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सहज व्यंग्य में चौंकाते हुए प्रहार

पुस्तकः बंटी, बबली और बाबूजी का बटुआ (व्यंग्य संग्रह)
लेखकः श्री दीपक गिरकर
प्रकाशकः रश्मि प्रकाशन, 
204 सनशाइन अपार्टमेंट, 
बी-3, बी-4 कृष्णा नगर, लखनऊ-226023
मूल्य: 175 रु.


व्यंग्य लेखन में निरंतर नए प्रयोग हो रहे हैं और छोटे-छोटे मारक व्यंग्य निबंध या व्यंग्य कथाएँ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से धड़ल्ले से प्रकाशित हो रही हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि व्यंग्य की माँग अधिक है। व्यंग्य को चाव से पढ़ने वाले पाठक हैं इसलिए व्यंग्य ने संपादकीय पृष्ठ के आसपास समाचार पत्रों में अपनी जगह सुनिश्चित कर ली है। व्यंग्य की इस तेज़ बहती धारा में अपनी नौका लेकर श्री दीपक गिरकर भी उतरे हैं। उनकी किताब “बंटी, बबली और बाबूजी का बटुआ” शीर्षक में अनुप्रास का हास्य है तो भीतर पचास रोचक शीर्षकों के साथ व्यंग्य रचनाएँ। समालोचना के क्षेत्र में दीपक गिरकर एक परिचित नाम है। दीपक गिरकर निष्णात बैंकर रहे हैं। उनकी पहली किताब “एनपीए एक लाइलाज बीमारी नहीं” थी तो इस संकलन में उनके बैंकिंग अनुभव व्यंजना के साथ प्रस्तुत हुए हैं। खेल मंत्री जी को पत्र में वे अपने अनुभव बताते हुए कहते हैं – “कबड्डी का खेल नहीं खेला परंतु अपने विरोधी की टाँग कैसे खींचनी है, यह मैं अच्छी तरह से जानता हूँ।” सेंसर बोर्ड पर व्यंग्य करते हुए वे कहते हैं – “सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष और इस बोर्ड के सदस्यों को भाषा का ज्ञान हो या न हो, कैंची चलाने का दस वर्ष का प्रशासनिक अनुभव ज़रूरी है।” किताब के शीर्षक व्यंग्य में आये बंटी के चरित्र चित्रण के बहाने वे सरकारी बैंकों का पर्दाफ़ाश इस तरह करते हैं – “बंटी हमेशा सोलह सौ के हज़ार कर देता है। सरकार सार्वजनिक बैंकों में बार-बार पूँजी डालकर नहीं थकी है। बाबूजी का बटुआ तो एलआयसी की तरह है, ज़िंदगी के साथ भी और ज़िंदगी के बाद भी।” बैंक प्रबंधन पर उलाहना देते वे लिखते हैं “ब्रांच मैनेजर आपसे मीठा-मीठा बोल कर अपना काम निकलवा कर, पदोन्नति लेकर दूसरी बड़ी शाखा में चले जाते हैं और आप क्या ज़िंदगी भर कलम भाँजते रहोगे कि कुछ तरक़्क़ी भी करोगे।” दीपक यह तंज डिनर डिप्लोमेसी में अधिक मुखर हो जाता है – “इस रात्रि भोज में बैंक के कौन-कौन से बड़े अधिकारी शामिल हुए थे, कौन-कौन से अधिकारी बोतल में कितने उतरे थे या कौन-से अधिकारी बोतल की जगह टब में ही उतर गए थे।” 

