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गाँधी: एक व्यक्तित्व

महात्मा गाँधी के विराट् व्यक्तित्व को एक शोधपत्र, आलेख अथवा निबंध में आबद्ध/निबद्ध कर पाना सम्भव नहीं है। महात्मा गाँधी स्वयं में एक संस्था है, जिसे जानने-समझने-अपनाने के लिए उसका गहन अध्ययन किया जाना अपेक्षित है। जिसके व्यक्तित्व एवं जीवन-दर्शन पर विश्व-भर में अढ़ाई हज़ार से अधिक ग्रन्थ लिखे जा चुके हैं, विश्वविद्यालयों में शोध किए जा चुके हैं और असंख्य गोष्ठियों/संगोष्ठियों में चर्चाएँ की जा चुकी हैं, उसके विषय में एक पत्र पर्याप्त नहीं है। प्रस्तुत पत्र उस महान् विभूति के व्यक्तित्व की किञ्चित् भूमिका मात्र है। पत्र-वाचन से पूर्व राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की कविता "गाँधी" पढ़ना चाहूँगा:

देश में जिधर भी जाता हूँ,
उधर ही एक आह्वान सुनता हूँ
"जड़ता को तोड़ने के लिए
भूकम्प लाओ।
घुप्प अँधेरे में फिर
अपनी मशाल जलाओ।
पूरे पहाड़ हथेली पर उठाकर
पवनकुमार के समान तरजो।
कोई तूफ़ान उठाने को
कवि, गरजो, गरजो, गरजो!"
 
सोचता हूँ, मैं कब गरजा था?
जिसे लोग मेरा गर्जन समझते हैं,
वह असल में गाँधी का था,
उस गाँधी का था, जिस ने हमें जन्म दिया था।
 
तब भी हम ने गाँधी के
तूफ़ान को ही देखा,
गाँधी को नहीं।
 
वे तूफ़ान और गर्जन के
पीछे बसते थे।
सच तो यह है
कि अपनी लीला में
तूफ़ान और गर्जन को
शामिल होते देख
वे हँसते थे।
 
तूफ़ान मोटी नहीं,
महीन आवाज़ से उठता है।
वह आवाज़
जो मोम के दीप के समान
एकान्त में जलती है,
और बाज़ नहीं,
कबूतर के चाल से चलती है।
 
गाँधी तूफ़ान के पिता
और बाज़ों के भी बाज़ थे।
क्योंकि वे नीरवता की आवाज़ थे।

- कविता की अन्तिम पंक्ति में दिनकर जी ने महात्मा गाँधी के विशाल व्यक्तित्व का सार मात्र पाँच शब्दों में कह दिया है: "वे नीरवता की आवाज़ थे।" इसमें क़तई संदेह नहीं कि देश में परतन्त्रता के दौर में दीन-हीन-पराधीन, साहस-विहीन और शक्ति-हीन के स्वर को बुलंद करने का महान् कार्य करने का श्रेय महात्मा गाँधी को ही जाता है। नीरवता की आवाज़ बनकर गाँधी ने नवभारत की नींव रखी थी। आधुनिक काल में विश्व-भर में यह पहली बार हुआ था कि किसी दुबले-पतले, क्षीणकाय व अर्द्धनग्न-से दिखने वाले व्यक्ति ने एक राष्ट्रव्यापी सामूहिक आन्दोलन कर डाला और वैश्विक शक्ति कहलाने वाले देश बर्तानिया की जड़ें उखाड़ दीं। महात्मा गाँधी नवभारत के लिए राष्ट्रीय एकता व अखण्डता के पर्याय बन गए थे।

आचार-विचार में श्रेष्ठ मानवीय गुणों से युक्त; सत्य, अहिंसा, आत्मबल और साहस के साथ अपने कर्मपथ पर सतत चलायमान; आन्तरिक/आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण; उत्कृष्ट जीवन-मूल्यों को जीने वाले; जनमानस पर अमिट छाप वाले उदात्त व्यक्तित्व के धनी थे मोहनदास कर्मचन्द गाँधी, जिन्हें लोगों ने प्रेमपूर्वक महात्मा, बापू तथा राष्ट्रपिता जैसे सम्बोधनों से अलंकृत किया और उनकी विचारधारा को अधिमान दिया। 

न केवल भारत में, अपितु विश्व-भर में महात्मा गाँधी के आदर्शों और मानवीय मूल्यों को सराहा गया है और अपनाया गया है। इसका कारण है गाँधी के जीवन-दर्शन की सार्वभौमिकता, सार्वजनीनता तथा व्यावहारिकता। अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग जूनिअर, दक्षिण अफ़्रिका में नेल्सन मंडेला, म्याँमार में आंग सू की इत्यादि ने अपने-अपने देश में गाँधीवादी दृष्टिकोण के साथ लोगों को सही मार्गदर्शन और सफल नेतृत्व प्रदान किया है।

महात्मा गाँधी ने जिन जीवन-मूल्यों और विचारों को आत्मसात् किया, अपनाया, जिया और उपदिष्ट किया, उन्हीं के आधार पर गाँधीवाद अथवा गाँधीदर्शन का विकास हुआ है। उनके जीवन-दर्शन की यही विशिष्टता है कि यह उनकी जीवन-शैली में अनिवार्य रूप में उपस्थित था। जिस विचार एवं मूल्य को व्यक्ति स्वयं अपनी जीवनचर्या में नहीं ढाल सकता, वह किसी अन्य को कैसे प्रभावित कर सकता है। अत एव “वाच: कर्मातिरिच्यते” की सूक्ति को चरितार्थ करते हुए महात्मा गाँधी ने मात्र आदर्शवाद नहीं, बल्कि व्यावहारिक आदर्शवाद पर बल दिया, और स्वयं उसे जी कर उदाहरण स्थापित किए। यही कारण है उनका व्यक्तित्व दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना और न केवल समकालीन पीढ़ी अपितु अनुगामी पीढ़ियाँ भी उनसे प्रेरित हुई हैं।

ऐसा कोई विषय नहीं जो गाँधी से असंपृक्त रहा हो। ऐसी कोई समस्या नहीं, जिसका समाधान गाँधीवाद नहीं सुझाता हो। गाँधीदर्शन के व्यष्टिपरक एवं समष्टिपरक - विविध स्तर हैं। वैयक्तिक, सामुदायिक, सामूहिक, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, प्रास्थितिकीय, धार्मिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक - प्रत्येक स्तर पर गाँधीवादी विचारधारा अपना प्रबल प्रभाव रखती है। गाँधीवाद के सिद्धान्त व्यक्ति और समाज को एक साथ बदलने का सामर्थ्य रखते हैं, इसमें लेशमात्र संशय नहीं है।

गाँधी के विचारों से उनके विरोधी भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहे। बीसवीं शती के द्वितीय दशक में दक्षिण अफ़्रीका के प्रशासक जनरल जेन सी. स्मट्स गाँधीजी के धुर विरोधी थे। पीटरमेरिट्ज़बर्ग में कारावास के दौरान गाँधीजी ने चमड़े का कार्य करना स्वीकार किया था और उन्होंने सैंडल का एक जोड़ा तैयार किया। दक्षिण अफ़्रीका से वापिस लौटते समय उन्होंने वह सैंडल का जोड़ा जनरल स्मट्स की सचिव सोंजा स्क्लेसिन को दिया और उसे स्मट्स को भेंट करने को कहा। स्मट्स गर्मी के मौसम में प्रिटोरिया के निकट आयरीन में अपने डूर्न्क्लूफ़ फ़ार्म पर उस सैंडल के जोड़े को पहनते थे। लेकिन कुछ समय में उनके विचारों में परिवर्तन आने लगा और वे गाँधी के प्रशंसक बन गए। महात्मा गाँधी के ७०वें जन्मदिवस पर उन्होंने वे सैंडल उन्हें वापिस भेंट किए - यह कहकर कि “एक महान् व्यक्ति के जूतों में पैर डाल कर खड़े रहने की मेरी हैसियत नहीं है। . . . यह मेरा सौभाग्य था कि मैं एक ऐसे व्यक्ति का विरोधी रहा जिसके प्रति मेरे हृदय में भी अत्यधिक सम्मान था . . . उसने कभी तात्कालिक स्थिति की मानवीय पृष्ठभूमि को विस्मृत नहीं किया, कभी क्रोध नहीं किया, कभी घृणा का शिकार नहीं हुआ . . .“ 

भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में सत्याग्रह के शान्तिपूर्ण ढंग से अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने का संदेश देते हुए गाँधीजी ने यह सिद्ध किया कि सत्ताप्राप्ति व शासन के लिए हिंसा का मार्ग आवश्यक नहीं है, धैर्य ही सफलता कि कुञ्जी है। उन्होंने भारत को शान्ति की महत्ता व शक्ति को समझने के लिए पाँच पाठ दिए। प्रथम - सत्ता का बल कभी प्रेम के बल को नहीं जीत सकता। अभिप्राय यह कि सबके प्रति प्रेम, दया, करुणा, सह-अनुभूति तथा सहिष्णुता के भाव से ही शान्ति के बल को समझा जा सकता है। द्वितीय - युद्ध सदा ही सभी को पीड़ादायक होता है। गाँधीजी के अनुसार विश्वशान्ति की सिद्धि के लिए अहिंसा की शक्ति को जानना होगा। तृतीय - हम में से प्रत्येक अपने मूल्यों व अभिलाषाओं के लिए जीता है, किन्तु हमारा वास्तविक अस्तित्व तो शान्तिपूर्ण ढंग असे जीवन को जीने की कामना में निहित है। दरअसल गाँधीजी यह मानते थे कि सर्वजनकल्याणार्थ आत्मोत्सर्ग को ही सच्चा साहस कहा जा सकता है। चतुर्थ - आँख को आँख दिखाने से तो सारा संसार ही अंधा हो जाएगा, यानी प्रतिशोध की भावना से कार्य करने से कोई समाधान नहीं निकल सकता, केवल अनावश्यक तनाव ही बढ़ता है; इस उक्ति से गाँधीजी का आशय था कि विश्व के सबल नेता यदि अपने विरोधियों के मुद्दों को समझने का प्रयास करें तो विश्व में शान्ति की स्थापना होगी। तथा पञ्चम - जो परिवर्तन हम संसार में देखना चाहते हैं, वह हमें स्वयं में पहले करना होगा - हमें दूसरों से भेदभाव नहीं करना है, एक-दूसरे को समझना है; इसी तरह से विश्व में शान्ति की स्थापना होगी।

गाँधीजी ने भारतीयों को न केवल सत्य और अहिंसा के साथ स्वतन्त्रता संग्राम को जीतने की दिशा प्रदान की, मानवाधिकारों की अभिरक्षा के लिए भी कारगर क़दम उठाए। ग़रीबों के उद्धार के लिए, महिलाओं के उत्थान के लिए, दलितों के उन्नयन के लिए, ग्रामीणों के सशक्तिकरण के लिए उन्होंने कई आन्दोलन चलाए तथा धार्मिक व सामुदायिक/साम्प्रदायिक सद्भाव के लिए और हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए भी हमेशा प्रयासरत रहे। धर्मान्धता, जातिभेद और लिंगभेद के कारण हो रहे सामाजिक अन्याय को दूर करने के लिए भी वे हमेशा मुखर रहे। आधारभूत मानवाधिकारों को सुरक्षित करने के लिए हमेशा संघर्षरत रहे। लेखनी के माध्यम से तथा अपने भाषणों के बल/ प्रभाव से उन्होंने एक ओर तो भारतीयों के आत्मसम्मान को जाग्रत किया; तो दूसरी ओर उपनिवेशवादी अँग्रेज़ों के शासन का उन्मूलन भी किया।

ग़ुलाम भारत में सामाजिक और राजनीतिक सुधारों के लिए गाँधीजी ने जो भूमिका निभाई, उसका प्रभाव विश्व के कई बड़े देशों में देखने को मिलता है। गाँधीजी के विचारों और आन्दोलनों के विषय में यूरोप और अमेरिका के समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं तथा पुस्तकों में चर्चाएँ होती रही हैं तथा मीडिया के अन्य माध्यमों से भी व्यापक प्रसार हुआ है। उनके कार्य का अनुसरण विश्व के कई बड़े राजनेताओं, विचारकों और समाज-सुधारकों ने किया है। 

अहिंसा का दर्शन गाँधी के पर्यायवाची के रूप में लिया जाता है। उनकी अहिंसात्मक कार्यविधि सभी धर्मों के प्रति उनके सहिष्णुता एवं सम्मान के भाव की परिचायक है। यह सर्वविदित है कि गाँधीजी ने हर प्रकार के अन्याय तथा अधिनायकवादी शासन का पुरज़ोर विरोध किया है, लेकिन उन्होंने इस विरोध/लड़ाई में कोई शस्त्र नहीं उठाया और किसी प्रकार की हिंसा नहीं की और हिंसा का समर्थन नहीं किया। गाँधीजी ने जितने भी महत्त्वपूर्ण आन्दोलन चलाए - चम्पारन सत्याग्रह (१९१७), खेड़ा आन्दोलन (१९१८), ख़िलाफ़त आन्दोलन (१९१९), असहयोग आन्दोलन (१९२०), सविनय अवज्ञा आन्दोलन (१९३०), नमक आन्दोलन/ डांडी यात्रा (१९३०), भारत छोड़ो आन्दोलन (१९४२) इत्यादि सभी शान्तिपूर्ण ढंग से चलाए गए थे। गाँधीजी अपने अहिंसा के सिद्धान्त पर इतने अडिग थे कि चौरी-चौरा काण्ड में जब कुछ आन्दोलनकारियों ने पुलिस थाने में आग लगा दी और बाइस पुलिस-कर्मियों तथा तीन नागरिकों को मार डाला, तो उन्होंने इसके विरोध में राष्ट्रीय स्तर पर असहयोग आन्दोलन को तुरन्त वापिस ले लिया था। उनका शान्तिपूर्ण संघर्ष और वाणी के प्रयोग में भी अहिंसा का पालन करना आज की पीढ़ी को अचम्भित कर देता है। 

गाँधीवाद अथवा गाँधीदर्शन में बहुत-से स्रोतों से सद्विचारों और आदर्शों को समाहित किया गया है। हिन्दू धर्मग्रन्थ - उपनिषद्, रामचरितमानस, गीता इत्यादि के साथ-साथ ईसाई धर्मग्रन्थ - बाइबल तथा बौद्ध व जैन धर्मग्रन्थों से भी सुविचारों का संचयन किया गया है, जिन्हें सिद्धान्त बनाकर गाँधीजी ने स्वयं भी अपनाया और दूसरों से भी मनवाया। इनके अतिरिक्त रूस के सुप्रसिद्ध दार्शनिक तथा कथाकार लियो टॉल्स्टॉय के विचारों से गाँधीजी प्रभावित थे। उनकी पुस्तक The Kingdom of God is Within You से वे अत्यधिक प्रेरित हुए थे। इसी प्रकार इंग्लैंड के विचारक-लेखक जॉन रस्किन की पुस्तक Unto This Last से गाँधीजी ने ‘सर्वोदय’ का सिद्धान्त लिया और भारतीय परिप्रेक्ष्य में विकसित किया, जिसका उद्देश्य था - सर्वसाधारण का उत्थान। इसी प्रकार गाँधीजी ने ‘त्रिवानर’ का सिद्धान्त - बुरा न देखो! बुरा न सुनो! बुरा न बोलो! - जापानी लोकसाहित्य (मूलत: चीनी दार्शनिक कन्फ़्युशियस से) से ग्रहण किया है और अमल में लाया। अत: गाँधी का दर्शन सर्वग्राह्य है, जिसमें प्राच्य एवं पाश्चात्य - वे सभी जीवनादर्श व मानवीय मूल्य हैं जो व्यावहार्य हैं तथा जिनमें मानवता का कल्याण निहित है। विविध धर्मों / पंथों तथा विचारकों से लिए आदर्शों को व्यवहार में लाने के कारण ही गाँधीजी ने विश्व भर में लोगों के हृदयों में अपना स्थान बना लिया। 

गाँधीजी की नित्यचर्या में प्रार्थना का अत्यधिक महत्त्वपूर्ण स्थान था। उनका मानना था कि प्रार्थना से जहाँ एक ओर हम ईश्वर के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं, वहीं दूसरी ओर इससे आत्मशुद्धि होती है। जो व्यक्ति प्रार्थना नहीं करता, वह प्राय: अशान्त रहता है और दूसरों को भी अशान्त कर सकता है। अत एव गाँधीजी आन्तरिक शुचिता सहित आत्मिक शान्ति तथा सामूहिक कल्याण के लिए प्रात:कालीन और सान्ध्यकालीन प्रार्थना सभाओं का आयोजन करते थे, जिनमें उनके साथ उनके अनुयायी उपस्थित रहते थे। इन प्रार्थना सभाओं में मन्त्र-जाप, ध्यान, स्तोत्र-पाठ तथा संकल्प-वाचन किया जाता था। प्रार्थना में केवल हिन्दू धर्म के मन्त्रों/स्तुतियों का नहीं, प्रत्युत बौद्ध, ईसाई, इस्लाम और ज़रथोस्ती मन्त्रों का भी वाचन किया जाता था। प्रार्थना के प्रारम्भ में बौद्ध मन्त्र "नं म्यो हो रेंगे क्यो" और वैष्णव मन्त्र "हरि: ओ३म्" का जाप किया जाता था। इनके अतिरिक्त उपनिषद् मन्त्र "ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यांजगत्। / तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा: मा गृध: कस्यस्बिद्धनम्॥" का पाठ किया जाता था और गुरु-गणपति-लक्ष्मी- सरस्वती वंदना सहित विष्णु-शिव के ध्यान-मन्त्र बोले जाते थे। "लोका: समस्ता: सुखिनो भवन्तु" मन्त्र से लोक-कल्याण की सत्कामना की जाती थी। क़ुर’आन की आयतों और ज़रथोस्ती गाथा का उच्चारण किया जाता था और अंत में भजन और गीता- पाठ किया जाता था। प्रात: एवं सान्ध्य- कालीन इन प्रार्थना-सभाओं में एकादश-व्रत का संकल्प लिया जाता था: 

अहिंसा सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य असंग्रह।
शरीरश्रम अस्वाद सर्वत्र भयवर्जन॥
सर्वधर्मी समानत्व स्वदेशी स्पर्शभावना।
हीं एकादश सेवावी नम्रत्वे व्रतनिश्चये॥

ये एकादश व्रत ही गाँधीदर्शन के अभिन्न अंग हैं और आधार-स्तम्भ हैं:

१. सत्य - गाँधीजी ने ईश्वर को सत्य मानने के साथ-साथ सत्य को ईश्वर माना है। वे मानते थे कि जहाँ सत्य है, वहाँ ईश्वर है और आत्मशुचिता व नैतिकता इसके आधार हैं। सत्य आग्रह, सत्य विचार, सत्य वाणी और सत्य कर्म - ये सभी सत्यव्रत के अंग हैं। 

