जीतेगी तू
कथा साहित्य | कहानी अनिता रश्मि1 Jan 2026 (अंक: 291, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
पुरी का वह मनोरम तट! उसे चूमने बार-बार आतीं सागर की उत्ताल लहरें! लौटतीं लहरों से टकरा जातीं और ज्वार-भाटे का अनुपम, अद्भुत दृश्य रच जाता।
उन्हीं लहरों की कश्ती पर बैठी हिचकोले खा रही थी सुरभि।
साथ आई दीदिया ने कई बार उसे बाँहों से पकड़कर उठाने की कोशिश की। उठा नहीं पाई।
यह कोशिश आज से नहीं, पिछले चार सालों से चल रही थी। यहाँ ही नहीं, उनके अपने क़स्बे के घर-गलियारे में भी, शहर की गलियों में भी। सुरभि के साथ दीदिया के अलावा उसके अम्मा-बाबा भी थे।
“सुरभि! चल, उठ इन लहरों पर टहलते हैं।”
शून्य में ताकती सुरभि ने कहाँ सुना।
“उठ न।”
. . . . . .
“अच्छा चल, थोड़ा आगे चलकर बैठते हैं। लहरें हमें भिगोती रहेंगी।”
“चल न, इन लहरों संग मन भी तो सराबोर होता है।”
सुरभि के कानों पर अब भी जूँ नहीं रेंगी। दीदिया ने उसके काँधे पर हाथ रखा।
“सुरभि, विगत को भूलना ही जीवन है। जिन पर हमारा बस नहीं, उसे भुलाकर ही हम पुनः जी सकते हैं।”
“यहाँ जीना कौन चाहता है!”
सुरभि की आवाज़ गहरे गह्वर से। दीदिया सिहर गई।
अच्छा हुआ अम्मा-बाबा होटल में ही रुक गए। वह एकटक सुरभि की आँखों में ताकती कह उठी, “ऐसा नहीं कहते। तुम्हारा क्या दोष? . . . तुम क्यों जान दोगी। जान तो जाएगी उनकी, जिन्होंने . . .”
“. . . क्यों बहला रही हो? चार साल से क्या हो रहा है, तुम नहीं जानती क्या।”
सुरभि के पपड़ाए घाव खुरच से गए। नीची निगाहें अपनी बड़ी बहन की ओर उठीं।
“न्याय मिलेगा दीदिया? है उम्मीद?”
इन आँखों की ताब! पूरे घरवालों को हिलाकर रख देती हैं ये आँखें!
फिर सुरभि ने घुटनों में सर गाड़ लिया। लहरें भिगोती रहीं उसे, वह अनभीगी रही। समंदर के अथाह नीले जल के थपेड़े उसके क़रीब से गुज़र जाते रहे। ज़िन्दगी के थपेड़ों की चोट गहरी थी।
आँखें नहीं बहतीं अब लेकिन उसकी आँखों का पानी समुद्र के पानी से ज़्यादा खारा है। उसके सीने में समुंदर से ज़्यादा गहराई है।
उसी के बग़ल में बैठी रही दीदिया। कभी पीठ सहलाती हुई, कभी उसके हाथों को अपनी हथेलियों में दबाए। लोग आते रहे, लोग जाते रहे। किनारे पर श्वेताभ जल पर धरकर पाँव लोग टहल रहे थे। उनकी चहलक़दमी भी सुरभि का ध्यान भंग नहीं कर पा रही थी।
सुरभि की यादों में खुबा था, दीघा का सागर तट और उस पर की गई अठखेलियाँ! . . . मनोज का सान्निध्य और उसके साथ बिताए गए अनगिन पल। किनारे की भीगी रेत पर अन्य जोड़ों की तरह पाँवों के निशान पर पाँव रखकर चलना भी तो याद है। गीली रेत से सपने के घरौंदे बनाना भी। हाँ, अब तक।
दीघा उसके भीतर जन्म ले चुका था और वह दीघा को जी रही थी। लेकिन दीघा उसमें गुलाब नहीं, काँटे बो रहा था। चाँद तले बैठने का इरादा पता नहीं क्यों, सुरभि ने अचानक बदल दिया था।
उसने किसी को नहीं बताई थी, दीघा के रत्नाकर की लहरों और मनोज के संग की गई यात्रा की बातें। वे उसके जीवन के अनमोल लम्हे थे, अब दर्दनाक लम्हों में ढल गए थे।
