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हाड़ी रानी!

रण शोणित पी हो मतवाले, जहाँ वीर रण खेत उगे।
पीकर बैरी ख़ूं के प्याले, जहाँ नयन मद तेज जगे।
जहाँ मान के ख़ातिर पल में, जा भेंटे जौहर ज्वाला।
जहाँ नारियाँ भी रण में जा, पीती हैं रक्तिम हाला।
 
 (१)
वीर प्रसूता इस धरती की, अमर कहानी आज सुनो।
रणखेलारों की रण-गाथा, रणभेरी का नाद सुनो।
सुनो आज उजले पृष्ठों पर, लिखी समर्पण गाथा को।
वीरों की धरती पर जगती, वीर समर्पित माता को।
 
आँख मूँद कर लगा समाधि, बीच ठहर मत जाना तुम।
बिन जाने ही, सती कहानी, देख, लौट मत आना तुम।
तेरे मन के सब प्रश्नों का, उचित आज उत्तर दूँगा।
अमर-सिंहनी की गाथा को, उदय-अस्त तक स्वर दूँगा।
 
जिसको पाकर इस धरती का, कण-कण मद भर हर्षाया।
जिसकी छवि निरखने ख़ातिर, काल, स्वयं नीचे आया।
राजमहल की छत पर उस दिन, अलग लालिमा छाई थी।
जब बूँदी के राजमहल में, सिंह शाविका जाई थी।
 
माँ की कोख जन्म दे हर्षी, पिता भाल, सुन हर्षाया, 
और महल की प्राचीरों ने, नत होकर मंगल गया।
देख सुकोमल कुसम कली को, बाँझ पयोधर भर आए।
दास-दासियाँ राजकुँवरी को, देख नयन भर मुस्काए।
 
बाबोसा की पलक लाड़ली, वह बासा की लाड़ेंसर, 
लिखा गई इतिहास पृष्ठ पर, हाड़ी रानी सलेहकवँर।
जैसे-जैसे उदय काल में, नया दिवस जुड़ता जाता, 
स्वर्ण किरण के नवल रूप में, आकर्षण बढ़ता जाता।
 
पूर्ण चंद्र-सा खिला वदन है, अधर सुकोमल मधुप्याली।
रक्तिम पंकज से गालों पर, चढ़ी हुई केसर लाली।
आँखों की एक झलक नेह भर, सम्मोहित पल में करती।
और कुटिल, कामी, पापी के, पल में प्राण हरण करती।
 
नख-शिख तक यौवन की आभा, कमल-कोष को भर लाई, 
राजकुँवरी के प्रणय काल की, मधुर बेल मन हर्षाई।
जान पिता ने कुँवर रतन को, लग्न पत्रिका भिजवाई।
छोड़ पिता का गेह सिंहनी, बहू सलुम्बर बन आई।
 
घूँघट पट में सजी रानी को, देख सलुम्बर हर्षाया।
मानो मुरझाए फूलों ने, दिवस बाद घन को पाया।
नवजोड़े में सजे रूप की, शोभा कही नहीं जाती।
मानो वासव हाथ पकड़कर, शची महल पर चढ़ आती।
 
आज सलुम्बर के महलों को, सूर्य किरण का साथ मिला, 
और सिंह चुड़ावत विधु को, सूर्य प्रभा का हाथ मिला।

 
(२)

सुनो कहानी अब कहता हूँ, भेंटी अमर निशानी की।
कुसम कली का रूप छोड़ कर, बनी चंडिका रानी की।
 
अमर-रात का नेह नयन भर, रानी रनिवासे आई।
स्वर्ण जड़ित रानी की आभा, देख चाँदनी शरमाई।
हथलेवा की रेख हाथ की, राजकुँवर पर वारी थी।
अमर सुहागिन की बिंदी पर, वज्रमणि बलिहारी थी।
 
माँग सजा सिंदूर केसरी, नई प्रीत का बंधन था।
कृष्ण मेघ के बीच रवि की, किरणों का अभिनंदन था।
सजी राखड़ी दमक रही थी, हीरक आभा को पाकर।
भरी गर्व मद झूल रही थी, नाक, बेसरी अपनाकर।
 
