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हवाई, हवाई-भत्ता 

ख़बर आई है कि कुछ माननीयों ने अपने गाँव तक के लिये हवाई यात्रा का भत्ता वसूल लिया। तो इसमें कौन सी आफ़त आ गयी। जब भगीरथ ऊँचे हिमालय पर चढ़ कर गंगा को अपने घर तक ले जा सकते थे तो हमारे माननीय एक अदना से हवाई जहाज़ को अपने गाँव तक क्यूँ नहीं ले जा सकते? असंभव को संभव बनाना ही असली पुरुषत्व की निशानी है और पुरुषत्व के मामले में हमारे कई माननीय किसी से कम नहीं हैं, यह बात गाहे-बगाहे आने वाली सी.डी. अक्सर साबित करती रहती हैं। 

कुछ दिन पहले किसी ने अफ़वाह फैला दी थी कि राजधानी एक्सप्रेस ने एक माननीय को वहाँ उतार दिया था जहाँ उसका स्टापेज नहीं था। तो भैया जब रेल वहाँ रुक सकती है जहाँ उसका स्टापेज नहीं था तो हवाई जहाज़ वहाँ क्यूँ नहीं रुक सकता जहाँ उसका स्टापेज नहीं है। सरकारी बसों की तो नॉन-स्टापेज पर रुकने की गौरवशाली परम्परा रही है, उनका कोई बाल-बाँका नहीं करता फिर हवाई जहाज़ के साथ यह दोमुँही नीति क्यूँ? रेल और बसों को तो अचिह्नित जगहों पर ले जाने में हज़ार झंझट! पटरियाँ बिछाओ, सड़कें बनवाओ, सिग्नल लगवाओ मगर हवाई जहाज़ के साथ तो ऐसा कोई लफड़ा नहीं। ऊपर अल्ला-मिंया का खुला आसमान और नीचे अपने राम की धरती। जहाँ तक चाहो ऊपर उड़ो और जहाँ चाहो नीचे उतार लो। क़ायदे से तो उन जाबांज पायलटों को ढूँढ़ कर सम्मानित करना चाहिये जिन्होंने माननीय के गाँव में ऐसी सफलता पूर्वक लैंडिग करायी कि किसी को कानो-कान ख़बर भी न हो सकी। 

क्या कहा? ढूँढ़ा जायेगा तो पता चलेगा कि हवाई जहाज़ की लैंडिग तो हुई ही नहीं थी। तो इसमें कौन सी आफ़त आ जायेगी? हवाई भत्ता लेने का हवाई जहाज़ की लैंडिग से कोई संबध ही नहीं है। क्योंकि हो सकता है कि जनसेवा के लिये गाँव शीघ्र पहुँचने के लिये माननीय उड़ते हवाई जहाज़ से ही छतरी बाँध कर सीधे अपने गाँव में कूद गये हों। आप तो जानते ही हो कि ज़्यादातर जगहों पर दूसरी पार्टी वालों की सरकार है। स्वाभाविक रूप से वहाँ पूरे राज्य में अव्यवस्था फैली होगी। अब हवाई अड्डे पर उतर कर गड्ढेदार सड़कों पर धक्के खाते गाँव पहुँचा जाये तो सारा समय तो यात्रा करने में ही बीत जायेगा ऐसे में जनसेवा कब करेगें? इसलिये माननीयों ने अगर जनता तक पहुँचने का शार्टकट रास्ता निकाल लिया तो इसकी तो दिल खोल कर प्रसंशा करनी चाहिये।

वैसे भी जिस देश में स्कूटर पर भैंसें सवारी कर सकती हों, प्लेटफ़ॉर्म पर घोडे़ दौड़ सकते हों, काग़ज़ों पर नहरें चल सकती हों उस देश में गाँवों में हवाई जहाज़ क्यूँ नहीं चल सकते? सच पूछा जाये तो इस शोर-गुल के पीछे असली वज़ह शहर वालों की संकीर्ण मानसिकता है जो गाँव वालों को आगे बढ़ता नहीं देख सकते। अगर शहर का छोरा पानी से कार चला दे, हवा से बिजली बना दे तो फौरन उसे बड़े-बड़े पुरस्कार देने की बात करने लगेंगे लेकिन अगर गाँव का कोई सपूत राजधानी में झंडे गाड़ने के बाद हवाई जहाज़ से गाँव लौटे तो सबके सीने पर साँप लोटने लगते हैं।

लोगों को समझना चाहिये कि सभी योजनायें पहले काग़ज़ पर बनती हैं, उनको अमली जामा बाद में पहनाया जाता है। हो सकता है कि माननीय ने इस बार गाँव की हवाई यात्रा काग़ज़ पर की हो लेकिन इससे कुछ दिनों बाद गाँवों में हवाई जहाज़ पहुँचने की संभावनायें उत्पन्न हो गयी हैं। एक बार हवाई जहाज़ गाँव तक पहुँच भर जाये उसके बाद  गाँव के जुगाड़ू लोग उसकी टेक्नालोजी समझ कर बैलगाड़ी में ट्यूबवेल का इंजन बाँध कर उसे उड़ाने में देरी नहीं लगायेगें और टयूबवेल के इंजन के मल्टीपरपेज यूटीलिटी में एक और गौरवशाली अध्याय जुड़ जायेगा। इसलिये इस हवाई, हवाई-भत्ते की संभावनाओं को देखिये उसके निहितार्थ को मत देखिये। पूरा देश वैसे भी संभावनाओं पर ही जीता है इसे असंभावना मत बनाइये।

वैसे अंदर की बात तो यह है कि माननीय ने इस तरह से जो हवाई भत्ता लिया था उसमें उनका कोई निजी स्वार्थ नहीं था। उनका तो पूरा जीवन ग़रीबों की सेवा के लिये अर्पित है। जो धन इस रास्ते से कमाया उसे भी उन्होंने गाँव वालों के कल्याणार्थ  ख़र्च कर दिया था लेकिन अगर जाँच-वाँच हुई तो इस पैसे को लौटाने के लिये भी तैयार हैं। भले ही पैसा वापस करने से ग़रीबों को कितना भी कष्ट क्यूँ न हो। राष्ट्रहित में वह इतना बलिदान करने के लिये स्वेच्छा से तत्पर हैं। इसलिये उन पर कीचड़ उछालना बंद कीजये और इस कीचड़ को सँभाल कर रखिये क्योंकि इसको उछालने के अभी बहुत से सुअवसर पलकें बिछाये आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।

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