अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

हल और बैल

काफ़ी समय पहले की बात है। एक गाँव में एक किसान रहता था। वह रोज़ सुबह हल और अपने बैलों के साथ खेत पर पहुँच जाता। खेतों को जोतता-बोता। ख़ूब मेहनत करता। उसके खेत भी सोना उगलते थे। भरपूर फ़सल होती जिसे बेच कर किसान आराम से रहता था।

किसान बहुत अच्छा था। वह बैलों की भी ख़ूब सेवा करता। रोज़ हरी-हरी घास खिलाता। उन्हें नहलाता फिर उनकी मालिश करता। इससे उसके बैल भी ख़ूब तंदुरुस्त हो गये थे। किसान ने उनके गले में सुंदर सी घंटिया बाँध दी थीं। जब वे चलते तो घंटियों की आवाज़ सुन उसे बहुत अच्छा लगता।

किसान हल का भी बहुत ध्यान रखता था। रोज़ उसकी धूल साफ़ करके उन्हें चमकाता। तीज-त्योहारों पर उनकी पूजा करता।

धीरे-धीरे बैलों और हल को अपने-अपने ऊपर बहुत घमंड हो गया। बैलों को लगता कि किसान के घर ख़ुशहाली उनके कारण है। अगर वे खेत जोतने न जायें तो वहाँ एक दाना भी पैदा न होगा। उधर हल को लगता कि खेतों की असली जुताई तो वे करता है। बैल तो खाली खेत में टहलते रहते हैं।

एक दिन दोनों में बहस हो गयी। बैलों ने कहा, "खेत हम जोतते हैं। उसमें सारी मेहनत हमारी लगती है। इसीलिये किसान हमें अपने हाथों से खिलाता है।"

"जी नहीं, धरती का सीना फाड़ कर ताज़ी मिट्टी बाहर हम लाते हैं। इसलिये असली जुताई हमारी हुई। तभी किसान हमारी पूजा करता है," हल ने अकड़ते हुये कहा।  

दोनों में झगड़ा बढ़ गया तो वे फ़ैसला कराने किसान के पास पहुँचे। किसान दोनों को बराबर प्यार करता था। कुछ सोच कर उसने बैलों से कहा, "तुम्हारा कहना सच है। तुम बहुत मेहनत करते हो। जाओ आज खेत तुम जोत आओ।"

बैल ख़ुशी से उछलते-कूदते खेत पहुँच गये। वे पूरा दिन खेत में चलते रहे। शाम को किसान ने आ कर देखा खेत ज़रा सा भी नहीं जुता था। किसान ने कुछ नहीं कहा। वह बैलों को ले कर चुपचाप घर लौट आया।

अगले दिन वह हल को कंधे पर लाद कर खेत पर पहुँचा। वहाँ उसने हल के नुकीले फल को ज़मीन के भीतर घुसा दिया फिर बोला, "तुम भी मेरे लिये बहुत मेहनत करते हो। आज यह पूरा खेत तुम जोत डालो।"

हल को वहीं छोड़ किसान घर लौट आया। बैल खेत में बहुत धीरे-धीरे चलते थे इसलिये ज़्यादा जुताई नहीं हो पाती थी। आज हल को अपनी क़ाबलियत साबित करने का मौक़ा मिला था। उसने सोचा कि शाम होने से पहले ही वह पूरा खेत जोत डालेगा।

किसान के जाने के बाद उसने खेत को जी भर कर देखा फिर उसे जोतने आगे बढा। मगर यह क्या? वह तो अपनी जगह से टस से मस भी नहीं हो पाया। जिस खेत को वह दौड़ते हुये जोतता था आज उसमें हिल भी नहीं पा रहा था। उसने बहुत ज़ोर लगाया। पसीने से तर-बतर हो गया पर एक इंच भी आगे न खिसक सका। 

शाम को किसान आया तो देखा आज भी खेत ज़रा सा भी नहीं जुता था। उसने कुछ नहीं कहा। चुपचाप हल को भी घर ले आया।

हल और बैल, दोनों ही अपनी-अपनी असफलता से बहुत दुखी थे। दोनों एक दूसरे से आँखें चुरा रहे थे। यह देख किसान ने समझाया, "हम सबकी शक्ति एकता में है। अलग-अलग हो कर हम सब अधूरे हैं। इसलिये  आपस में लड़ने के बजाय अगर हम मिल जुल कर काम करें तो कोई भी काम असंभव नहीं है।"

बात हल और बैल की समझ में आ गयी। दोनों में एक बार फिर दोस्ती हो गयी। अगले दिन जब बैल घंटियाँ बजाते हुये खेत की ओर चले तो किसान ने हल को अपने कंधों पर लाद लिया। उस दिन सभी ने मिल कर ख़ूब जुताई की। थोड़े ही दिनों में खेतों में हरी-भरी फ़सल लहलहाने लगी। 

तभी से इन तीनों की दोस्ती आज तक क़ायम है। 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

आसमानी आफ़त
|

 बंटी बंदर ने घबराएं हुए बंदरों से…

आख़िरी सलाम
|

 अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में…

इमली
|

"भैया! पैसे दो ना!" वैभव ने कहा …

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कहानी

सांस्कृतिक कथा

लघुकथा

किशोर साहित्य कहानी

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

बाल साहित्य कहानी

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं