अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

डॉ. अमित धर्मसिंह के ग़ज़ल संग्रह ‘बग़ैर मक़्ता’ का हुआ लोकार्पण

 

दिल्ली। 20 दिसंबर, 2025 को आयोजित हुई नव दलित लेखक संघ की मासिक गोष्ठी में डॉ. अमित धर्मसिंह के ग़ज़ल संग्रह ‘बग़ैर मक़्ता’ का लोकार्पण उपस्थित साहित्यकारों द्वारा किया गया। गोष्ठी लोकार्पण और स्वतंत्र रचनापाठ पर आधारित रही जिसका संयोजन मामचंद सागर ने अपने दिल्ली स्थित राजोकरी आवास पर किया। 

गोष्ठी की अध्यक्षता नदलेस के वर्तमान अध्यक्ष डॉ. अमित धर्मसिंह ने की और संचालन नदलेस के वर्तमान सचिव लोकेश कुमार ने किया। बंशीधर नाहरवाल, डॉ. पूरन सिंह, इंद्रजीत सुकुमार, मामचंद सागर, अमित धर्मसिंह और लोकेश कुमार आदि द्वारा ‘बग़ैर मक़्ता’ का लोकार्पण किए जाने के उपरांत ‘बग़ैर मक़्ता’ पर संक्षिप्त विचार रखे गए। सभी ने माना कि ग़ज़ल संग्रह बेहद ख़ूबसूरत बन पड़ा है। ग़ज़ल संग्रह ‘बग़ैर मक़्ता’ के शीर्षक आवरण और ग़ज़लों ने सभी को अप्रत्याशित रूप से आकर्षित किया। इस कारण सभी ने ‘बग़ैर मक़्ता’ के शीर्षक, आवरण चित्र और इसमें दर्ज ग़ज़लों के विषय में जानने की उत्कंठा दिखाई। जिसका निवारण लेखक ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में देते हुए किया। उन्होंने कहा कि “वैसे तो ‘बग़ैर मक़्ता’ की भूमिका में तेजपाल सिंह ‘तेज’ ने बग़ैर मक़्ता शीर्षक के औचित्य पर समुचित प्रकाश डाला है। फिर भी अभिधा में आप इसे लेखकीय आग्रह जो कि मक़्ता में अपने तख़ल्लुस को प्रयोग करने का होता है, से मुक्त मान सकते हैं। व्यंजनात्मक रूप से इसका अर्थ इस तरह भी लिया जा सकता है कि जैसे जीवन, भाव, विचार, साहित्य सृजन आदि अंतहीन यात्रा है, उसी तरह ग़ज़ल की यात्रा भी अंतहीन है। इसमें आख़िरी शेर मक़्ता जैसी कोई बाध्यता ज़रूरी नहीं। इनके अलावा ‘बग़ैर मक़्ता’ शीर्षक के कई और भी व्यापक अर्थ हो सकते हैं जो निश्चित ही ‘बग़ैर मक़्ता’ ग़ज़ल संग्रह को अधिक व्यापक और अधिक सार्वभौमिक बना देते हैं।” 

डॉ. अमित धर्मसिंह ने प्रस्तुत ग़ज़ल संग्रह से एक ग़ज़ल “धीरे-धीरे ज़िन्दगी में फिर से आ रहा है वो/आँखों को झूठे ख़्वाब फिर दिखा रहा है वो।” को तरन्नुम से सुनाया। गोष्ठी के दूसरे चरण में सलीमा, गीता सागर, बंशीधर नाहरवाल, डॉ. पूरन सिंह, मदनलाल राज़, मामचंद सागर, लखपत सिंह, राधेश्याम कांसोटिया, राजपाल सिंह राजा, जोगेंद्र सिंह, राजवीर सिंह निम, एदल सिंह, इंद्रजीत सुकुमार, गौतम प्रकाश, लोकेश कुमार आदि ने भी अपनी-अपनी उत्कृष्ट रचनाएँ सुनाकर, उपस्थित श्रोताओं को साहित्य रस से सराबोर किया, साथ ही संबंधित विषयों पर सोचने पर विवश भी किया। अंत में गोष्ठी संयोजक मामचंद सागर ने सभी उपस्थित साहित्यकारों और श्रोताओं का अनौपचारिक धन्यवाद ज्ञापन किया। 

लोकेश कुमार 
सचिव, नदलेस 
21/12/2025

डॉ. अमित धर्मसिंह के ग़ज़ल संग्रह ‘बग़ैर मक़्ता’ का हुआ लोकार्पण

हाल ही में

अन्य समाचार