कर्णफूल जगमग-जगमग कर, सम्मोहित करता जाता।
कंठ हार पा कुँवरी वक्ष को, मन ही मन में इठलाता।
स्वर्ण जड़ित गज रदन वलय की, शोभा आज निराली थी।
कांकड़ डोरा की आभा पर, विधु किरणें बलिहारी थी
 
नवजोड़े में सजी हंसनी, खनक रही बिछियाँ सारी, 
छमक रही छम-छम पायल पर, सरगम ने वी़णा वारी।
सजी सेज पर छुईमुई सी, स्वप्न सजा बैठी रानी।
प्रथम मिलन की मधुर-शर्म भर, झुका नयन बैठी रानी।
 
राजबाग में खिली पद्मिनी, चंद्र प्रभा पा मुस्काई।
प्रणय-सेज पर नवल रूपसी, कुँवर याद कर शरमाई।
चौंक पड़ी वह बालमृगी-सी, चौखट की आहट पाकर, 
धड़क उठा धड़-धड़ हृदय तल, डरी, सिमट गई शरमाकर।
 
खींच लिया झट से घूँघट पट, अलि पास पाकर कली ने, 
अरुण कली को मंत्र-मुग्ध हो, निर्निमेष देखा अलि ने।
देख रहा है कुँवर नेह भर, डरे, मौन से बात करे, 
सोच रहा है छूआ भूल से, छूअन, रूप से घात करे।
 
भला, रति का संग मदन के, नयन मूँद कब तक रहता, 
खिलें कुसुम को देख भँवर कब, सुधा पिपासा को सहता।
पास गंध को पा गंधी भी, विवश गंध हित ललचाता।
अंशुमाली का कर आंलिगन, कुसुम खिले बिन रह पाता?
 
राजकुँवर ने रूप-राशि का, स्नेहसिक्त सम्मान किया।
नर-केहरी ने प्रणय-सेज पर, बाघिन का आह्वान किया।
कहा कुँवर ने, हाथ थाम कर, अधर सुधा प्याली भर दूँ, 
सुधा सिक्त इस कमल कोष को, अधरों पर खाली कर दूँ।
 
बरसों के अरमान हृदय में, स्वप्न सजाए जो मन में, 
फूलों सा मकरंद भरा है, नवल रूपसी के तन में, 
नेह पिपासु मधुपाली को, कुसुम-रंज पूरित कर दूँ।
रमण प्रिया के अंग-अंग को, प्रणय-सिक्त मूरत कर दूँ।
 
(३)

मदन-भार भर झुका अधर ज्यों, पड़ी कान आ रणभेरी, 
पलक झपकतें हटा अधर से, बिना एक पल की देरी।
लगा बाज़ ज्यों प्रणय युगल पर, अनायास आकर झपटा।
लगा मुकुल-नव भ्रमर बीच में, विध्न हिमोपल ने पटका।
 
टूट गये अरमान बिखर कर, रूठ गये सपने सारे।
लगा, ले गये प्राण चुरा कर, मिलन पूर्व ही हत्यारे।
नहीं, नहीं यह समय नहीं है, लौट युद्ध में जाने का।
सुधा सिक्त मधु अधर त्यागकर, रण में रक्त बहाने का, 
 
मधुर महकते नंदन वन को, छोड़, भला कैसे जाऊँ।
कुसुम कली की गंध छोड़ कर, रक्त भात कैसे खाऊँ।
मिटे आज मेवाड़ वंश या, झुकें आज राणा रण में।
आन-बान-सम्मान तजे या, शीश कटे राणा क्षण में।
 
पर मैं तज इस अमर-रात को, रमण काल को, रमणी को।
नहीं जाऊँगा आज त्यागकर, भले त्याग दूँ धरणी को।
भूल गया इतिहास रक्त का, भूल गया कुल मर्यादा।
महासुभट नववधू मोह में, धसा जा रहा था ज़्यादा।
 
नेह आस भर गया पास जब, चीख़ पड़ी रानी क्षण में, 
कूद पड़ी झट प्रणय-सेज तज, नाथ, न जाओ तुम रण में।
धधक उठी आँखों में ज्वाला, रणचंडी का रूप लिया।
तेग खींच ली म्यान कोष से, हटा सेज से भूप दिया।
 