२. अहिंसा - सत्य से साक्षात्कार का एक ही साधन है - अहिंसा। प्रेम, उदारता, सहिष्णुता, करुणा, दया एवं क्षमा की पराकाष्ठा ही अहिंसा है। गाँधीजी के अनुसार अहिंसा के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति कभी भी किसी दूसरे को मानसिक व शारीरिक पीड़ा नहीं पहुँचाता है।

३. ब्रह्मचर्य - ब्रह्म की खोज सत्य की खोज से पृथक् नहीं है, अत: ब्रह्मचर्य सत्यचर्या अथवा सत्याचरण के अन्तर्गत सर्वेन्द्रिय संयम का पालन करना है।

४. अस्वाद - मनुष्य जब तक जिह्वा के रसों को विजित न कर ले, तब तक ब्रह्मचर्य का पालन अति कठिन है। अत एव भोजन केवल शरीर-पोषण के लिए हो, स्वाद अथवा भोग के लिए नहीं।

५. अस्तेय - अन्य की वस्तु को उसकी आज्ञा के बिना लेना चौर-कर्म है; लेकिन गाँधीजी मानते थे कि मनुष्य अपनी कम-से-कम ज़रूरत के अलावा जो कुछ लेता है या संग्रह करता है, वह भी चोरी ही है।

६. अपरिग्रह - सच्चे सुधार की निशानी परिग्रह-वृद्धि नहीं है, बल्कि इच्छापूर्वक उसे कम करना है। ज्यों-ज्यों परिग्रह अथवा अनावश्यक संग्रह कम होता है, संतोष, सुख और आत्मिक शान्ति में वृद्धि होती है।

७. अभय - जो व्यक्ति सत्य-परायण हो जाता है, उसे न तो जाति-बिरादरी से डरना चाहिए, न सरकार/सत्ता से, न चोर से, न बीमारी या मौत से और न किसी के बुरा मानने से।

८. अस्पृश्यता-निवारण - छुआछूत के निवारण से समाज का और राष्ट्र का सम्यक् उत्थान होता है तथा मानवता की रक्षा होती है।

९. शरीर-श्रम - जिनका शरीर काम कर सकता है, उन स्त्री-पुरुषों को अपना कार्य स्वयं किया जाना चाहिए। गाँधीजी का मानना है कि जो परिश्रम नहीं कर सकते, उन्हें दूसरों का खाने का अधिकार नहीं है।

१०. सर्वधर्म समभाव - जितना सम्मान हम अपने धर्म का करते हैं, उतना ही सम्मान हमें दूसरों के धर्म का भी करना चहिए। गाँधीजी के अनुसार हमें सब धर्मों में पाए जाने वाले दोषों को दूर करने के लिए सामूहिक प्रार्थना करनी चाहिए।

११. स्वदेशी - स्वदेशी शब्द संस्कृत भाषा से लिया गया है, जिसमें देश के साथ स्व- उपसर्ग लगाया गया है। स्व- का अर्थ है स्वयं अथवा निज; अत एव स्वदेश का अर्थ हुआ निज-देश। स्वदेशी का अर्थ है अपने देश से, लेकिन अधिकतर सन्दर्भों में इसका अर्थ आत्मनिर्भरता के रूप में लिया जा सकता है। गाँधीजी के मतानुसार स्वदेशी राजनीतिक और आर्थिक, दोनों तरह से अपने समुदाय के भीतर ध्यान केन्द्रित करता है। दरअसल यह समुदाय और आत्मनिर्भरता की अन्योन्याश्रिता है। गाँधीजी मानते थे कि स्वदेशी से स्वतन्त्रता अथवा स्वराज को बढ़ावा मिलेगा, क्योंकि भारत का ब्रिटिश नियन्त्रण उनके स्वदेशी उद्योगों के नियन्त्रण में निहित था। स्वदेशी भारत की स्वतन्त्रता की कुञ्जी थी और महात्मा गाँधी के रचनात्मक कार्यक्रमों में चरखा और खादी द्वारा इसका प्रतिनिधित्व किया गया था। 

गाँधीजी ने जिस सत्याग्रह की बात की है, वह सरल नहीं है; सत्य के आग्रह में आन्तरिक शक्ति की दरकार है जिसके लिए व्यक्ति को दारुण तप करना पड़ता है ताकि उसका इतना आत्मबल जाग्रत हो सके कि वह सत्य के मार्ग पर अडिग रहे और संसार से टकरा जाने का माद्दा रखे। सत्याग्रह का अर्थ है सभी प्रकार के अन्याय, शोषण और उत्पीड़न के विरुद्ध शुद्धत्तम आत्मबल का प्रयोग करना। यह व्यक्तिगत पीड़ा को सहन करते हुए निज अधिकारों को सुरक्षित करने और दूसरों को पीड़ा न पहुँचाने की एक विधि है। सत्याग्रह की परिकल्पना गाँधीजी ने उपनिषद् के सूत्रों सहित बुद्ध-महावीर की शिक्षाओं तथा टॉल्स्टॉय और रस्किन आदि विचारकों के महान् दर्शन से की है।

गाँधीजी सर्वोदय के सिद्धान्त पर बल देते रहे। इसका अर्थ है सार्वभौमिक अथवा सर्वसाधारण का उत्थान या सभी की प्रगति। यह शब्द गाँधीजी ने सर्वप्रथम जॉन रस्किन की पुस्तक में पढ़ा था। अपनी एक पुस्तक "हिंद स्वराज" में गाँधीजी ने विस्तारपूर्वक स्वराज पर लिखा है। स्वराज शब्द का अर्थ है स्व-शासन, किन्तु गाँधीजी ने इसे एक ऐसी क्रान्ति बताया है जो कि जीवन के सभी क्षेत्रों को समाहित करती है। उनके लिए स्वराज का अर्थ व्यक्तियों के स्वराज से था और इसलिए उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके लिए स्वराज का अभिप्राय है देशवासियों के लिए स्वतन्त्रता और अपने सम्पूर्ण अर्थों में स्वराज स्वतन्त्रता से कहीं अधिक है - यह स्वशासन है, आत्मसंयम है और इसे मोक्ष के बराबर माना जा सकता है। 

गाँधीजी ने एक अन्य महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त ट्रस्टीशिप पर बल दिया, जो एक सामाजिक-आर्थिक दर्शन है। यह अमीरे लोगों को एक ऐसा माध्यम प्रदान करता है, जिसके द्वारा वे ग़रीब और असहाय लोगों की मदद कर सकें। यह सिद्धन्त गाँधीजी के आध्यात्मिक विकास को दर्शाता है, जो कि थियोसॉफ़िकल साहित्य के अध्ययन से प्रेरित था।

सामूहिक स्तर पर उपर्युक्त एकादश-व्रत के संकल्प के अतिरिक्त गाँधीजी व्यक्तिगत स्तर पर भी जिस कठोर व्रत-नियम-संयम की अनुपालना करते थे, वह तपश्चर्या से कम नहीं था। आत्मसंयम के लिए उपवास, निरामिष भोजन, योगाभ्यास, प्राणायाम, मौनव्रत, शुचिता, निष्काम सेवा तथा त्रुटियों के निमित्त प्रायश्चित् - ये सभी कार्य उनकी नित्यचर्या में सम्मिलित थे। इन्हीं नियमों के निरन्तर अभ्यास से उनका व्यक्तित्व दूसरों के लिए प्रेरणादायक बना।