अपनी व्यंग्य रचनाओं को कहीं दीपक आलेख की तरह लिखते हैं तो कहीं-कहीं कथाओं में। कहीं फेंटेसी है तो कहीं पैरोडी। वे अपने विषय के निर्वाह के लिए अलग-अलग तकनीकों से उकेरे व्यंग्य को एक रस होने से बचाते हैं। आउटसोर्सिंग एजेंसी द्वारा आत्माओं की शिफ्टिंग इस संकलन का पहला व्यंग्य है। आउटसोर्सिंग एजेंसी के बहाने निजी अस्पतालों की कार्य प्रणाली पर व्यंग्य देखिये – “निजी अस्पताल के डॉक्टर मरीजों को यमदूतों के सहयोग से कई-कई दिनों तक वेंटिलेटर पर रखकर अपनी जेब भरने में लगे रहते हैं।” यमदूतों के सहयोग का एक और पंच है – “ये शिफ्टिंग में इतने निपुण थे कि एक पार्टी के सारे विधायकों-सांसदों को दूसरी पार्टी में शिफ्ट कर देते थे।” दीपक गिरकर ने आम बातचीत में शामिल तकिया-कलामों को बड़ी ख़ूबसूरती से व्यंग्य का विषय बनाया है। चिंता की कोई बात नहीं में वे पत्नी को दिलासा देते हुए कहते हैं – “फेल होने वाले बच्चों में सबसे अधिक मार्क्स अपने मुन्ना के ही आए हैं।” 

व्यंग्य में दीपक के सांकेतिक तंज पाठकों को गुदगुदाते रहते हैं जैसे – “जुगाड़ शब्द को अंततः मान्यता देते हुए ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में शामिल कर लिया गया है।” उनके भिन्न-भिन्न लेखों से लिये ये वाक्यांश बताते हैं कि दीपक अपने व्यंग्य में किस तरह सहज ही चौंकाते हुए प्रहार कर जाते हैं। “गायों को आधार कार्ड मिलने की खबर से इतनी खुशी हो रही है कि उन्हें लग रहा है जैसे उनको लाल बत्ती मिलने वाली हो।” “जिस प्रकार घोड़ा घुड़सवारी को दुलत्ती मार देता है उसी प्रकार दलबदलू नेता भी सरकार में शामिल होकर हर समय दुलत्ती मार कर सरकार को धमकाते रहते हैं। घोड़ों, क्रिकेट खिलाड़ियों और नेताओं में सबसे सस्ते देश के नेता हैं जो आसानी से बिकने को तैयार हो जाते हैं।” “आजकल सत्ता पक्ष से विपक्षी सांसदों और विधायकों के सुर इतने जल्दी-जल्दी मिलने लग गए हैं कि यदि किसी प्रकार नेताओं के सुर मिलते चले गए तो एक दिन हमारे देश की संसद विपक्ष मुक्त हो जाएगी।” सिर पर छत मयस्सर न हो, लेकिन टोपी होना ज़रूरी है। सेंसेक्स अमेरिका के राष्ट्रपति के मूड को देखकर ऊपर नीचे होता है। व्यंग्यकार इकत्तीस मार्च को राष्ट्रीय त्यौहार के रूप में मनाने की पैरवी करते हुए लिखते हैं “इकत्तीस मार्च को हमारे देश के कर्मचारियों की कार्यक्षमता चरम सीमा पर होती है। शायद इस दिन कार्यालयों में लंच टाइम भी नहीं होता है। ऐसा लगता है कि उस दिन सारे अधिकारी कर्मचारी घर से ही टंच होकर आते हैं।” फटे हुए दूध से गुलाब जामुन बनाने की नाकाम कोशिश जैसे रोचक शीर्षक से शुरू कर वे लिखते हैं कि “मैंने उनकी एक-एक रचना को पाँच-पाँच बार पढ़ा किंतु मैं उनकी रचनाओं को समझ नहीं सका। मुझे यह मालूम है कि बड़े साहित्यकारों की रचनाएँ आसानी से समझ में नहीं आती हैं।” 

पचास व्यंग्य रचनाओं की इस प्रस्तुति में दीपक ने संकलन की पठनीयता को बरकरार रखने की सार्थक कोशिश की है। अपने पहले संकलन के माध्यम से उन्होंने अपने व्यंग्य की धारदार बानगी प्रस्तुत की है जो निश्चित ही उनके आगामी व्यंग्य कर्म के बेहतर और तीक्ष्ण होने का संकेत भी है। सफल और चुटीली व्यंग्य रचनाओं के लिए दीपक को हार्दिक बधाइयाँ।

समीक्षक का पता –
धर्मपाल महेंद्र जैन
1512-17 Anndale Drive, Toronto M2N2W7, Canada
फोन : + 416 225 2415
ईमेल : dharmtoronto@gmail.com

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