अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

पारिश्रमिक

उर्दू के दिवगंत शायर लुधियानवी फ़िल्मी दुनिया के जाने-माने गीतकार थे। फ़िल्म जगत में प्रवेश से पूर्व उनका कार्य स्थल लाहौर था। वहाँ के साहित्यिक क्षेत्र के उनकी बड़ी ख्याति थी, परन्तु आर्थिक रूप से उनकी स्थिति कभी अच्छी नहीं रही। भारत विभाजन से पूर्व साहिर लुधियाना लाहौर से एक उर्दू मासिक ’साक़ी’ प्रकाशित करते थे। यद्यपि उनके साधन सीमित थे और पत्रिका भी घाटे में चल रही थी, परन्तु वे लेखकों को उनकी मजदूरी अवश्य देते थे, चाहे वह कम ही क्यों न हो।

एक बार वे लेखकों को समय पर पैसे न भेज सके। ग़ज़लगो शमा ’लाहौरी’ को पैसे सख़्त ज़रूरत थी। वे भयंकर सर्दी में काँपते हुए हुए साहिर के घर पहुँचे और अपनी प्रकाशित ग़ज़लों के पैसे माँगे। साहिर उन्हें अन्दर ले गए। उन्हें बैठाया और गर्मा-गर्म चाय पिलाई। जब शमा लाहौरी की कंप-कंपी बंद हो गई तो सहिर शांत भाव से उठे। उन्होंने खूँटी पर टँगा हुआ नया कोट उतार कर "शमा" को सौंप दिया और कहा इस बार नकद की बजाय इस में पारिश्रमिक दिया जा रहा है। शायर की आँखें सजल हो गईं, वह कुछ भी बोल न सके।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अम्मा
|

    बहुत पहले श्रीमती आशा पूर्णा…

इन्दु जैन ... मेधा और सृजन का योग...
|

२७ अप्रैल, सुबह ६.०० बजे शुका का फोन आया…

कदमों की थाप
|

जीने पर चढ़ते भारी भरकम जूतों के कदमों की…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

पुस्तक समीक्षा

बात-चीत

कहानी

व्यक्ति चित्र

स्मृति लेख

लोक कथा

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

सांस्कृतिक कथा

आलेख

अनूदित लोक कथा

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं