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पक्षियों का कलरवी नृत्य

ये उजला और आकाशीय नीलिमा से भरा दृश्य रामघाट प्रयागराज है।

सबसे पहले इस तस्वीर देख कर मुझे शून्यता की अनुभूति होती है, जिसमें दिख रहे हैं नीचे निर्वाक हो कर बहती हुई गँगा के ऊपर नृत्यों में अठखेलियाँ करते ये सायबेरियन पक्षी।

मैंने माँ गंगा के कितने शहरों के कितने घाट घूमे होंगे, लेकिन जो अनूठापन, जो अल्हड़पन मैंने रामघाट में देखा वो कहीं नहीं।

बनारस के घाट ऐसे हैं जैसे किसी ख़ूबसूरत बग़ीचे में फूलों की क्यारियाँ, सब कुछ तरतीबी से भरा हुआ।

निश्चित ही यह आँखों के लिए आनंदित करने वाला होता है, लेकिन इसमें बनावट है, इनमें मानवीय संरचनाओं में ढल जाने के कारण गंगा-जल में रँग जाने की विशेषता ही समाप्त हो गई, इनकी सौंदर्यता ही समाप्त हो गई।

लेकिन, प्रयागराज का रामघाट ऐसे है जैसे हिमालय। या जैसे अज्ञेय का शेखर, जो अपने आप में प्रतिष्ठित है अपनी ख़ूबियों के कारण।

सब कुछ प्राकृतिक, बनावटी कुछ भी नहीं।

यूँ तो, प्रयागराज में कोई ऐसा घाट नहीं है जिसमें मानव की शिल्पकला द्वारा घाटों में कुछ क्षेपक रचा जाए। किन्तु फिर भी एक रमणीयता है जो इसे संगम के होते हुए भी जीवंतता से पूरित करती है।

ठीक इस घाट के पहले, हरिहर गंगा आरती समिति द्वारा सायंकाल दिव्य गंगा आरती और तब ही आकाश भर चाँदनी की सौंदर्यता, इसके अनूठेपन में लगा देती है ‛चार चाँद’।

इसी रामघाट में भी हर साल आते हैं सुदूर साइबेरिया से ये साइबेरियन पक्षी  इनका यह समूह बाहर से तो एक फुटबॉल जैसा लग रहा था। लेकिन उस बाह्य ग्रुप के अंदर और समूह थे जो उसे अक्ष में घूर्णित कर रहे थे।

वो भी कोई दक्षिणावर्त और कोई वामवर्त।

यों समझिए कि जैसे अपनी धरती एक साथ दो गति करती हैं एक तो परिधि में, दूसरी अक्ष पर।

या जैसे मानव दो प्रकार के जगत में जीता है, एक तो अस्तित्व के तल पर और दूसरी दुनिया– जिसमें बुनता है वह कल्पनाओं का पश्मीना।

दूसरा संसार उसके स्वेच्छाओं का संसार होता है, जिसमें उन सपनों को साकार करता है जिन्हें वह अस्तित्व के तल पर नहीं कर सकता। फिर उनमें तरह-तरह के रंग भरता है, नए-नए किरदारों के सृजन करता है। ये किरदार वास्तव में उसी की अभिव्यक्ति का आदर्श है जो वह होना चाहता है और किंचित कारणों से हो नहीं पाता, उन्हें कल्पनाओं के पंख लगा कर अभिव्यक्त करता है और भरता है उनमें सुन्दर रंग।

और इसी तरह अक्षीय घूर्णन पर कर रहे थे साइबेरियन पक्षी नृत्य। 

मना रहे थे उत्सव इस नई धरित्री का, जो लगभग सोलह सौ किलोमीटर की दूरी तय कर पहुँचे है प्रयागराज।

अब मंज़िल मिल गई। वो धरती मिल गई जहाँ पहुँचने के लिए नियति तीन माह पूर्व ही इनके शरीर को ढालती है इस महायात्रा के लिए।

काश! ये भी जान पाते कि ये भूमि तीर्थराज प्रयागराज है।

इस नियति का विधान कितना मुग्धकारी है न! कि लाखों मनुष्यों के साथ ये पक्षी भी आते हैं सैकड़ों-हज़ारों उद्यानों को पार करते हुए इस रेतीय महावन में, और करते हैं तीन माह का कल्पवास।

कौन जाने! उनको मुक्त कर देती होगी ये पुण्य धरा, इस जीवन-मरण के चक्र से, या फिर देती होगी वरदान मनुष्य योनि में जन्म का . . . ताकि कर सकें मुक्त स्वयं को . . .। 

कौन जाने!
 

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टिप्पणियाँ

रजनीश तिवारी 2021/04/30 08:14 PM

अति सुंदर चित्रण....

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