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सोने के सींग

पलिया गाँव में हर जाति के लोग रहते थे। उसमें आचार्य बंसीलाल जो कि महाब्राह्मण थे, को दूर-दूर के लोग जानते थे। जब भी किसी की मृत्यु होती वे उसके यहाँ से मन माँगा मृत्यु दान पाते थे। उनके लालच के किस्से गाँव में प्रचलित थे। आचार्य बंसीलाल को इस बार गाँव के ज़मींदार ठाकुर ज्वालाप्रसाद सिंह की तेरहवीं पर बहुत सारा माल और नगदी मिली। वह इतने खुश थे कि उन्होंने सामान गठरियों में ज्यों का त्यों बँधा छोड़ दिया। इसी बीच बंसीलाल को किसी दूसरे गाँव से एक जजमान का बुलावा आ गया कि उसके चाचा का दसवाँ है और उन्हें वहाँ अपनी पत्नी के साथ सुबह-सुबह ही जाना पड़ गया। जाते समय बंसीलाल ने अपने १८ वर्षीय बेटे जिसका नाम गोकुल था के कान में चुपके से कह दिया कि किसी को घर पर न आने देना और अगर बाहर जाना हो तो दरवाज़े में ताला लगा देना। गोकुल हाँ हाँ करता गया और जैसे ही माता-पिता बाहर निकले गोकुल अपने दोस्तों के साथ पड़ोस के घर में बेर के पेड़ पर चढ़ गया। बेर पके हुए थे और बहुत मीठे थे। सब लोग बेरों में मस्त हो गए।

कुछ देर के बाद एक भिखारी घोड़े पर सवार वहाँ से निकल रहा था। उसने देखा कि पेड़ पर कुछ लोग बेर तोड़ रहे थे। उसने गोकुल को देखा और आवाज़ दी,

“अरे नीचे आ! मैं तेरी किस्मत बदल दूँगा।“

गोकुल तुरन्त पेड़ से नीचे उतर आया और उसने भिखारी से पूछा, “कैसे?”

भिखारी ने कहा, “तुम मुझे अपने घर पर ले चलो।“

गोकुल उसे घर की ओर ले गया। गोकुल के दरवाज़े पर उसकी गाय बंधी हुई थी। भिखारी ने गोकुल से कहा कि मैं तुम्हारी गाय के सींग सोने के कर सकता हूँ अगर तुम कुछ नगदी और सामान मुझे दो। गोकुल तुरन्त घर के अन्दर गया और जो सामान बँधा हुआ रखा था सब कुछ भिखारी को दे दिया। भिखारी ने सारा सामान अपने घोड़े पर लाद लिया। फिर उसने गोकुल से चुपके से उसके कान में कहा,

“तुम इस गाय के दोनों सींग पकड़ कर रखना और अपनी आँखें बन्द रखना। कोई भी बुलाए तुम आँखें मत खोलना। जब सींग सोने के हो जायेंगे मैं तुम्हें आवाज़ दूँगा।“ इतना कहकर भिखारी घोड़े पर सवार होकर वहाँ से चला गया।

गोकुल बहुत सरल और बिना पढ़ा-लिखा था, वह भिखारी की बातों में आ गया और गाय के सींग पकड़े, आँखें बन्द किये हुए खड़ा था और सोच रहा था कि जब बापू आयेगा तो उनको खुशी की खबर देगा कि हमारी गाय के सींग सोने के हो गये।

थोड़ी देर में माता-पिता जी आ गए और उन्होंने गोकुल को गाय के सींग पकड़े हुए देखा, वे तुरन्त समझ गए कि कोई उसे बेवकूफ़ बना गया है। पिता जी गोकुल के पास गये और डाँटते हुए बोले, “अरे मूर्ख यह क्या कर रहा है?”

गोकुल ने पिता जी को इशारे से रोकना चाहा लेकिन पिता जी ने क्रोध से उसके हाथ से गाय के सींग छुड़वा दिये। गोकुल कहता रहा कि पिता जी देखो आपने क्या कर दिया। आज इस गाय के सींग सोने के हो जाते अगर आप मेरी आँखें न खुलवाते। पिता जी ने गोकुल से सारी बात पता की और जब उन्हें मालूम हुआ कि घोड़े वाला भिखारी उनका सारा माल और नगदी ले गया है वह बहुत क्रोधित हुए। किन्तु भिखारी बहुत दूर जा चुका था और रात होने लगी थी। आचार्य बंसीलाल अपने बेटे की मूर्खता पर बहुत दुखित हुए किन्तु कुछ भी न कर सके।

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