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दसवी के भोंगाबाबा – चन्द्रमा की सोलह कलाएँ 

 

पुस्तक का नाम: दसवी का भोंगा बाबा, 
लेखक: गोविंद सेन 
प्रकाशक: लोकोदय प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, 65/44 ,
शंकरपुरा, छितवापुर रोड, लखनऊ, 226-001 
मूल्य: ₹150

लगभग सभी रचनाकार शुरुआत कविता, शेर-शायरी आदि से करते हैं। कालांतर में दोहे, गीत, हाइकु, लेख, व्यंग्य लिखते हुए कहानी की ओर मुड़ते हैं। गोविंद सेन ने रेखांकन सहित सभी विधाओं में अपनी गहरी छाप छोड़ी है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी रचनाकार की छोटी-मोटी कुल जमा बारह कृतियों में से इस दूसरे कथा संग्रह की अधिकांश कहानियाँ ग्रामीण परिवेश की दीनता और निमाड़ अंचल की सुगंध से आप्लावित हैं। ये प्रेमचंद और रेणु दोनों के पंथ की ठहरती हैं। पेशे से जुड़ी और यात्रा से जन्मी कहानियाँ भी पर्याप्त रोचक और सफल हैं। आधी कहानियाँ शिक्षकीय पेशे की विसंगतियों को भली-भाँति उकेरती हैं। ये मध्यमवर्गीय पात्रों की कहानियाँ जैनेंद्र कुमार के पथ की ओर जाती हुई लगती हैं। संग्रह में 16 कथाएँ चंद्रमा की सोलह कलाओं से युक्त-सी हैं।

पहली कहानी 'लांबू फोतरूँ’ आठवीं पास लाइनमैन की है जो अपने दुगुने वेतन के घमंड में चूर हो एम.ए. पास बचपन के मास्टर मित्र की खिल्ली उड़ाता है। अप्रत्यक्ष रूप से आरक्षण व्यवस्था पर भी प्रहार है। गोरा-चिट्टा और साहसी 'खुमसिंग' होमगार्ड बन जाता है। काली लड़की को घर लाकर रहने लगता है। नौकरी छूट जाने से दोनों मज़दूरी करते हैं। टी.बी. रोगी होने पर जीवनसंगिनी ग़ायब हो जाती है। इसमें रोगी खुमसिंग व उसकी ग़रीबी का दुख भरा चित्रण हृदय स्पर्शी है।

'ग़रीबी का गोवर्धन' में डींग (राजस्थान) भ्रमण में ग़रीब बालिकाओं का चित्र खींचने की चोरी पकड़ी जाती है। बालिका का कथन- 'फोटो तो ले लियो, रुपयो ना देगो।' गहरे अपराध बोध को जन्म देता है। जनजाति पृष्ठभूमि की कहानी 'न्हारसिंग का नसीब' का यह कथन- 'शुरू शुरू में न्हारसिंग दारू को पीता था पर अब तो दारू खुद उसे पीने लगी थी'- शराब के नुक़सान को स्पष्ट करता है। अधिक नशे के कारण न्हारसिंग को हाट से ख़रीदे मांस की थैली की भी सुध नहीं रहती  जिसे कुत्ता ले भागता है। परंतु एक स्त्री के पत्थर के प्रहार से वह छूटी थैली उसके नसीब की हो जाती है। कहानी में पिछड़ेपन के साथ राजनीति की कुरुपता को बारीक़ी से उकेरा है। 

'नाराण दादा...' एक गपोड़ ढोली की रोचक कहानी है। ढोली गाँव की आत्मा में रस घोलते हैं। ढोली विहीन गाँव अधूरा माना जाता है। अपनी कला का वर्णन यह उद्धरण करता है –‘जब वे ढोल बजाते हुए चरमोत्कर्ष पर पहुँचते हैं तो छत के कवेलू भरभरा कर नीचे फटाफट गिरने लगते हैं।‘ उनकी आँख के फूले के लिए शेर से लड़ाई की गप तैयार रहती थी। कहानी का यह कथन दृष्टव्य है- 'नारायण दादा अपनी कल्पना और यथार्थ का ऐसा पेस्ट तैयार करते थे कि लोग उनके कायल हो जाते थे। अपनी फितरत के मुताबिक निश्चित ही उन्होंने वहाँ भी अपना जलवा जमा लिया होगा। बड़ी-बड़ी मछलियों को अपने ढोल की थाप पर नचा रहे होंगे।' शहरी मल्टी वातावरण में अपने गाँव की यादों में डूबे कथानायक का यह कथन- 'कभी-कभी आदमी खुद को टापू बना लेता है। समुद्र की अथाह राशि में नितांत अकेला निर्जन भूखंड' बहुत कुछ कह देता है। जहाँ 'मोटा भाई की मूर्खता' स्वच्छता के उच्च व व्यावहारिक मानदंड स्थापित करती लगती है तो वहीं 'दूसरा बाप' कहानी समाज के घिनौने पक्ष को उजागर करती है। कहानी 'मदर इंडिया की मां' में सूअर से लेकर भील स्त्री और मकान पर अंकन के साथ हाथ में गुदे 'मां' शब्द के बहाने भावात्मक चित्रण भली-भाँति किया है। 'सन ऑफ इंडिया' कहानी अंत में भिक्षावृत्ति पर चोट कर जाती है। 

'सीढ़ियाँ' कहानी में साहित्यकारों के चरित्र व भीतरी सत्य को यह कथन स्पष्ट करता है -'आदमी एक साथ कुछ सीढ़ियाँ चढ़ता है तो कुछ सीढ़ियाँ उतरता है। वे सम्मान की सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे पर उम्र की सीढ़ियाँ उतर रहे थे।' 

'लग्जरी बाबू' तमाम तड़क-भड़क का प्रदर्शन करते हैं। प्रश्नपत्र सेटिंग में निवास संबंधी असुविधा और अव्यवस्था पर कहानी गहरी चोट करती है। 'कृपा का अधिकार' कहानी परीक्षा हाल में शिक्षकों व छात्रों के चरित्र को उजागर करती है। यह कथन दृष्टव्य है- 'सभी परीक्षार्थी खुश थे। पर्यवेक्षक खुश थे कि उन्होंने अपना दायित्व सफलतापूर्वक निभाया। पूरा महकमा खुश था। चारों तरफ फैले उजाले में समाया अंधेरा किसी को दिखाई नहीं दे रहा था।' 

'स्कूल न आने के उसके पास सत्रह बहाने थे। उसका पूरा कुनबा बीमार था। रिश्तेदारों में मर-गढ़ चलती रहती है। 'यह कथन 'चाबी' कहानी के बहानेबाज़ और गेप मारू शिक्षक के कृत्यों को बताती है। वास्तव में ऐसे ही शिक्षक शिक्षा जगत को खोखला करने वाले घुन होते हैं। वहीं ईमानदार शिक्षक की कर्तव्यपरायणता, प्रतिभा शोषण व तिरस्कार के साथ भीरुता को 'स्याही' कहानी बारीक़ी से पेश करती है। उदार, फक्कड़ व्यक्ति की अनोखी और मनोरंजनक कहानी है 'दसवी का भोंगा बाबा'। हर किसी को मदद कर देने के कारण लोग उन्हें एड़गा (पागल) कह देते थे। इस उदाहरण से यह और स्पष्ट हो जाता है- 'रात को ठंड लगती तो मसान के मुर्दों के लिए वापरी गई गोदड़ियों को सहज भाव से ओढ़-बिछा लेत , अर्थी से निकाले पामड़ी (कफ़न) के कपड़े व बर्तन वापर लेते। मुर्दे को भेंट की दारू भी पी जाते।' भोगा हुआ यथार्थ और अनुभूतियाँ कहानियों के प्राण तत्व हैं। कथाकार को व्यक्ति-चित्रण व वातावरण चित्रण में महारत हासिल है। फलतः कहानियाँ सजीव और साक्षात् घटती प्रतीत होती हैं। पात्रानुकूल भाषा के (निमाड़ी व भीली) वाक्य और शब्दों का (ढेकले,दग्गड़,भोंगा, खोदरा,एड़गा आदि) प्रयोग अंचल के पास ले जाने में सफल हुए हैं।

जब कहानीकार की निजता सार्वभौमिक और सर्वव्यापी हो जाती है, तब वह सफल कहानी की श्रेणी में आ जाती है। कहानियों में कहीं दीन-हीन का दर्द है तो कहीं ईमानदार की पीड़ा है। ऐसी अभिव्यक्ति के कारण गोविंद सेन सशक्त व प्रतिष्ठित कहानीकार के रूप में प्रस्तुत हुए हैं। सभी कहानियाँ पाठक को अंत तक बाँधकर रखती है। यह कथाकार की सफलता है। पुस्तक के शीर्षक अनुसार आवरण चित्र सटीक व आकर्षक है।

समीक्षक
प्रमोद त्रिवेदी 'पुष्प', 132, केशव नगर, राजपुर, जिला - बड़वानी, मध्य प्रदेश,
मोबाइल नंबर - 9893421884

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