वह सुबह से रात ढले तक वहाँ रही थी। और फिर वापसी। वहाँ तट पर ही मनोज के तीन मित्र मिले थे। सब बड़ी कंपनियों में सेवा देनेवाले। सूटेड-बूटेड, शिक्षित, वेल विहेव्ड! . . . पर नयनों की भाषा में कुछ तो खटकनेवाला था। ऐसा कुछ, जो चाँद तले उस ठंडी रात में दीघा की समुद्री मादक, हसीन, मदिर-मदिर हवा के बहते सागर और लहरों के हहराते शोर से न चाहते हुए भी दूर जाने के लिए उसे विवश कर रहा था।
♦ ♦
अभी पुरी के समंदर के निकट दोपहर से शाम हो गई, क्षितिज की लालिमा जल को स्पर्श कर ख़ूबसूरती का संगीत रच गई लेकिन सुरभि के मन की ज़मीन बंजर।
दीदिया बीच-बीच में कुछ बोल, समझा रही थी लेकिन उसके पल्ले कुछ भी तो नहीं पड़ रहा था। रात ढली, ठंड बढ़ चली, तो लगभग खींचते हुए दीदिया उसे होटल के कमरे में ले आई।
माँ-पिता के चेहरे पढ़े नहीं जाते उससे। वह उनकी ओर देख कहाँ पाती है, अभी भी नहीं देखा। तीनों बेवजह हँसने-बतियाने में लग, सुरभि का मन बहलाने की नाकाम कोशिश करने लगे।
‘'किसको फुसला रहे हैं आप तीनों?’ वह अक्सर ऐसे समय में मन ही मन कहती। अभी भी कहा।
‘. . . आपकी आँखों की नमी में सब छुपा है बाबा-अम्मा!’ यह भी तो कहती रहती है मन ही मन। वह जानती है, बाबा, अम्मा का क़स्बा उनके दिल-दिमाग़ से छूटता नहीं, भले तीनों बच्चे आगे बढ़ गए हैं।
‘मैं जानती हूँ, एक दीदिया ही है आप लोगों के संस्कारों में ढली राजा बेटी। न मैं . . . न ही मेरा एम.डी. भाई सुदीप। कभी खोज-ख़बर भी लेने नहीं आता। आपका क़स्बाई जीवन शैली, गँवई-क़स्बाई सोच उसे कब पसंद थी।’
उसने नहीं सोचना चाहा, पर अपने बस में है क्या?
“सुरभि! . . . वहाँ अच्छा लगा बेटा?”
जवाब सुरभि ने नहीं दिया। दिया दीदिया ने, “अच्छा क्यों नहीं लगेगा अम्मा! इत्ती ख़ूबसूरत जगह है। इस समय सागर की लहरों का शोर कितना बढ़िया लगा न सुरभि? . . . हम लोगों ने ख़ूब इंज्वाय किया।”
जब देखो, दीदिया को झूठ बोलने की ज़रूरत पड़ ही जाती है। उसे सबको सँभालना जो है। एक साथ अम्मा की बी.पी. बाबा के सुगर, सुरभि के डिप्रेशन को। अब तो अम्मा-बाबा को भी डिप्रेशन। मैनेजमेंट की पढ़ाई में अव्वल। और नौकरी में भी सबसे अच्छा मैनेजमेंट। दीदिया सँभाल ही लेती है वह सब कुछ घर-बाहर का।
तभी तो उसे बुलाया गया है। और वह ससुराल, ऑफ़िस की ज़िम्मेदारी छोड़ नैहर को सँभालने दो महीने से नैहर के साथ है। दीदिया की उपस्थिति से सबका डिप्रेशन कुछ तो कंट्रोल में रहता है। वही तो थी, जिसने हिम्मत थमाई थी। अम्मा-बाबा का कृशकाय शरीर, मुलायम वृद्ध दिल तो ढह ही चुका था।
वे एक छोटे से गाँव के थे। धीरे-धीरे वह क़स्बे में ढल गया था। स्कूल, अस्पताल, रोड, अच्छी दुकानें, सिनेमा हाॅल बन गया था वहाँ। बदलते परिवेश में अनेक प्रतिभावान बच्चे सपनों की खेती करते। वे शहरों को आबाद करने लगे थे। उन्हें उनका प्राप्य मिलने भी लगा था।
दीदिया और सुरभि को थोड़ी मुश्किल हुई थी। पर किसी तरह उन्होंने अम्मा-बाबा को राज़ी कर ही लिया था और शहर में उच्च शिक्षा उनके लिए सुलभ हो गया था।
“बाबा! यह समय चुप बैठे रहने का नहीं है और न ही रुलाई को गटकते रहने का। हमें लड़ना होगा।”
“हम समर्थ नहीं हैं बेटा। ऊपर से उतनी परेशानी . . . ख़र्च . . . बदनामी!”
“बदनामी? . . . उसकी होनी चाहिए बाबा, जिसने सुरभि के विश्वास को तोड़ा है . . .। तीन-तीन फ़्रेंड बुला लिया पार्क के पास . . . सब कुछ प्री-प्लैंड! नहीं!! हमें हर हाल में लड़ना ही होगा।”
“समाज से कोई लड़ नहीं सकता बेटा।”
बाबा बाबूजी के चोले को बदल नहीं पाते।
“समाज! कौन-सा समाज? जब बेटियों के साथ ग़लत होता है, कोई बचाता नहीं। और बाद में उन्हें ही दोषी ठहरा देता है।”
दीदिया बिफरी थी।
सुरभि को भी पता था वह क़िस्सा भी। अपने क़स्बे के हाॅस्टल की चार-पाँच लड़कियों की बेइज़्ज़ती। और बाद में उन्हीं के साथ छुआछूत। चापानल से पानी तक नहीं भरने देते उनके ही क़स्बे के लोग। गाँवों-कस्बों में भी इतनी आधुनिकता आ गई लेकिन . . .
“दीदिया! . . . बाबा ठीक कह रहे हैं।”
बहुत धीमी आवाज़ निकली थी सुरभि की। वह सर उठाकर चल नहीं पाती है। हर आँख जैसे छेद डालने को आतुर। सबमें उपालम्भ, “और जाओ सहर। बियाह के उमर में . . .”
सर झुकाकर बैठी अम्मा का सर भी हौले से हिला था। न में नहीं, हाँ में। एकदम से ख़ुश हो उठी थी दीदिया।
“देखिए, बाबा देखिए। अम्मा हिम्मत कर रही है। वही सबसे हिम्मती है।”
फिर तो चार वर्ष पूर्व उनके घर में बहस-मुबाहिसे के बाद अंततः सब राज़ी।
उतनी भागदौड़! . . . एफ़.आई.आर. . . वकील . . . कोर्ट . . . अस्पताल . . . टेस्ट! पत्रकार, अख़बार, चैनल . . . बाप रे! कितना लंबा चक्कर सब इसी दीदिया के साथ, दीदिया के ही भरोसे। तब से दौड़ ही रहे हैं। क़स्बे से शहर, शहर से क़स्बा एक किए दे रहे हैं।
♦ ♦
पूरे राज्य से सुनामी की तरह आँधी उठी थी जैसे। धरना-प्रदर्शन, जुलूस, कैंडल मार्च, न्याय की गुहार। दोषियों को फाँसी की सज़ा की माँग। चौराहे पर लटका देने की ज़िद। लेकिन सुरभि ने कहा था, “काट डालो। एक बार मज़े के लिए जीवनभर की सज़ा दो। तभी समझेंगे दरिंदे। बस, एक बार . . . फिर . . .?”
बच्चियों के साथ होनेवाली घटनाएँ पढ़-सुन वह फट पड़ती है। बिखर-बिखर जाता रहा उन सब का मन कई-कई बार।
तारीख़ पे तारीख़, तारीख़ पे तारीख़, तारीख़ पे तारीख़!
तब तक कई ज़हरीले क़िस्से फन उठा चुके थे। हर तरफ़ से लगभग नित्य ही किसी न किसी के रेप की ख़बर से धुँधलाता जाता विश्व। पूरी दुनिया ‘मी टू’ से आक्रांत। स्त्रियों के लिए विश्व के किसी कोने में चैन की साँस नहीं।
समाज का विद्रोह सुस्त पड़ जाता। कैंडल लाइट की लौ बुझ जाती। फिर-फिर उठती। फिर-फिर वही दुहराव! पुनः वही शान्ति!!
सुरभि समझ नहीं पाती, वह किसके दर्द से ज़्यादा टूटी है। अपने? या बच्चियों के?
और उसने फिर माँग रखी। खुलकर इंटरव्यू दिया, “काट दो। एक बार के लिए . . .”
“बहुत सिखा-पढ़ा लिया बेटियों को। अब बेटों को संस्कारी बनाओ। उन्हें संस्कार की घुट्टी पिलाओ।”
“बेटियों की नहीं, बेटों की एक-एक एक्टिविटी पर नज़र रखो . . . सच में सुधार चाहते हो? . . . तो। नहीं? . . . तो भोगो।”
मीडिल स्कूल की टीचर ने सिखाया था न छात्राओं को, नज़रें पहचानना। गुड टच और बैड टच का अंतर। क्या हुआ? . . . बचपन में ही वह डरने लगी थी हर छुअन से। किसी पर विश्वास नहीं। घर के हों या बाहर के लोग, वे सर पर हाथ रखते स्नेह का और वह तनावग्रस्त। लड़कपन में ही बचपन खो गया। समय से पूर्व समझना भी तो बुरा ही होता है न। स्नेहिल व्यवहार भी आशंकित कर डालता रहा था। खेत-दुकान से आकर चच्चा स्नेह से माथे पर हाथ रखते थे, वह हौले से हटा देती थी। गुड़-चना रखकर भाग आती थी।
युवा होते-होते थोड़ी आश्वस्ति।
ऐसे में कैसे आहिस्ते-आहिस्ते एक रिश्ता पनप गया मनोज संग। साथ पढ़ते, हँसते, खेलते, बतियाते वे पहले फ़्री हुए। फिर रिश्ते में घुला अपनापन। फिर वह प्यार में हौले से ढल गया।
मनोज में ज़्यादा उतावलापन था। लेकिन सुरभि ने रिश्ते को पकने दिया था। फिर कब, किस मोड़ पर चाँद तले मनोज के शब्दों की जुगाली के बहकावे में आकर विवाह पूर्व ही साथ रहने के निर्णय को स्वीकार लिया था, उसे पता ही नहीं चला। सारी क़स्बाई सीखें धरी की धरी रह गईं थीं। पोटली में बांँधकर मिली हिदायतें भी।
“ये क़स्बाई मानसिकता से बाहर आओ सुरभि। तुम मेट्रो सिटी में हो।”
इतनी बार और इतनी तरह से सुना कि . . .
उनके हाई-फाई ऑफ़िस में दोनों की जोड़ी को आदर्श जोड़ी का ख़िताब मिला था। सुतवाँ नाक, गेहुँआ रंग, घने-काले बालोंवाली, टाॅप-जिंसधारी सुरभि की ख़ूबसूरती के सब क़ायल। मनोज भी उन्नीस नहीं था। दोनों के ड्रेसिंग सेंस की भी भरपूर चर्चा होती। ऑफ़िस में दोनों काम में भी सिद्धहस्त! अर्थात् एक शानदार जोड़ी।
पूरे भरोसे से मनोज के साथ रहने लगी थी। और उसी भरोसे ने धोखा दिया। विश्वास जब धोखा देता है, बहुत कुछ बहा ले जाता है। ज़्यादा ही। पता नहीं कब से अपने तीन दोस्तों संग खिचड़ी पकाता रहा था मनोज। दुबले, गोरे, शरीफ़ से नज़र आनेवाले मनोज में इतनी गंदगी होगी, वह सोच भी नहीं पाई थी। एक दिन पार्क में दोनों बैठे थे। सर्दी की शाम ढली थी और पहुँचें थे तीनों सूटेड-बूटेड, वेल लर्न्ड, वेल विहेव्ड फ्रेंड्स। फिर सूने हो गए पार्क में . . .
♦ ♦
हादसे की ख़बर टीवी से मिली थी दीदिया को। पार्क के एक किनारे लावारिस गोश्त की तरह पड़ी सुरभि। चैनल बदल-बदलकर देखा था। गोश्तों की भीड़ में एक और गोश्त का टुकड़ा! आशंकित पहले, “सुरभि लग रही है . . . न . . . नहीं!”
“. . . हाँ, वही तो। यह नारंगी सूट मैंने ही तो दिया था उसे।”
चैनल वालों ने मसाला परोसने में कोई कोताही नहीं बरती थी। अम्मा, बाबा भी आ पहुँचे थे दूसरे ही दिन अस्पताल। एक सप्ताह लग गया था थोड़ा-सा सँभलने में। भाई ने कहा था, “ठीक है, जैसा किया, भुगतो ख़ुद।”
तब से लड़ रही है सुरभि ख़ुद से भी। जगह-जगह अपील। जितना उस दिन झेला, उससे क़तई कम नहीं बाद की तकलीफ़ें। आख़िर हर जगह तो अकेले ही फ़ेस करना है। भीड़ में भी अकेली है वह। ऊपर से अम्मा, बाबा की झुकी आँखें। वे घर से निकलने से भी बचते। हर बार बस से या गाड़ी कर शहर आना भी सम्भव नहीं। फिर भी आते वे। अम्मा हाथ पकड़कर बैठी रहती कोर्ट में। लेकिन दोनों की हथेलियाँ भरपूर थरथराहट से भरी रहतीं। तीनों की छाती धड़-धड़। लौटते हुए कोशिश रहती कि क़स्बा रात के अँधेरे में डूब जाए।
चार साल जैसे एक युग . . . सलीब पर लटके हुए बीते। अब सच में थक गई है वह। अगली तारीख़ मिली अगले महीने के मध्य में। सबने सुरभि का मन बहलाने के लिए पुरी, कोणार्क ट्रिप प्लान किया। शायद कुछ जुड़ सके उसके अंदर। जो टूटा है, टूट रहा दिन-दिन, वह अनकहा है। लेकिन सबको उसका एहसास तो है।
प्रतीक्षा की घड़ियाँ लंबी होती चली गईं। इतनी लंबी कि आस ही टूट चली। कितने हथकंडे आते हैं, बचाव पक्ष के वकीलों को। बारी-बारी सबको आज़माएँ जा रहे हैं।
“जब तक अपने पाँव में बिवाई नहीं फटेगी, तब तक थोड़े न समझेंगे . . . कौन है जो वकील के धोखे को नहीं समझ रहा है। क़ानून से अनभिज्ञ आरोपियों को तिनके का सहारा। पर सहारा कौन दे रहा है, क्या हम नहीं समझते।”
“हम अपने क़स्बे से बाहर क्या यही दिन देखने के लिए आए थे?”
समझदार, धैर्यवान दीदिया के मुँह से भी आजकल अक्सर निकल जाता है। वह भी तो दौड़ ही रही है तब से। इतनी जगहों को एक साथ सँभालना आसान है। और अब ये तीनों पूरी तरह से टूटे-फटे लोग . . . इन्हें भी फिर से सहेजना। ऊपर से दावानल बनी ख़बर पूरे क़स्बे में इस परिवार के लिए ही घृणा का संचार कर रही है।
अम्मा-बाबा, दीदिया तीनों होटल के कमरे में अपनी असहज हँसी को सहज बनाने की भरपूर कोशिश करते हुए सुरभि को बहला रहे थे। साथ ही डिनर लिया। अब तो टीवी खोलने का मन भी नहीं करता। पता नहीं, किस कोने से कौन सी ख़बर उड़कर आए और घावों को उघाड़ जाए। वैसे भी यहाँ रिलैक्स होने आए हैं, टेंस होने नहीं।
रात कमरे में दीदिया के बग़ल में सोई सुरभि की आँखें एकदम नहीं झपकीं। अँधेरे में भी बाबा के पैताने सोई अम्मा की बेचैनी वह अच्छे से महसूस कर सकती है। हिम्मत देती है अम्मा उसे और बाबा को। बस, ख़ुद बेचैन रहती है। न जाने क्या बुदबुदाती रहती है। डाँटा था न उसने पत्रकार को, “अरे! और कितने दिन न्याय के दरवाज़े पर नाक रगड़ें?”
“इसे कष्ट देने में, दरिंदगी दिखाने में तो बदमाशों ने तनिक देर नहीं लगाई और . . .”
फिर वह चुप हो गई थी। लेकिन बहुत देर तक अम्मा की चुप्पी बोलती रही थी। हर कोने में, हर जगह। साथ-साथ घर के बरामदे तक, फिर कमरे तक।
पत्रकार की बोलती बंद। सुरभि के कँधे अब भी दुखते हैं। चिथड़े गालों को सहलाते हुए अब भी जलन होती है। टूटी कोहुनी जुड़ जाने के बाद भी दुखती है। पीठ-पेट पर नाखूनों के निशान अब भी उगे हुए हैं। उसके ख़ूबसूरत कपोलों में लगे दाँतों के दंश-डंक अब भी उभर आते हैं। खरोंचें केवल तन पर ही नहीं, मन पर भी टीसें मारती हैं।
बाबा का भी सब्र कई बार टूटा था।
“कैसी माँ है, अपने बेटे को संस्कारी नहीं बनाया और अब बचाने के लिए धन लुटाए जा रही है।”
“घर से दुरदुराओ, ऐसे लोगों को। तब होगा सुधार। आज अपनों को बचाओगे तुम। कल तुम्हारा घर भी जलेगा।”
दिल जल रहा है उनका, समझती रही है सुरभि। वह सर झुका लेती है। आँखें नहीं मिला पाती बाबा से। उनके पास घड़ी भर बैठने से भी कतराती है।
♦ ♦
दूसरे दिन सवेरे ही बिस्तर छोड़ दिया उसने। दीदिया आधी रात तक लैपटाॅप पर काम करती रही थी। बेसुध सोई थी अभी। माँ को शायद अभी-अभी झपकी आई थी। दुर्घटना के बाद से ही बाबा नींद की गोली खाकर सोने लगे थे। आठ बजे से पहले जगते नहीं थे।
सुरभि ने सागर की ओर होटल के काॅरीडोर से ही ताका। सूर्य का ख़ज़ाना समंदर की बालुका राशि और जल पर नई पेंटिंग रच रहा था। प्रभाकर अपनी पूरी ऊष्मा और ख़ूबसूरती के साथ रत्नाकर पर न्योछावर था।
उसने भी तो सब कुछ न्योछावर कर दिया था मनोज पर। सारी ताप, सारी चमक उड़ेल दी थी। और उसी मनोज ने . . . वह भी अकेले नहीं, दोस्तों संग . . . वह सोचना भी नहीं चाहती। मनोज उसकी यादों में भी आने लायक़ नहीं है।
थोड़ी देर में वह समुंदर के किनारे खड़ी थी।
रक्तरंजित सूर्य को थोड़ी देर ग़ौर से निहारती रही। पाँवों के नीचे सीपी गड़ी, उसे होश नहीं। आगे बढ़ी, चिकने सुंदर पत्थर चुभे, उसे ध्यान नहीं। बढ़ती रही, छोटे-छोटे कछुए बिलबिलाए, उसे क्या। रेत पर छटपटाती मछलियाँ। ख़ुद वह उस छटपटाहट से घिरी है। लहरें पैरों से टकराने लगीं। वृत्त बनाती लहरें किनारे पर पछाड़ खा लौटती रहीं। सुरभि आगे बढ़ती रही। बस, न्याय चाहिए। सामने मनोज का चेहरा। घृणा की अबूझ लहर तलवा से कपाल तक। वह आगे बढ़ती रही हौले-हौले। ज्वार-भाटे आते-जाते टकराते रहे। वह गिरने-गिरने को। पर सँभली।
‘डुबो दिया मनोज ने . . . वह भी उथले जल में। आह! . . . लहरों में कहाँ दम था!’
सोचा उसने और आगे क़दम बढ़ाया।
‘तारीख़ पे तारीख़! . . . तारीख़ पे तारीख़!’ ये केवल फ़िल्मी डाॅयलाॅग भर नहीं है। इस पर केवल ताली बजाकर ख़ुश नहीं हुआ जा सकता। पता नहीं, सुरभि क्या-क्या सोच गई इतनी देर में ही। पाँव बढ़ते रहे।
“रुक-रुक . . . सुरभि रुक।”
लहरों के शोर ने दीदिया के दौड़ने और चीखने की आवाज़ को दबा दिया।
एकाएक उसने अपनेआप को दीदिया की बाँहों में जकड़े हुए पाया।
“क्या करने जा रही थी तू? . . . चार साल से इसीलिए हम ख़ाक छान रहे हैं? . . . सात सालों से निर्भया के माँ-पिता दौड़ रहे हैं। उनको अब तक न्याय नहीं मिला। और तू चार साल में ही थक गई?”
दीदिया उसे खींचती हुई रेत तक ले आई। रेत को सुबह की लालिमा और जलधि का जल एक साथ नहला रहे थे।
“दीदिया! न्याय की आशा व्यर्थ है। और सिर्फ़ मुझे मिल जाने से क्या होगा? . . . यह सब रुक जाएगा?”