स्थिर नहीं हुई एक पल को, नई आग-सी दहक उठी, 
रौद्र वदन विकराल भंगिमा, तीक्ष्ण नयन कर बहक उठी।
अरे! सुकोमल अंग आपके, खड़ग धार न पाएँगे।
झुके हुए स्कंध मोह से, कैसे भार उठाएँगे।
 
कहा चीख़ कर क्षत्राणी ने, नाथ, पहन लो कर कंगन।
अधर लालिमा, कंठ हार धर, नाथ सजा दो मुख चंदन।
आप रहो रनिवास नाथ, मैं, पहन कवच रण अश्व चढ़ूँ।
आप सँभालो भोज कक्ष, मैं, जा बैरी के रक्त मढ़ूँ।
 
भूल गये इतिहास आप क्यों, देश मान हित प्राण लुटे, 
झुके नहीं कभी, ध्वज राष्ट्र का, वंश मिटे, ना आन मिटे।
भला आज क्यों ख़ून आपका, छोड़ गया अपनी ज्वाला, 
भूल गये इतिहास पुराना, कहाँ गया अजेय भाला?
 
कहाँ सुप्त हो पड़ा खड्ग है, कहाँ असि तज धार पड़ी?
और कहाँ है ढाल आपकी, कहाँ अश्व की रास पड़ी?
अधर मधुर-रस गरल, वीर हित, सेज व्याल-सी जान प्रिय।
प्रिया-पाश विष-जाल लूत का, भोग मृत्यु-सम मान प्रिय।
 
(४)

मौन रहा कुछ देर भ्रमित हो, मोह-पाश ने उलझाया।
तंज़ व्याल-सा दंश वक्ष पर, चुभा, अंत ना सह पाया।
तड़क उठी बिजली रग-रग में, नेत्र सुर्ख़ हो दहक उठे।
एकलिंग के जय निनाद से, अवनी-अम्बर लहक उठे।
 
मुकलावा का भेष त्याग कर, पहन लिया रण का बाना।
वर्म चर्म पर खड्ग हाथ धर, चढ़ा अश्व पर, सुन ताना।
देख कुँवर को वीर भेष में, चहक उठी हाड़ी रानी।
दौड़ गई गवाक्ष आड़ में, नयन कोष भर क्षत्राणी।
 
शीघ्र सँभलकर अश्रु पौंछकर, चली सजा ले केसर थाल।
युद्ध भेष में सजे वीर का, सजा दिया केसरिया भाल।
इसी दिवस हित पुत्र जन्म दे, क्षत्राणी रमणी हँसती।
इसी दिवस हित बहन, सहोदर, के हाथों राखी सजती।
 
इस पल की प्रतीक्षा रानियाँ, स्वप्न सजा कर करती हैं।
राष्ट्र-हितार्थ प्रणय-पल को भी, हँस न्यौछावर करती हैं।
युद्ध भेष में सजा कंत या, पुत्र सजा हो रण आगे।
देख उसे भार्या, जननी के, समझो आज भाग जागे।
 
माँ की अंक देख हर्षाती, शुष्क पयोधर भर आते।
और प्रिया के कर-कंगन भी, महा भाग्य पर इठलाते।
कहा रानी ने, नाथ निभाओ, धर्म, राष्ट्र का मान रहे।
प्राण भले ना रहे नाथ पर, मातृभूमि की शान रहे।
 
जाओ नाथ, मैं करूँ प्रतीक्षा, लौट आपके आने की।
वरमाला के बाद आपको, विजयमाल पहनाने की।
मन आशंकित हुआ क्षणिक पर, मन भावों को छिपा लिया, 
नेह-बांध को रोक हृदय में, नेत्र तेज भर विदा किया।
 
चला वीरवर अश्व पीठ चढ़, रमण-सेज तज रण करने, 
प्रिया त्याग, तज सेज प्रणय की, माँ को तन अर्पण करने।
ओझल हुआ सवार आँख से, दृग से टूट पड़े मोती, 
बरबस रोक, कहा रानी ने, क्षत्राणी, धीरज खोती?
 
रानी दौड़ गई रनिवासे, सूनी सेज निहार रही।
क्षणिक मिलन की याद, नयन भर, नयन कोर से टूट बही।

 

(५)
उधर वीर चुड़ावत मन में, अन्तर्द्वंद्व विकराल उठा।
कभी युद्ध उन्माद जगे तो, कभी रूप की छाई घटा।
कभी खींच कर अश्व रास को, एकलिंग की जय बोले।
कभी रूपसी के अधरों के, बीच कुँवर का मन डोले।
 
कभी अश्व, राह बीच रोक कर, कहे लौट जाऊँ क्षण में, 
कभी कहे यह व्यर्थ वीर हित, पीठ दिखाए जो रण में।
एक ओर हित मातृभूमि का, एक ओर है प्राणप्रिय।
एक ओर क्षत्रियत्व वीर का, एक ओर जो वचन दिये।
 
तेज़धार के भँवर बीच में, फँसा वीर का मन-बेड़ा।
उथल-पुथल कर रहा वेग से, पल में रण, पल में खेड़ा।
उतर पड़ा झट मोह कूल पर, मोह जीत गया रानी का।
पास बुलाकर कहा दास से, ला दे अंश निशानी का।
 
ला दे चूड़ा, हार, करधनी, ला रखड़ी, ला दे नथनी।
शीशमांग या कर्णफूल ला, ला दे पूंच, चूंप बगड़ी।
कांकड़ डोरा सूत्र माँग ला, हथलेवा का पट ला दे, 
जा गठजोड़ा गाँठ खुला ला, पग पायल, कच-लट ला दे।
 
जा-जा ला दे माँग निशानी, नवल रूपसी रानी से, 
ला दे नयन कोर का अंजन, जो दे, ला क्षत्राणी से।
 
स्वामी का आदेश शीश धर, दूत महल की ओर चला, 
एक नई गाथा लिखने को, धर्मराज का पृष्ठ खुला।
राजमहल की चौखट पर जा, कहा, दूत ने नत होकर, 
रानी सा! आदेश कुँवर का, दे दो नेह चिह्न आकर।
 
दे दो चूड़ा, हार, करधनी, दो रखड़ी, ला दो नथनी।
शीशमांग या कर्णफूल दो, दे दो पूंच, चूंप, बगड़ी।
कांकड़ डोरा सूत्र खोल दो, हथलेवा का पट दे दो, 
गाँठ खोल गठजोड़ा दे दो, पग-पायल, कच-लट दे दो।
 
दो रानी सा प्रेम-निशानी, राणा मोह तजे क्षण में।
मोह विवश हो आज वीर पर, संकट आन पड़ा रण में।
 
राजदूत की बातें सुनकर, मन विषाद भर घबराई।
लगा पति के कर्म बीच, मैं, स्वयं रुकावट बन आई।
देह-रूप बन गया बेड़ियाँ, राजकुँवर को बाँध लिया।
रूप-जाल ने मोह-पाश में, नर-केहरी को फाँस लिया।
 
लगा रानी को रूप व्याल-सा, देह, स्वर्ण-घट ज़हर भरा।
लगा स्वर्ण शृंगार जाल-सा, फँसा कुँवर का धर्म हरा।
नेत्र लगे वर्तिका दीप की, कुँवर कीट-सा जान पड़ा।
केश लगे विष भरे बलाहक, कुँवर कंज सा जान पड़ा।
 
हुई रानी को घृणा स्वयं से, क्षणिक मौन हो कर बोली।
रुको दूत लो प्रेम-निशानी, कुँवर सजाए रण-डोली।
 
प्राण हथेली पर ले रण में, विजय-वधू का वरण करे।
पहन आज ये अमर निशानी, महाकाल का रूप धरे।
दहक उठे अंगार नेत्र में, प्रलय-मेघ सी गरज उठी।
देख रूप विकराल कुँवरी का, दूत देह डर लरज उठी।
  
उसे काँपते देख रानी ने, कहा, वीर मन धीर धरो।
सुनों ध्यान से स्वामिनी आज्ञा, निर्भय हो निज कर्म करो।
 
राजकुँवर से कहना जाकर, मोह, युद्ध का धर्म नहीं।
समरांगण में खड़े वीर का, ये वीरोचित कर्म नहीं।
जहाँ युद्ध उन्माद हृदय में, वहाँ अधर रस पान नहीं।
रणचंड़ी के नृत्यांगन में, रमण-प्रिया का गान नहीं।
 
