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विशेषांक

इक्कीसवीं सदी की कहानियाँ

आवरण चित्र: श्रेया श्रुति

 

साहित्य कुञ्ज के ‘इक्कीसवीं सदी की कहानियाँ’ विशेषांक के संदर्भ में

सुमन कुमार घई

 

साहित्य कुञ्ज इस सदी के पहले पच्चीस वर्ष पूरे होने के पश्चात पलट कर इस सदी की कहानी की ओर देखने का प्रयास कर रहा है। इस महत्त्वपूर्ण प्रयास का बीड़ा डॉ. आरती स्मित ने उठाया है—वह इस विशेषांक की सम्पादिका हैं। सम्पादन में पूरे निर्णय उनके हैं और मैं इस विशेषांक में केवल तकनीकी सहायक के रूप में उपस्थित हूँ।

डॉ. आरती स्मित के साथ प्रायः साहित्य, समाज और अन्य मानवीय विषयों पर चर्चा होती रही है। अब तो यह भी याद नहीं कि कब और किस समय इक्कीसवी सदी की कहानियों की चर्चा हुई और साहित्य कुञ्ज की ओर से विशेषांक प्रकाशित करने पर सहमति बनी। यह विचार संभवतः डॉ. आरती स्मित का ही था। आशा है  कि आप सभी का समर्थन मिलेगा।

डॉ. आरती स्मित और मैं भली-भाँति इस विशेषांक के महत्त्व को भी समझते हैं और अपनी क्षमता की सीमाओं को भी समझते हैं। एक सदी के एक चौथाई भाग में जनित साहित्य की एक सम्पूर्ण विधा की विशालता को एक विशेषांक में समेट पाना भगीरथ प्रयास है। फिर भी डॉ. आरती स्मित ने इसे सफलतापूर्वक सम्पूर्ण किया है। 

इस विशेषांक को एक भाग में प्रकाशित कर पाना असम्भव है। कम से कम दो अंकों में ही इसे अपलोड किया जा सकेगा। इक्कीसवीं सदी में प्रकाशित लगभग एक सौ रचनाओं और रचनाकारों में कुछ को चुना गया है—इस विधा के पंडितों से लेकर नई क़लम तक को। 

किसी भी युग के काल खण्ड के इतिहास को साहित्य अपने दृष्टिकोण से देखते, समझते हुए परोसता है। यह समझ न तो निर्णायक होती है और न ही अन्तिम। समझने और उसे अभिव्यक्त करने की प्रक्रिया निरंतर चलती है और यह शाश्वत सत्य है। इसी तरह किसी भी विशेषांक को कह देना कि इस प्रकाशन के प्रयास से अतिरिक्त कुछ बचा नहीं है—मात्र भ्रम है। हम लोग कहानी विधा की ऊपरी सतह को केवल खरोंच पाए हैं। दूसरी और हम उत्साहित हैं और प्रसन्न हैं कि हम प्रयास तो कर रहे हैं।

एक बात मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि ‘इक्कीसवीं सदी की कहानियाँ’ विशेषांक में किसी विमर्श विशेष को नहीं चुना गया है। साहित्य कुञ्ज में इन कहानियों को कई किश्तों में प्रकाशित किया जाएगा और हर बार मैं प्रचार के विभिन्न माध्यमों से आप सभी को सूचित करता रहूँगा। 

साहित्य कुञ्ज में इसी विधा के विभिन्न पक्षों पर भी भविष्य में विशेषांक प्रकाशित करने की योजना है। इन विशेषांकों का बीजारोपण हो चुका है। हम आपके परामर्श और प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करेंगे।

सादर—
सुमन कुमार घई
प्रकाशक एवं सम्पादक साहित्य कुञ्ज
 

डॉ. आरती स्मित (विशेषांक संपादक)

 

इक्कीसवीं सदी वैश्विक स्तर पर बहुआयामी बदलाव एवं विकास की जननी के रूप में हमारे सम्मुख आई। विज्ञान एवं तकनीकी क्षेत्र में जो अद्भुत क्रांति आई, उसने जीवन की गति तेज़ कर दी। कंप्यूटर, इंटरनेट, स्मार्ट फ़ोन, आइ फ़ोन, सोशल मीडिया के कई विकल्पों सहित गूगल और चैट जीपीटी ने विश्व के आम जन को विश्व को जानने-समझने, उन तक पहुँचने की राह इतनी आसान कर दी जो विगत सदी में कुछ विकसित देशों की कल्पना का हिस्सा रही होगी और उन कल्पनाओं ने ही साकार रूप ले लिया। इलेक्ट्रिक एवं सेल्फ़ ड्राइविंग गाड़ियाँ भी इस दिशा में विज्ञान और तकनीक की सार्थकता की कहानी सुनाती है। और तो और चीन ने कृत्रिम सूरज बना लिया, वहीं भारत ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर चंद्रयान ३ की सफलतापूर्वक लैंडिंग की। कई समृद्ध परिवारों ने चंद्रमा पर ज़मीनें भी खरीदनी शुरू कर दीं। सामान्य परिवार के मेहनतकश प्रतिभाशाली युवाओं द्वारा भी नौकरी की जगह अपने व्यवसाय की शुरुआत, समूह बनाकर या अकेले छोटी-छोटी कम्पनियों की स्टार्ट अप इस सदी में अधिक हुई। इस तरह विश्व इतिहास ने अपने अलग-अलग पन्ने समृद्ध किए, इसमें कोई दो राय नहीं।