“देख, तेरा जीजाजी ने अभी क्या भेजा है। नींद से जगाकर बताया।”
दीदिया ने मोबाइल ऑन किया। एक वीडियो। उसमें क़ैद आवाज़ एक माँ की, “मेरे बेटे ने यह अपराध किया है, इतना घृणित। तो उसे सबसे भयंकर सज़ा दी जाए। मैं कोई वकील नहीं करूँगी।”
फिर दृढ़ताभरी आवाज़, “भोगने दो उसे अपनी गंदगी की सज़ा।”
“इस लेडी के पीछे से झाँँकती दूसरी लेडी कौन है? . . . पहचानती है न? देख। ठीक से देख। मनोज की माँ है।”
“और वह जो हाँ में सर हिलाए जा रही है, वह उसकी बहन है . . . सामने जलते कैंडल . . . जलते कैंडल इन दोनों ने रखे हैं।”
दीदिया हाँफे जा रही थी।
न जाने सुरभि को क्यों ऐसा महसूस हुआ कि कोई मरहम लगा रहा है सारे ज़ख़्मों पर। और हौले-हौले सारे ज़ख़्म भरते जा रहे हैं। दिल के भी।
♦ ♦
जीवन चलने का नाम है। किसी भी परिस्थिति में समय रुक नहीं सकता। जीवन भी।
तो इधर सुरभि ने अपनी ज़िन्दगी का मक़सद बना लिया है शिकारियों की शिकार हुईं लड़कियों को हिम्मत, हौसला और उम्मीद देने का। इसके लिए वह झारखंड के छोटे-छोटे गाँवों, क़स्बों में घूमने लगी थी। अब बस गई है एक क़स्बे में ही।
समाज से उसे बहुत शिकायतें हैं। कितनी बेड़ियाँ, कितने बँधन! ऐसी पीड़ित किशोरियों का ही सामाजिक बहिष्कार। वे सार्वजनिक चापानल, कुएँ से पानी नहीं भर सकतीं। सार्वजनिक मेले, उत्सव में शामिल नहीं हो सकती। कोई इनसे बात नहीं करता।
फूल-सी बच्चियों के सपनों को रौंद दिया है गंदे लोगों ने। और सज़ा भी उन्हें ही।
रिश्तों की भी क़ीमत कहाँ रही।
ये अलबेली बालिकाएँ बस अपने क़स्बे-घर को सँवारने, प्रकृति पूजा, नृत्य-गायन और वहाँ के लोककथाओं को सुनने-सुनाने में व्यस्त रहती थीं। उनका बीस परिवारों का जंगली गाँव अब क़स्बे में ढल चुका था।
जब-तब मांदर की थाप उठती . . . धांग! . . . धितांग! . . . धातिंग! . . . धुंग!
सबके पाँवों में झूमर नृत्य जाग उठता। जनी झूमर, मर्दाना झूमर, सामान्य झूमर से पूरा अखरा सुगंधित। अकथ-अथक श्रम और अभाव तो जीवन का हिस्सा। लेकिन मेहनत के बीच खिला-खुला था उनका जीवन।
उच्च शिक्षा पाकर उच्च पदों पर आसीन भी हो रही थीं छोटे से साधनहीन क़स्बे की कुछेक लड़कियाँ। बहुत उपलब्धियाँ झोली में सँजो रही थीं वे। पर सब नहीं।
पच्चीस की उम्र में ही शहीद हो गए उलगुलान (क्रांति) के महानायक, महावीर बिरसा मुंडा के जन्मस्थान उलिहातु के पास के क़स्बे की है भोली-भाली साँवली, सलोनी, घुँघराले बालोंवाली गंदुमि।
अम्मा के पास काम करनेवाली गंदुमि ख़ूब रस ले-लेकर बताती थी, अपनी आजी (दादी) से सुनी कहनी। खिस्सा-कहनी में अब भी उन सबका मन रमता था। जो लोग बाहर काम करने चले गए, वे तो नहीं लेकिन वहीं रह जानेवाले बच्चे-किशोर, कभी-कभार युवा भी खटिया के चारों ओर बैठकर आजी के खिस्सा में डूब जाते।
एक बार सुरभि ने सुनी थी गंदुमि से एक प्रचलित लोककथा “खाटी पावा” . . . ध्रुव तारे और सप्तर्षि के निर्माण की कथा।
“दीदी! आदमी, तरेंगन (तारे) और कुकुर का खिस्सा हय ई।”
“हाँ! . . . हाँ! बोलो,” सुरभि उत्सुक हो उठती थी।
“एक घर में एक अदमिन मन के पास एक कुकुर था। एक दिइन खाइट पर वह सो रहा था कि एक चोर घर में घुस गया।
“खाइट के नीचे सोया कुकुर भूँकते हुए उसके पीछे पड़ गया। आदमिन का भी नींद खुल गया, तो वह भी कुकुर के पीछे-पीछे दौड़ा। अचानक चोर, कुकुर और आदमिन सब आसमान में उड़ने लगा। फिन पथर हो गया।”
“पत्थर?”
