अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

हर काम अच्छे के लिए होता है

महाराजा शमशेर बहादुर को शिकार खेलने का बहुत शौक था। शिकार में सदा उनके साथ उनका वज़ीर गजराज सिंह होता था और वो शिकार खेलने में राजा का मार्गदर्शन करता था। एक बार बन्दूक चलाते हुए राजा का घोड़ा बिदक गया, राजा नीचे गिर गए और उनकी छोटी उँगली कट गयी। गजराज सिंह ये सब देख रहा था। राजा के पास आकर बोला, “महाराज जो कुछ भी होता है अच्छेके लिये होता है।” महाराजा को ये बात अच्छी नहीं लगी। राजधानी में लौट कर सब से पहले राजा ने क्रोध में आकर गजराज सिंह को हवालात में बन्द कर दिया।

दिन बीतते चले गये। राजा को शिकार का शौक आया मगर इस बार वो अकेले ही गये। गजराज सिंह तो बेचारा हवालात में चक्की पीस रहा था। शिकार की खोज में राजा को ध्यान नहीं रहा, वो भटक गये और अपनी सीमा पार करके अकेले ही भीलों के देश में जा पहुँचे। इन भीलों पर राजा ने बहुत अत्याचार किये थे। आज उन्हें अपना बदला लेने का अच्छा मौका मिला था।

उन्होंने राजा को पकड़ के एक पेड़ से बांध दिया और बलि की तैयारी करने लगे। राजा बेबस था। कुछ कर भी नहीं सकता था। पूजा के बाद भील पुजारी ने भील सरदार को आदेश दिया कि राजा का सिर काट कर देवता के चरणों में चढ़ा दिया जाए। जैसे ही भीलों के सरदार ने राजा का सिर काटने को अपनी तलवार उठाई उसकी निगाह राजा की कटी उँगली पर पड़ गई। उसने अपना हाथ रोक कर पुजारी से कहा,“पण्डित जी, क्योंकि इस राजा का शरीर खण्डित है, इस कारण इस की बलि नहीं चढ़ाई जा सकती।” 

पण्डित जी ने जब ये सब देखा तो कहने लगे - “सरदार ठीक कहता है। चूंकि ये राजा बलि के योग्य नहीं है, इस को छोड़ दिया जाए।” ऐसा कह कर भीलों ने राजा को छोड़ दिया और वह अपनी राजधानी को लौट आया। वापस आकर राजा ने सब से पहले गजराज सिंह को कारागार से बुलाया, उस से क्षमा मांगी और पूरे सम्मान के साथ अपने पास बिठाकर कहा, “गजराज सिंह तुम ने ठीक कहा था, हर काम अच्छे के लिये होता है।”

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

17 हाथी
|

सेठ घनश्याम दास बहुत बड़ी हवेली में रहता…

99 का चक्कर
|

सेठ करोड़ी मल पैसे से तो करोड़पति था मगर खरच…

अपना हाथ जगन्नाथ
|

बुलाकी एक बहुत मेहनती किसान था। कड़कती धूप…

अपने अपने करम
|

रोज़ की तरह आज भी स्वामी राम सरूप जी गंगा…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

सांस्कृतिक कथा

कविता

किशोर साहित्य कहानी

लोक कथा

ललित निबन्ध

आप-बीती

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं