कही है। परन्तु हम देखते हैं कि महात्मा गाँधी के प्रकृति चिन्तन से सम्बन्धित संदेश आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि उनके लेखों तथा विचारों में पर्यावरण सम्बन्धी दृष्टिबोध तथा पर्यावरण पर काम करने वालों के लिए कालजयी मार्गदर्शन मौजूद है इसलिये उपभोक्तावाद से त्रस्त अनेक लोग, गाँधी दर्शन में मुक्ति तथा विकास का मार्ग खोज रहे हैं। आज से एक शताब्दी पूर्व 1909 में गाँधीजी ने पश्चिमी समाज के आनन्द तथा समृद्धि की अंतहीन दौड़ को, समूची धरती तथा उसके संसाधनों के लिए गंभीर ख़तरा माना था। उनके लेखों को हिन्द स्वराज में संकलित किया गया है। इस पुस्तक में उन्होंंने पश्चिमी समाज को, उनकी जीवनशैली के दुष्प्रभावों के प्रति सचेत किया है। इसके साथ ही उन्होंंने भारतवासियों से अनुरोध किया है कि वे भौतिक लाभों के लालच में न उलझें। 

महान नेता और स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ ही गाँधी जी प्रकृति और पर्यावरण के प्रति भी विशेष प्रेम रखते थे। उन्होंंने पर्यावरण के प्रति सौ साल पहले ही वो चिंता व्यक्त की जो वर्तमान संदर्भ में प्रासंगिक है। गाँधी जी का ये कथन पर्यावरण के प्रति उनकी चिंता साफ़ ज़ाहिर करता है कि "प्रकृति के पास सभी की ज़रूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं लेकिन वो किसी का लालच पूरी नहीं कर सकती।" इस वर्ष 2 अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की 150वीं जयंती थी। गाँधी जी के जन्म के 150 साल पूरे होने के बाद भी उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं। सत्य और अहिंसा के प्रति उनके अनूठे प्रयोग उन्हें आज दुनिया का सबसे अनूठा व्यक्ति साबित करते हैं। मैं एक ऐसे दूर-द्रष्टा, महा मानव के चरण कमलों में अपना नमन करते हुए, उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए अपने सभी देशवासियों से अपील करना चाहता हूँ कि वे इस महामना महान आत्मा के जीवन से प्रेरणा लेते हुए मानव जीवन के अस्तित्व के ऊपर आई हुई पर्यावरणीय चुनौतियों से सामना करने में उनके द्वारा सुझाई गयी विधियों का सहारा अवश्य लेवें जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी कि पूर्व में।

(अनिल कुमार मिश्र)
प्रधान वैज्ञानिक
भूमि एवं जल संसाधन संरक्षण व प्रबंधन
जल प्रौद्योगिकी केंद्र भारतीय कृषिं अनुसंधान परिषद्, संस्थान, नई दिल्ली ११००१२
दूरभाष: ९५९९१३७८४४

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