यदि ग़ौर से देखें तो इस सदी के प्रथम दशक ने सृजन अधिक किया, हालाँकि कुछ एक अप्रिय घटनाएँ भी घटित हुईं। किंतु बाद के डेढ़ दशक में विकास के बढ़ते क़दम के साथ ही ग्लोबल फ़ैमिली के बीच यानी दो देशों के बीच परस्पर वैमनस्य, कूटनीति, युद्ध आदि में भी बढ़ोत्तरी हुई। आतंकवाद एक बड़ा विश्वव्यापी मुद्दा बनकर हमारे सामने आया, जिसमें बेक़सूर ही भेंट चढ़ते रहे हैं। वर्तमान किशोर और युवा पीढ़ी ‘एआई’ का महत्त्व समझ रही है, वहीं खेल सहित अन्य कई क्षेत्रों में बहुआयामी सकारात्मक बदलाव नज़र आ रहे हैं। किशोरियों/युवतियों की भागीदारी बढ़ते देखना भविष्य के प्रति आश्वस्त करता है। हम यह सहज अनुभव कर सकते हैं कि ‘वसुधैव क़ुटुम्बकम’ मानवतापरक विचार से निकलकर व्यापारिक/व्यावसायिक विचारों से अधिक पोषित होने लगा, किंतु इससे कई नए रास्ते भी खुले। समलैंगिक विवाह को मान्यता मिलने या लिव इन को क़ानूनी स्वीकृति मिलने से समाज के परंपरागत स्वरूप में कुछ बदलाव लाज़िमी है। दैहिक संरचना से ऊपर अपने प्रेम संबंध को रखने की मानसिकता युवा दृष्टि के विस्तार का परिचायक है।

बहुआयामी बदलाव एवं विकास की पदचाप विगत पच्चीस वर्षों से भारत में भी निरंतर सुनाई पड़ती रही है। किंतु विश्व के कई देशों की तरह ही विज्ञान एवं तकनीक के अंधानुकरण एवं ग़ैरज़रूरी आदतों के विकास ने, जैसे कि गैजेट्स का ग़लत बातों के लिए उपयोग, साइबर अपराध या डिजिटल अरेस्ट, अश्लील वीडियो बनाने और ब्लैकमेलिंग जैसे अपराध को जन्म देने के साथ ही इस जाल में फँसने वालों की संख्या में बढ़ोत्तरी ने चिंता उत्पन्न की है। इसका मानव मन पर बुरा प्रभाव पड़ा है। अमानवीय घटनाओं में बढ़ोत्तरी हुई है। घर की दीवारों के कान बहरे हो गए हैं, जबकि कमरों के कान सजग हो गए हैं।

गाँव/क़स्बों/छोटे शहरों आदि की बौद्धिक चेतना के विकास के लिए शिक्षण संस्थानों, तथा स्वास्थ्य के लिए अस्पतालों और अच्छे चिकित्सकों की संख्या की बढ़त की आवश्यकता से अधिक शहरी रख-रखाव आवश्यकता बनती जा रही है। पर्यावरण से खिलवाड़ और खदानों से प्राकृतिक संपदाओं को उलीचने की प्रवृत्ति ने धरा की आंतरिक शक्ति एवं संतुलन को बुरी तरह प्रभावित किया है। जहाँ भी ऐसा हुआ, वहाँ प्राकृतिक आपदाएँ बढ़ीं। इस सदी ने अलग-अलग स्थलों पर प्रकृति के तांडव भी देखे और उसमें लील लिए गए प्राणी भी, किंतु आज भी भूल में सुधार के स्थान पर भस्मासुर की मानसिकता को बढ़ावा दे रहे हैं और भूल रहे हैं कि उसकी परिणति भी वैसी ही होगी।

इस सदी के निम्न एवं मध्यवर्गीय माता-पिता ने बेटियों के सपनों को उड़ान देने की कोशिश की, उनके बँधे पंख खोले, बेटियों का हौसला आसमान छूने लगा, किंतु एक कड़वा सच यह भी है कि असुरक्षा का शिकंजा पहले की अपेक्षा अधिक गला कस रहा है। बीते आठ-नौ वर्षों में नृशंस तरीक़े से सामूहिक यौन शोषण के बाद हत्या के बढ़ते मामले दिल दहलाते हैं। कुछ विशेष राज्यों में ग़रीब दलितों के साथ जितनी अधिक अमानवीय घटनाएँ इस बीच हुईं कि मानवता शर्मसार है। ये घटनाएँ विकास के मायनों पर पुनर्विचार करने को विवश करती हैं। सामूहिक दुष्कर्म, हत्या, अकेले रहते बुजुर्ग दंपतियों की असुरक्षा, संबंधों में अविश्वास हत्या की हद तक, गाँव से शहर तक के बदलते तेवर, व्यस्तता और एकाकीपन, स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में घटता भेद, प्रेम का बाज़ारीकरण, धोखाधड़ी, अमानवीय कार्य-व्यापार के साथ ही कई अन्य मामलों में नैतिकता के पतन का विकास अचंभित करता है। देह व्यापार चलाने वालों के चंगुल में फँस जाने वाले युवक-युवती की मनोदशा करुणा उत्पन्न करती है। स्वेच्छया डोनर बने पुरुष की बात न करें, तो आर्थिक तंगी से उबरने के लिए इसे पेशे की तरह अपनाने वाले पुरुष डोनर तक बात नहीं रुकी, अब स्त्री डोनर भी हैं जो प्रकृति प्रदत्त व्यवस्था से छेड़छाड़ करने की दिशा में पग बढ़ा रही हैं। ग़रीबी ने और ग़रीबी से जल्द उबर जाने की चाह ने न जाने ऐसे कितने दरवाज़े खोल दिए जो अँधेरी खाई में गिराते हैं। कई अनैतिक व्यापार नेटवर्किंग या चेन बनाकर फल-फूल रहे हैं(जब तक पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ते)। महानगरों में भीख का धंधा भी दशकों से ज़ोरों से फल-फूल रहा है। सरग़ना के सरदार से भयभीत वे डरे-सहमे बच्चे, फेंके गए जूठन के लिए लड़ते बच्चे और उनका बचपन! इन बातों की चिंता कहीं शामिल हो न हो, वे किसी के एजेंडा में हों, न हों मगर संवेदनशील हृदय अपने समय के समाज से आँखें मूँद नहीं सकता और न ही भविष्य की आहट को अनसुना कर सकता है।

इसी प्रकार, युद्ध झेलते देश, उजड़ते परिवार और त्रासदी घटित होते देखते, मौत से बच गए, लुटे-पिटे-से बदहाल, भयभीत बच्चों के वर्तमान और भविष्य की तस्वीर कितनी गड्डमड्ड है, इस पर और अधिक गहराई से सोचना शेष है। मूल निवासी चाहे भारत के हों या अन्य देशों के, उनकी पीड़ा कमोबेश एक-सी है। किसानों की मूल समस्या के प्रति निरंतर उपेक्षा के कारण आत्महत्या के बढ़ते आँकड़े, नौकरी का झाँसा देकर निरक्षर ग़रीब आदिवासी बच्चों, किशोरों एवं युवतियों की बढ़ती तस्करी, शहरी बढ़ते बच्चों में पाठ्यक्रम और हर क्षेत्र में अव्वल रहने का दबाव, वृद्धों का अकेलापन, करियर के लिए जूझते युवाओं का त्रासद संघर्ष (और अवसाद में आत्महत्या या असमय मृत्यु), छोटे कारोबारियों का क़ारोबार ठप्प होने की स्थिति में बढ़ोत्तरी के साथ ही आत्महत्या में बढ़ोत्तरी तथा कामकाजियों की अपनी मशीनी स्थिति के कारण मानसिक संतुलन खोने जैसी अन्य कई घटनाएँ—यह कहना उचित होगा, दर्द जिस भी प्रांत का हो, उसका रंग-रूप जो भी हो, उसकी टीस एक जैसी होती है। संवेदना से पूरित हृदय और करुणा से भीगी पलकों पर लिखी कहानी भी एक-सी होती है। जीवन के विविध आयाम अलग-अलग वर्गों और क्षेत्रों में अलग-अलग कलेवर में होते हैं। समय का चक्र अपना काम करता है। जंगल कटने की पीड़ा कंक्रीट में उगे मन कहाँ समझ पाते हैं, उसी प्रकार विस्थापन की पीड़ा भी। कंक्रीट का जंगल खड़ा कर, शुद्ध हवा की खोज में पहाड़ जाने और उसकी साँस में भी शहरी जंगल की हवा भरकर आने की रीत ने बड़ा घात लगाया है। पहाड़ का नैसर्गिक सुर खोता जा रहा है, मैदानी संस्कृति पहाड़ पर फैलती जा रही है, पहाड़ का कष्ट दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। अब तक भौतिक संसाधनों का कष्ट था, मगर शांति थी, सहजता थी, प्रेम था, समभाव था, अब अपने ही इलाक़े में अपनी ही पुश्तैनी ज़मीन पर फैलती नागरी सभ्यता-संस्कृति में छिपी अपसंस्कृति के वे शिकार होने लगे हैं। मॉल संस्कृति कुकुरमुत्ते की तरह बढ़त पा रही है। छोटे शहर हों या महानगर, घर के भीतर कई घर जन्म ले रहे हैं। हर कमरे के भीतर एक अलग घर बसा है, दूसरे कमरे से एकदम अछूता। कॉरपोरेट संस्कृति ने जिस प्रकार सामाजिकता के कोमल तन्तुओं को घायल किया है, उसका प्रभाव परिवार पर भी पड़ा है। बदलाव की एक तस्वीर यह भी है कि बंदिशों में रखी जाने वाली स्त्रियों ने नई पीढ़ी के लिए उन्मुक्ति को स्वीकारा, वहीं कुछ प्रौढ़/ बुजुर्ग ने युवा पीढ़ी की उड़ान को आशीष दिया।