२ अक्तूबर १८६९ को पोरबंदर, गुजरात में जनमे गाँधी को जीवनादर्श और अध्यात्म का प्रथम पाठ अपनी माता पुतलीबाई से मिला था, जिसे उन्होंने अपने जीवन का आधार बनाया। जब कभी वे विचलित हो जाते थे या दिशाभ्रम में पड़ जाते थे तो उनकी माता के बताए सूत्र उन्हें पुन: सुपथ पर ले आते थे। आजीवन वे सत्य से विमुख नहीं हुए; अपने जीवन के अच्छे-बुरे सभी पहलुओं को स्पष्ट और निर्बाध रूप से कहते रहे, बिना किसी संकोच और भीति के। जैसा कि गाँधीजी की आत्मकथा "सत्य के प्रयोग" में स्पष्ट है, उन्होंने अपने समग्र जीवन को "सत्य" का प्रयोग ही कहा है, जिसमें सफलता और विफलता दोनों रहे, किन्तु वे कदापि लक्ष्यच्युत् नहीं हुए। गाँधी - एक व्यक्ति के रूप में सदा ही आलोचना का विषय रहा है, लेकिन गाँधीवाद एक दर्शन के रूप में लगभग विश्व में ग्राह्य रहा और आज भी प्रासंगिकता रखता है और भविष्य में भी सार्थक रहेगा, क्योंकि इसमें मानवता के मूल सिद्धान्त हैं जो अपरिवर्तनीय हैं। गाँधी - एक व्यक्ति के रूप में विरोध का सामना भी करता रहा, जिसका चरम था ३० जनवरी १९४८ को उसकी हत्या कर देना। यह दिन भारत के इतिहास में काला दिन कहलाएगा, क्योंकि यह जघन्य कृत्य स्वाधीन एवं आत्मसम्मानयुक्त भारत की नींव डालने वाले के प्रति घोर कृतघ्नता और अमानवीयता थी। गाँधी के विरोधी ने "नीरवता की आवाज़" को दमित करना चाहा, किन्तु वह आज भी हर प्रकार के अन्याय के विरुद्ध खड़े कोटिजनों में मुखरित है। गाँधी ने अपना सर्वस्व राष्ट्र की निर्मिति में लगा दिया, जिसे कवि रामधारी सिंह दिनकर ने कुछ इस प्रकार कहा है:

लो शोणित, कुछ नहीं अगर यह आँसू और पसीना,
सपने ही जब धधक उठें तब क्या धरती पर जीना?
सुखी रहो, दे सका नहीं मैं जो कुछ रो-समझा कर,
मिले तुम्हें वह कभी भाइयों-बहनों! मुझे गँवा कर।

सम्पूर्ण मानव-जगत् को महात्मा गाँधी का अवदान अविस्मरणीय है; अत एव गाँधी कभी मर नहीं सकता, प्रत्युत वह आगामी युग में भी प्रकाशस्तम्भ बनकर खड़ा रहेगा। यह आशावादी दृष्टिकोण दिनकर जी के शब्दों में स्वनित हुआ है:

एक देश में बाँध संकुचित करो न इसको,
गाँधी का कर्तव्य-क्षेत्र दिक नहीं, काल है।
गाँधी हैं कल्पना - जगत के अगले युग की,
गाँधी मानवता का अगला उद्विकास हैं।

नि:सन्देह महात्मा गाँधी का दर्शन आज के सन्दर्भ में भी पूर्णत: प्रासंगिक है। आज के हिंसा, अशान्ति, असहिष्णुता, लोभ, अहंकार, स्वार्थ और भौतिकता के दौर में गाँधीवादी मूल्यों से जीवन-शैली में सुधार किया जा सकता है। आज विश्वशान्ति बनाम विश्वयुद्ध, लोकतन्त्र बनाम अधिनायकवाद तथा अध्यात्म बनाम भौतिकतावाद के संघर्ष में गाँधीवादी दर्शन से कारगर समाधान निकल सकता है। स्वैच्छिक सहयोग तथा सम्मानजनक एवं शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व से ही विश्वशान्ति सम्भव हो सकती है। 

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