“हाँ! बाइद में वही चोर धुरूव तरेंगन बना। कुकुर, ऊ आदमिन और उसके पीछे आउर आदमिन सब पथर का बइन गया। खटिया भी पथर का। इसको ही तो सब सप्त रिसी बोलता है।”
गंदुमि और पूरा गाँव इस लोककथा पर विश्वास करता है।
गंदुमि पाँचवीं क्लास की छात्रा। अम्मा-बाबा ही पढ़ा रहे थे। गंदुमि के घर के लोगों में भी सपने पल रहे थे। वे भी गंदुमि को हर हाल में पढ़ा-लिखाकर कुछ बनाना चाहते थे। सुरभि के घर में वह और उसके खेतिहर माता-पिता को अपने सपने बड़े होते दिखाई पड़ रहे थे। उनकी मईंंया (लड़की) भी ऊँचा आसन पर बैठेगी, उनका यह विश्वास गहरा गया था।
वे दोनों ख़ुश थे। वे आश्वस्त थे।
कुछ दिनों के लिए गंदुमि अपने घर गई थी कि एक दिन जतरा (मेला) से लौटते समय शाम के धुँधलके में टीले के पीछे जा पकड़ा सैय्याद ने। साथ में और कई साथियों को बुला लिया। उसके क़स्बे की धूल-माटी, खेत-जंगल सब गंधा उठा था। एकदम पत्थर सी हो गई थी गंदुमि।
पत्थर से इंसान में मुश्किल से तब्दील हुई सुरभि का अपना दर्द फिर उभरा था। फिर ऐंठ सी गई थी सुरभि और तभी उसने क़स्बे में ही बसने की ठानी। बस गई। उसने उन दुखियारों की सेवा का व्रत ले लिया था। एक ऐन.जी.ओ. से जुड़ गई थी। अब सुरभि उनके लिए मरहम बन जी रही है।
आज सवेरे-सवेरे सुरभि खेतों की पगडंडी पर टहलने निकल गई। जोड़ा तालाब के पास दोनों तरफ़ खेतों में चने की फ़सलें लहरा रही थीं। वह देर तक देखती रही। फ़सलें हवा के परों पर हौले-हौले झूल रही थीं। सुरभि अपनी कुर्ती समेटती वहीं बैठ गई। जोड़ा तालाब से ठंडी हवा के झोंके आ रहे थे।
हरियाली और ठंडी हवा ने उसकी नस-नाड़ियों के तनाव को कम करना शुरू ही किया था कि एकाएक गंदुमि की सहिया (एक रस्म के बाद बनी सहेली) दौड़ती आई।
“हुँआ पइर गंदुमि गिर गई हय। कोय उसको फिन चापाकल से पानी भरने नय दे रहा हय।”
“क्या? क्या हुआ?”
“सब गंदुमि से धक्का-मुक्की किया।”
“फिर? . . . फिर? ओह! . . . चलो, देखती हूँ।”
कृशकाय गंदुमि आँखों के सामने आ गई। वह गंदुमि और गंदुमि जैसी मासूमों को पाषाण नहीं बनने देगी। और न ही खाटी पावा। बिरसा का बलिदान यूँ ही व्यर्थ नहीं जाएगा।
एक नन्ही सी, बुदबुदाहट, “ओह! कितनी लंबी लड़ाई! . . . ग़ुलामी से आज़ादी तक! . . . आज़ादी से समृद्धि और ऊँचाई तक!! . . . क़स्बा से महानगर तक . . .। देश से विदेश तक!!!”
पगडंडी पर तेज़ क़दमों से चलते हुए उसने दीदिया को मैसेज किया, बहुऽऽत लंबी लंड़ाई है।
तुरंत दीदिया का नाम फ़्लैश हुआ।
हाँ! लंबी है . . . बहुत लंऽऽबी लड़ाई! . . . पर तू जीतेगी . . .। ज़रूर जीतेगी।
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
यात्रा वृत्तांत
कहानी
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं