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कलर ऑफ़ हैप्पीनेस

ज़िन्दगी में कुछ भी पुख़्ता नहीं होता, ख़ुद ज़िन्दगी भी नहीं पर फिर भी पूरी ज़िंदगी हम एक ऐसे छद्म के पीछे भागते हैं जिसे सुरक्षा कहते हैं। मध्यवर्गीय समाज ने अपने सपने बदले, आकांक्षाएँ बदली। कुछ नहीं बदला तो आर्थिक सुरक्षा की दरकार। ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा हम शायद इसी में ख़र्च कर देते हैं। सुधा भी कर रही थी। एक लड़की और परिवार की छाती पर बोझ, भले ही पढ़ी-लिखी क्यों न हो। सुधा जानती थी कि आज भी शिक्षित होना इस बात की गारंटी नहीं है कि एक लड़की अपनी ज़िंदगी जी सके पर वह ख़ुश थी इस अस्थायी ज़िंदगी में भी, वह उस सपने को जी रही थी, जो किसी और का दिखाया हुआ नहीं था उसका अपना था। वह अक़्सर कहती "आई वान्ट टू लिव लाईफ़ एज़ इट कम्स"।

वह अक़्सर रिसर्च फ़्लोर पर जाकर बैठती थी। वहीं उसकी मुलाक़ात अनंत से हुई। अनंत अपने नाम की तरह था। वह उसका अनंत विस्तार चारों तरफ़ महसूस करती थी। वह अक़्सर उसे कहता "सुधा मेरा विस्तार दरअसल तुम ही हो। मैं तुम्हें अपने मन का और सपनों का विस्तार मानता हूँ।” यह कोई फ़िल्मी डायलॉग नहीं था। इन दोनों की नौकरी एडहाक नौकरी थी और इस अस्थायीपन के बीच शायद यही कुछ लम्हें ऐसे थे जो इस बात को भुला देते थे कि कुछ तो स्थायी भी चाहिए।

इन युवा दिलों का हृदय किसी सुरक्षा का मोहताज नहीं था और न ही उनकी धड़कन धड़कने के लिए किसी लाईफ़ टाईम गारंटी का इंतज़ार कर रही थी। दर असल रिश्ते कोई मिक्सर ग्रांइडर तो होते नहीं कि दूकानदार आपको बेचे और उसकी कोई गारंटी या वारंटी साईन कर दे। सुधा और अनंत की ज़िंदगी अपनी रफ़्तार से चल रही थी। उन दोनों की तनख़्वाह उनके परिवारों को यह दिलासा देने के लिए काफ़ी थी कि चलो नौकरी तो है। करोड़ों बेरोज़गारों की इस दुनिया में एडहाक ही सही ज़िंदगी चल तो रही है।

अनंत सुधा के साथ कॉफ़ी पीने आया था। कॉफ़ी की चुसकियाँ लेते हुए वह अक़्सर एक दार्शनिक हो जाता था और अक़्सर सुधा से मुख़ातिब होते हुए कहता, "यार सुधा मुझे लगता है कि हम दोनों बादशाह हैं अपनी मर्ज़ी के, किसी के ग़ुलाम नहीं। यह ठीक है कि सिस्टम्स हर छह महीने पर हमारी योग्यता तौलता है और बहुत बार वे लोग हमसे सवाल कर रहे होते हैं, जिनका परमानेंट होना उनके लिए लाईसेंस है हमसे सवाल करने का, पर हम कम से कम ज़िंदा हैं, उनकी तरह मर नहीं गए हैं। उनका स्थायी होना क्या उन्हें वे लम्हें देता है जो तुम और मैं जी रहे हैं। मुझे लगता है स्थायीपन सब कुछ को धीरे-धीरे मार देता है, शायद प्यार को भी, लाईक ए साईलेंट किलर।"

सुधा मुस्कुरा दी, "यह सब बातें फ़लसफ़े में बहुत अच्छी हैं। एक दिन ऐसा भी आयेगा, जब तुम झल्ला उठोगे इसी सिस्टम से, इनमें लोगों के तुमसे बार-बार सवाल पूछने से। समाज सब कुछ पुख़्ता चाहता है रिश्ता भी, नौकरी भी और ज़िंदगी भी। इसलिए सपनों की तरलता उसे लंबे समय तक रास नहीं आती। तुमने ठीक कहा कि हम दोनों बादशाह हैं अपने मन के, पर बादशाहत बड़े-बड़ों की नहीं टिकी तो हमारी ही कितने दिन और कैसे टिकेगी? अरे हाँ, बादशाहत से याद आया . . . तुमने मंटो की वह कहानी पढ़ी है "बादशाहत का ख़ात्मा"। उसका तथाकथित नायक तुम्हारी हमारी तरह वह ज़िंदगी जीता है जिसका मालिक वह ख़ुद होता है और एक लड़की से फोन पर ही प्यार कर बैठता है सिर्फ़ उसकी आवाज़ सुनकर। उसे यक़ीन है कि उसकी आवाज़ इतनी ख़ूबसूरत है तो ख़ुद भी वह उतनी ही ख़ूबसूरत होगी। दिन भर सड़क पर घूमता है, बिना किसी वज़ह के। कभी एक समय पर खाता है तो दूसरे समय नहीं पर करता वही है जो वह करना चाहता है। अनंत पर एक दिन वह ख़त्म हो जाता है। सवाल ये नहीं है कि हम क्या चाहते हैं? हम दोनों एक दूसरे के लिए काफ़ी हो सकते हैं। यह कॉफ़ी हाऊस इसका गवाह है, पर कब तक? पिताजी को भी मेरी तनख़्वाह अच्छी लगती है, मैं उन्हें अपने घर का बेटा जैसा लगती हूँ पर मैं जानती हूँ कि यह बेटा कोई निर्णय नहीं ले सकता। वे चाहते हैं कि मैं जल्दी से शादी कर लूँ। अनंत हमें कहीं तो पहुँचना ही होगा, भले ही यह सफ़र कितना ही ख़ूबसूरत क्यों न हो।”

अनंत सुधा की बातें सुनकर थर्रा सा गया और काँपती आवाज़ में बोला, " सुधा पर इस एडहाक नौकरी के साथ मैं तुमसे शादी कैसे करूँ? तुम भी अस्थायी हो।” 

सुधा अनंत की बात सुन कर जैसे छटपटा उठी और बोली, "कर दी ना तुमने वही गारंटी वाली बात, अभी कितना फ़लसफ़ा झाड़ रहे थे। तुम भी तो उसी एडहाक पैनल की तरह बात कर रहे हो जो हर बार वही घिसे-पिटे सवाल दोहराकर मुझसे मेरी योग्यता का सर्टिफ़िकेट माँगता है। मेरा अस्थायी होना ही मेरा सबसे बड़ा डीमैरिट है, तुम भी उन्हीं पैरामीटर्स को दोहरा रहे हो जिसे एक समाज ख़ुशी का इंडेक्स बताने के लिए इस्तेमाल करता है; ठीक वैसे ही जैसे कई वैज्ञानिक यह दावा करते हैं कि उन्होंने “कलर ऑफ़ हैप्पीनैस” खोज निकाला है। अनंत कहीं अब तुम भी तो उन्हीं की तरह बात नहीं करने लगे हो? तुम्हें पता है, अनंत मैं ज़िंदगी जीना चाहती हूँ, बिना किसी कुंठा के। बिना किसी स्थायीपन की तलाश करते हुए और सच कहूँ तो मुझे सचमुच इस बात से भी फ़र्क़ नहीं पड़ता कि तुम मुझे शादी का सर्टिफ़िकेट दोगे या नहीं। क्योंकि शादी भी इस बात की गारंटी नहीं है कि हम दोनों का प्यार यूँ ही बना रहेगा। कुछ भी हमेशा के लिए तो नहीं होता पर हाँ, कुछ चीज़ों को बनाये रखने के लिए मेहनत भी करनी होती है, समर्पण भी देना होता है। रिश्ता, ऐसी ही चीज़ है। नौकरी एडहाक है तो क्या यह ज़रूरी है की रिश्ता भी एडहाक ही चलते रहना चाहिए? न तो हम दोनों में से कोई मिक्सर ग्रांइडर है और न कोई ग्राहक, इसलिए गारंटी-वारंटी की बात हम क्या करें? तुम्हें मेरा साथ ख़ुशी देता है या नहीं?"

अनंत सुधा के सवालों से जैसे अपनी तंद्रा से बाहर आया और बोला, "क्या कहा सुधा तुमने, मुझे तुम्हारा साथ ख़ुशी देता है या नहीं? अगर तुम्हें यह सवाल पूछना पड़ रहा है तो मुझे हैरानी है।”

"मुझे तुमसे यही सुनना था," सुधा मुस्कुराते हुए बोली। वे दोनों बाशिंदे जिस कॉफ़ी हाऊस में बैठे थे, वह दिल्ली के बचे-खुचे कॉफ़ी हाऊसों में से एक था और बड़े-बड़े गगनचुम्बी रेस्तरांओं के बीच आज भी उन एडहाक और बेरोज़गार युवाओं के लिए बैठने की जगह था। यहाँ जेब में कुछ ही पैसों के साथ अपने सपने और प्यार दोनों को जिया जा सकता था। हालाँकि महानगर का क्रूर फैलाव इन आत्मीय जगहों को नष्ट करता जा रहा था जहाँ वास्तव में संवाद हो सकते थे। ये कॉफ़ी हाऊस ऐसी ही एक लुप्त प्रायः प्रजाति की तरह था जो बदले वातावरण की भेंट चढ़ने की कगार पर था। इसका जाना एक पूरी संस्कृति के जाने की सूचना दे रहा था जहाँ बहसों की जगह थी, सपनों के लिए एक आत्मीय कोना था।

इसी कॉफ़ी हाऊस में सुधा और अनंत एक दूसरे को कॉफ़ी की चुस्कियाँ लेते हुए टकटकी लगाये देख रहे थे कि अचानक बादलों की गड़गड़ाहट सुनाई दी। चारों तरफ़ से काले स्याह बादलों ने पूरे आकाश को घेर लिया था। कुछ ही देर में बरसात होने लगी थी। सुधा एकदम झूम उठी थी। उसने अनंत का हाथ थाम लिया था और कॉफ़ी हाऊस की खिड़की के बाहर आकाश में तैरते बादल के टुकड़ों को कुछ इस तरह देखने लगी जैसे वे बादल उसे ही भिगोने आए थे। वह ख़ुशी से छलक रही थी। अनंत का हाथ हौले से दबाते हुए उसने कहा, "देखो, अनंत इन बादलों को, अभी ये यहाँ नहीं थे और अचानक ही यहाँ आ गये। शायद तुम्हे और मुझे भिगोने।"

“चलो ना, बाहर चलकर भीगते हैं ," उसने लगभग अनंत को खींचते हुए कहा। सुधा के चेहरे पर बारिश की बूँदें जैसे मोतियों की तरह चमक रही थीं। अनंत उसे दखता ही रह गया। उसे लगा जैसे आज वह फिर से सुधा को पहली बार देख रहा है। सुधा उसे नयी-नयी सी लग रही थी। उसके चेहरे पर सचमुच ख़ुशी को पढ़ा जा सकता था। जिस कलर ऑफ़ हैप्पीनैस की बात सुधा ने उससे की थी, वैज्ञानिकों के लिए उसे खोज पाना शायद कठिन हो पर अनंत ने उसे खोज निकाला था। सुधा के चेहरे पर उस रंग को साफ़-साफ़ देखा जा सकता था। उसे लगा कि सब कुछ का इंडेक्स नहीं हो सकता और न ही सब कुछ शोध के लिए होता है। कुछ चीज़ों को ज़िंदगी के जादू को समर्पित कर देना चाहिए नहीं तो शायद सब कुछ धीरे-धीरे दम तोड़ देगा। बाहर झमाझम बरसात के बाद इंद्रधनुष खिला था। उसके सातों रंग सुधा के चेहरे पर झुके हुए थे। कहीं यही “कलर ऑफ़ हैप्पीनैस” तो नहीं जिसकी तलाश दुनिया भर के वैज्ञानिक कर रहे हैं पर अनंत मन ही मन मुस्कुरा उठा था क्योंकि उसने उसे बिना किसी खोज के ढूँढ़ निकाला था।
 

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टिप्पणियाँ

रजनी शर्मा 2021/07/26 03:46 PM

मन को छू लेने वाली कहानी।इंसानी रिश्तों का चित्रण आज के समाज के संदर्भ बहुत ही मार्मिक लहजे से किया गया है। पारस्परिक रिश्तों के ताने बाने को लेखिका बहुत सुंदर और सहज तरीके से करती हैं।

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