याद दिलाना कुँवर रतन को, मोह विवश जो भूल गया।
कहना कुल-गौरव की गाथा, मोह-शाख जो झूल गया।
शीश चढ़े केसरिया बाना, खड्ग सजे जिन हाथों में, 
रक्त फाग, खेलार मृत्यु का, भुजा फड़कती बातों में।
 
रहा केसरी सा जो निर्भय, जो अरिदल का काल बना।
नेत्र-तेज, मस्तक पर आभा, अरि शोणित से हाथ सना।
जिसका तेज देखकर दिनकर, कुछ पल खुद पर झुँझलाये।
जिसके असि वेग के आगे, पवन वेग भी शरमाये।
 
जिसके घोटक की गति आगे, न बीजुरी का ज़ोर चले।
चले जिधर से लगे उधर से, साथ स्वयं यमराज चले।
आज वही कर्तव्य भूल कर, निज मर्यादा त्याग रहा।
रक्त पिपासा छोड़ सिंह ये, रूप-पंक को माँग रहा।
 
(६)
पर ले जा ये अमर निशानी, जिसे देख अरिदल भागे, 
मोह पाश में फँसे कुँवर का, मोह छूट पौरुष जागे।
नव-यौवन की सुषमा ले जा, आँखों से ज्योति ले जा।
गालों की अरुणाई ले जा, श्वेत रदन मोती ले जा।
 
अधरों की कोमलता ले जा, खुले केश की घन-माला, 
ले जा आज कुँवर को जा दे, सती-सिंहनी की ज्वाला।
ले जा चूड़ा, हार, करधनी, ले रखड़ी ले जा नथनी।
शीशमांग ले कर्णफूल ले, ले जा पूंच, चूंप, बगड़ी।
 
कांकड़ डोरा सूत्र खोल दूँ, हथलेवा का पट दे दूँ।
गाँठ खोल गठजोड़ा दे दूँ, पग-पायल कच-लट दे दूँ।
ले जा सारा नेह कुँवर का, आँखों का अंजन ले जा, 
माँग सजा केसरिया ले जा, भाल सजा चंदन ले जा।
 
हाथों की मेहँदी तू ले जा, पैर महावर पायल ले।
जा दे कुँवर रतन को जाकर, जो भी सारा सायल ले।
खड़ग खींच ली म्यान कोष से, चपल चंचला ने झट से।
महाशक्ति ने रक्त नेत्र भर, हटा दिया घूँघट घट से
 
चीख़ उठी विकराल रूप धर, जोश भर गया बातों में, 
उठा तेग, सिर काट दे दिया, राजदूत के हाथों में।
सजा थाल में ढका वसन से, दौड़ पड़ा सेवक रण में।
थर-थर काँप रहे हाथों से, जा सौंपा उसने क्षण में।
 
ये लो कुँवर निशानी ले लो, पावन सती कुमारी की।
कुलदेवी की भेंट शीश लो, कुल गौरव बलिहारी की।
मोह-विक्षिप्त रूप-अंधी ने, हटा थाल से वसन दिया।
शीश कटा देखा रानी का, चीख़ पड़ा भर बाँह लिया।
 
टूट गये तटबांध कोर के, बह निकली तपती धारा।
बिलख रहा है चूम-चूम कर, मान स्वयं को हत्यारा।
 
ओ रानी ! ओ प्राणवल्लभा! तुमने आज किया ये क्या?
मैंने माँगी नेह निशानी, तुमने आज दिया ये क्या?
भूल गया इतिहास पुराना, भूल गया था रण-पथ को।
रूप राशि में डूब आज मैं, भूल गया था रण-रथ को।
 
खोल दिए हैं नेत्र आपने, रस लोलुप काले खग के, 
काट दिए हैं मोह जाल सब, मधु कंटक झाड़ें डग के।
 
कुँवर रतन ने शीश-शिखा को, बाँध, बनाई गल-माला।
पहन चला रण-खेल खेलने, पीने रण शोणित हाला।
कूद पड़ा विकराल रूप धर, रोम-रोम में तेज भरा।
गरज उठा वह प्रलय-मेध-सा, बैरी तज निज प्राण गिरा।
 
जीत मिल गई रतन कुँवर को, सीख दे गई क्षत्राणी।
अमर रहेगी अमर निशानी, अमर रहे हाड़ी रानी।

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