यह चिंताजनक है कि नक़ली चकाचौंध ने बहुतेरे किशोरों-युवाओं को अपने जाल में फाँसा है। एक ओर सरकारी योजनाओं का ग़लत लाभ लेने की ताक लगाए लोग हैं तो दूसरी ओर सही व्यक्ति तक सहायता पहुँच नहीं पा रही है। देश की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा सपने की टूटन के साथ ही पेट की भूख और ज़िम्मेदारी से झुकते कंधे के एहसास के साथ ही सही दिशा ढूँढ़ न पाने की स्थिति में अंधी गली में प्रवेश करता जा रहा है। सेना के जवानों के जीवन के प्रति उदासीनता भी शोचनीय है। न्याय व्यवस्था एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में चरमराहट लोकतांत्रिक समाज को भीतर से कमज़ोर करते हैं। कितने ही सरोकार व्यक्ति के निजी, पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन से लेकर जीवन को प्रभावित करनेवाले अन्य तंत्रों से जुड़े हैं, सबका उल्लेख कर पाना कठिन है।

हिंदी साहित्य ने अलग-अलग विधाओं में वृहत्त समाज को अपने भीतर समेटा और हाशिए पर भी जगह न पा सके जाने वाले सरोकारों को भी उभारा-उजागर किया है। किन्नरों से सम्बद्ध हमारी मान्यताओं एवं दृष्टि में बदलाव तो आया है, किंतु कोर कसर बाक़ी है। इसी प्रकार घरेलू यौन शोषण की घटनाएँ या मर्यादा के नाम पर पारिवारिक एवं सामाजिक बंदिशों में घुटती युवा विधवा की मनःस्थिति संवेदनशील हृदय ही समझ सकता है। माँ के साथ बाल श्रम करने को विवश भूखे बच्चे के सामने व्यंजन हो और उसकी भूख तेज़ न हो, यह भरे पेट वाले कहाँ समझ पाते हैं! परिचितों द्वारा यौन शोषण के प्रयास को निष्फल करने के साथ ही उसे सबक़ सिखाने की चतुराई किशोरियों के साहस को बल देती है। ऐसे कितने ही सरोकार क़लम से उतरे और संवेदनशील एवं सामाजिक बेहतरी को सजग शुभेच्छु मन तक पहुँच गए। क़लम ने समय के बदलाव को बार-बार दर्ज़ किया है—समाज के बदलते चेहरे को भी।

इक्कीसवीं सदी की कहानियों के माध्यम से ऐसे ही सरोकारों का एक बड़ा गुच्छा प्राप्त हुआ है। सौ कहानियों का गुलदस्ता आपके लिए लाते हुए आश्वस्त हूँ। ये कहानियाँ बानगी के तौर पर इस तथ्य की ओर संकेत करती हैं कि हिंदी साहित्य संसार चेतना के स्तर पर कितना सजग और मानवता के कल्याण का पक्षधर है। यह संतोषप्रद है। इससे यह सिद्ध होता है कि किसी भी देश के कर्णधारों की पारस्परिक संबंधों को लेकर जो भी रणनीति रही हो, जनता की मानवीय संवेदना अभी जीवंत है, गतिशील है। यह गतिशीलता एक छोर से दूसरे छोर तक बनी हुई है। इस बिंदु पर पूरब-पश्चिम का भेद मिट जाता है और करुणा की धारा सतत प्रवाहित हो रही है। यही धारा हमें एक बनाए रखेगी। इसी उम्मीद के साथ क़लम को विराम देती हूँ।

डॉ. आरती स्मित
सम्पादक
इक्कीसवीं सदी की कहानियाँ विशेषांक

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