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आख़िर! ‘यह कौन सी जगह है’


समीक्ष्य पुस्तक: यह कौन सी जगह है (काव्य संग्रह)
लेखक: राजेन्द्र राजन
प्रकाशक: सेतु प्रकाशन, नोएडा, उत्तर प्रदेश। 
मूल्य: ₹249.00

मनुष्य स्वभावतः एक विचारशील, भावनात्मक और सामाजिक प्राणी है, जिसके भीतर अनेक तरह के विचार, अनुभव और भावनाएँ उत्पन्न होती हैं। इन भावनाओं को व्यक्त करने का सबसे प्रभावी और सुंदर माध्यम कविता है। कविता मनुष्य के हृदय की आवाज़ बनकर उसके सुख-दुख, प्रेम, दया, क्रोध और सपनों को शब्दों में ढालती है। मनुष्य और कविता का रिश्ता उसकी आत्मा और अभिव्यक्ति से जुड़ा होता है। जब व्यक्ति अपने अनुभवों को साधारण शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाता, तब कविता उसके लिए एक सशक्त साधन बन जाती है। इसके माध्यम से वह अपनी भावनाएँ व्यक्त करने के साथ-साथ दूसरों के मन को भी स्पर्श करता है। यही कारण है कि कविता मनुष्य को अधिक संवेदनशील और सहृदय बनाने में एक सहयोगी की भूमिका निभाती है। इसके साथ ही, कविता समाज को जागरूक करने और उसमें सुधार लाने का माध्यम भी बनती है। एक सृजनशील मनुष्य कविता की रचना करता है और कविता समाज को दिशा प्रदान करती है, जो मानव जीवन को अधिक सुंदर, संवेदनशील और सार्थक बनाते हैं।

कविता में समाज का स्वरूप प्रतिबिंबित होता है। इस दृष्टि से राजेंद्र राजन का सद्यःप्रकाशित कविता संग्रह ‘यह कौन सी जगह है’ अपने समय के ऐसे सच को उजागर करता है जिसे छिपाने के लिए सत्ताधीशों द्वारा लोकतंत्र के चतुर्थ स्तम्भ को भी अपनी कठपुतली बनाकर इस्तेमाल कर लिया जाता है। सरकार की कार्यप्रणाली और उसकी नीतियों की पड़ताल करती हुई कविता अपने समय की सत्ता और उसकी ख़ामियों को आईना दिखाती है। ‘यह अन्तहीन कारवाँ’ कविता का यह अंश उल्लेखनीय है:

“अनगिनत लोग/भूखे प्यासे/गट्ठरें और थैले लिये/महानगरों से निकलकर चल पड़े हैं/अपने-अपने गाँव की ओर /हजार-हजार किलोमीटर पैदल/सिरों पर गठरियाँ लिये/बच्चों को गोद में टिकाये/तपती सड़क। नंगे पाँव /कई दिनों से लगातार चली जा रही हैं/भूखी प्यासी भारत माताएँ/ये मेहनतकशों के पैर हैं/ये सारी धरती नाप सकते हैं।”

कोविड-19 जैसी महामारी ने दुनिया-भर के विकास को तो आईना दिखाया ही, तत्कालीन सरकारों के दावों और प्रशासनिक खोखलेपन को भी उजागर कर दिया। जब हज़ारों किलोमीटर की यात्रा पैदल करने को लोग मजबूर हुए ऐसे में उनकी मदद करने के बजाय उन पर लाठियाँ बरसायी जा रही थीं। एक बच्ची भात-भात कहते हुए इस दुनिया से भूखी विदा हो जाती है। ऐसे भयावह समय में उन लाचार-पीड़ित जनता को ‘आत्मनिर्भर’ होने के लिए कहा जाए तो क्या यह क्रूर मज़ाक़ नहीं है? कवि ऐसे संवेदनहीन समय में उस पीड़ा को वाणी देता है जिसे सुनने को कोई तैयार नहीं! ‘आत्मनिर्भरता’ कविता का एक अंश देखिए:

“उसने कहा मेरे पीछे आओ/मैं उसके पीछे-पीछे चलता रहा। उसने कहा मेरी इस बात पर ताली बजाओ/मैंने ताली बजायी . . . /मैंने वैसा ही किया/आँख खुली तो/मैं गड्ढे में गिरा पड़ा था . . . /मैं चीख़ रहा था मुझे निकालो यहाँ से/उसकी आवाज़ आयी मैं कुछ नहीं कर सकता। ख़ुद से निकल आओ /आत्मनिर्भर बनो।”

आज़ादी के आन्दोलन के समय गाँधी जी ने देशवासियों से स्वावलंबन का आह्वान इसलिए किया था ताकि ग्रामीण भारत को आर्थिक आज़ादी मिल सके, स्वदेशी को महत्त्व मिले और श्रम को सम्मान मिल सके किन्तु यह स्वयं की ज़िम्मेदारियों से मुक्त होने के लिए नहीं था। लोग जिस सरकार को चुनते हैं उससे यह अपेक्षा करते हैं कि वह जनता के लिए मूलभूत आवश्यकताओं की आपूर्ति की उचित व्यवस्था करेगी। समाज में शिक्षा, स्वास्थ्य व क़ानून व्यवस्था सुचारु रूप से संचालित होगी किन्तु उसकी ज़िम्मेदारी लेने के बजाय सरकार जनता को उसके हाल पर छोड़कर उसे आत्मनिर्भर होने के लिए कहे, तब यह ज़िम्मेदारी से पलायन नहीं है तो क्या है? ऐसे ही तमाम सवालों के साथ कवि जन प्रतिनिधियों को जनता की अदालत में खड़ा कर उन्हें तलब करता है।

कवि एक ऐसे माहौल का चित्रण करता है जहाँ वातावरण भय और आतंक से भरा हुआ है। धर्म के नाम पर आयोजित सभा में लोग प्रेम और सद्भाव की जगह नफ़रत, हिंसा और हत्या के लिए उकसाने वाली बातें कर रहे हैं। वक्ता लोगों को भड़काते हैं और श्रोता भी उस पर ख़ुश होकर समर्थन देते हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि समाज अपनी मूल मानवीय और नैतिक मूल्यों से भटककर घृणा और हिंसा की ओर बढ़ रहा है। कवि इस बदलाव को अत्यंत पीड़ादायक और भयावह मानता है। कवि समाज में व्याप्त जंगल राज के प्रति आक्रोश को व्यक्त करने के लिए व्यंग्य का सहारा लेता है। खुलेआम होने वाले अन्याय को वह ‘न्याय’ का नाम देकर इस विद्रूपता को व्यक्त करता है:

“भेड़िये को जान से मारने के इरादे से/हमला करने का आरोप है/मेमने के ख़िलाफ़। मेमने को/कर लिया गया गिरफ़्तार/इस गिरफ़्तारी पर/तमाम मेमने ख़ून मिमियाये /फिर उन्हें चुप करने की ख़ातिर। एक समिति बनायी गयी।”

कवि प्रतीकात्मक रूप में दिखाता है कि भेड़िये (शक्तिशाली) की शिकायत पर मेमने (निर्बल) के ख़िलाफ़ झूठा मामला दर्ज कर लिया जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि मेमने पर ही अत्याचार हुआ है, फिर भी जाँच रिपोर्ट भेड़िये को निर्दोष और उसके कृत्य को ‘आत्मरक्षा’ बताती है। मेमनों के विरोध को भी औपचारिकता में दबा दिया जाता है और अंत में उल्टा मेमने को ही कठोर सज़ा देने की माँग की जाती है। पूरी स्थिति में मेमना भयभीत है, जबकि भेड़िया निश्चिंत और प्रसन्न है। यह कविता अन्यायपूर्ण व्यवस्था, पक्षपातपूर्ण न्याय प्रणाली और समाज में ताक़तवर द्वारा कमज़ोर के शोषण की तीखी आलोचना करती है।

शक्ति का उपयोग दमन के लिए नहीं बल्कि संरक्षण और सहयोग के लिए होना चाहिए। कविता में दिखाया गया है कि जहाँ पहले लोगों की बस्ती थी, वहाँ अब केवल मलबा, धुआँ और लोगों की पीड़ा बची है। बुलडोज़र यहाँ तानाशाही सत्ता का प्रतीक है, जो बिना संवेदना के लोगों के घरों और सपनों को पल भर में नष्ट कर देता है। उसे न लोगों का दुःख दिखाई देता है और न उनकी आवाज़ सुनाई देती है—वह केवल आदेश का पालन करने वाला एक निर्मम औज़ार बन गया है। साथ ही, अधिकारी भी सही-ग़लत समझने के बावजूद आदेशों का पालन करने को विवश हैं। इन्हीं के संरक्षण व नक़्श ए क़दम पर चलते हुए एक भीड़ समाज के उन नायकों, जिन्होंने सामाजिक न्याय के लिए जीवन भर संघर्ष किया; को अपमानित करने व उनके इतिहास को धूमिल करने के उद्देश्य से उनकी प्रतिमाओं को नष्ट करने का प्रयास करते हैं। ‘भग्न प्रतिमा’ कविता का यह अंश दृष्टव्य है:

“कोई आँधी-तूफ़ान नहीं आया/न भूकम्प/न बिजली गिरी। डॉ. साहब की यह प्रतिमा/किसी हादसे या दुर्घटना का शिकार नहीं हुई/इसे एक नक़ाबपोश भीड़ ने ढहाया है/ज़माने को जीतने के अन्दाज़ में।”

प्रस्तुत संग्रह में ‘फन्ने ख़ाँ’ शीर्षक से दस कविताएँ सम्मिलित हैं। यह फन्ने खाँ कौन है? इसके पास कौन सी ऐसी तरकीबें हैं जिससे यह सत्ता पर अधिकार आना लेता है? उसने सादगी को भी एक हथियार बना लिया है जनता को भ्रमित करने का और वह अपने हर एक कृत्य को ऐतिहासिक बताता है तथा अपनी पहचान को अद्वितीय। ‘फन्ने खाँ: दस’ कविता में प्रतीकात्मक रूप से आत्ममुग्ध शासक की छवि निर्माण प्रक्रिया को बख़ूबी संकेतित किया गया है–
“फन्ने ख़ाँ के सीने की तरह। फन्ने ख़ाँ का झोला भी/बन गया था फन्ने खाँ का एक प्रतीक।”

कवि फन्ने ख़ाँ शीर्षक की कविताओं के माध्यम से समाज में एक ऐसी स्थिति को दिखा रहा है जहाँ पूरी जनता एक व्यक्ति के सोचने, जानने और बोलने की शक्ति पर निर्भर हो गई है। लोग स्वयं सोचने या समझने की बजाय केवल उसी की बात मानते हैं, उसकी बातों को दोहराते हैं और उसकी प्रशंसा करते हैं। कवि आलोचना करता है कि जब समाज का सामूहिक विवेक और स्वतंत्र सोच एक ही व्यक्ति पर निर्भर हो जाए, तो वह समय चिंताजनक और स्थिति भयावह होती है। अपने क्षणिक लाभ के लिए सत्ता की चाटुकारिता करने वाले हर दौर में रहे हैं। ऐसे अवसरवादियों के लिए कवि ने व्यंग्यात्मक लहजे में एक कविता लिखी है—‘सकारात्मक’, जो सत्तालोलुप व्यक्ति और उसकी चाटुकारिता कर जूठन प्राप्त कर आनंदित होने वाले रीढ़विहीन लोगों की प्रवृत्ति पर गहरा आघात करती है:

“जब मुझे तनकर खड़ा होना चाहिए/मैं घुटनों के बल झुक जाता हूँ/जब बग़ावत का झण्डा उठा लेना चाहिए/मैं आततागियों के गुन गाता हूँ/मेरे सकारात्मक होने में/कोई कसर रह गयी हो तो बताइए।”

जो पीड़ाएँ थाने में नहीं लिखी जाती वे कविताओं में दर्ज होती हैं। कवि ने कितनी ही पीड़ाओं को वाणी प्रदान की है जिसे अलग-अलग नाम दिए हैं, यथा-मंथन, इस बुरे वक़्त में, जंगल में मोर, यह अन्तहीन कारवाँ, न्याय, कोतवाल के कुत्ते, देव-छवि, छींक पर एक बहस, हौसला अफ़ज़ाई, हवा के खिलाड़ी, शान्ति भंग, ग़ुस्सा पर्व, इतिहास में सेंध, बुलडोज़र, यह कैसी आहट है, ज़ख़्म, यह दौर, जागरण, पाठ, शिकार, भग्न प्रतिमा, यह कौन सी जगह है, फन्ने ख़ाँ: दस, सकारात्मक, वह जो वहाँ से चला गया, मेरा किनारा कहाँ है, हाथ, करामाती आईने, सरकार की चिट्ठी, पंक्तियाँ इत्यादि। इन्सान के बड़प्पन की वास्तविक पहचान को मापने का जो पैमाना कवि ने तय किया है वह किसी पद/ओहदे या रुसूख़ से जुड़ा हुआ नहीं है बल्कि उसकी संवेदनशीलता के आधार पर तय किया है।

“तुम्हारा असली परिचय यह नहीं है/कि तुम अपने बारे में /क्या कहते हो /बल्कि यह है/कि तुम दूसरे के साथ /क्या करते हो।”

भारतीय समाज में व्यक्ति के चरित्र और उसके कर्म को सर्वाधिक महत्त्व दिया जाता है क्योंकि उपदेश देना बहुत ही आसान होता है किन्तु उसका अनुपालन करना अत्यंत कठिन। इसी कारणवश यहाँ जिन चरित्रों को आज में पूज्य माना गया उनके उपदेश के बजाय उनके जीवन चरित लिखे गए, यथा–बुद्धचरित, महावीरचरित, श्रीराम चरित मानस आदि। ध्यातव्य है कि समाज में यदि किसी की वाणी और कर्म में समानता नहीं दिखती तो उसके लाख अच्छे वचन बोलने पर भी लोग कह उठते हैं—‘पर उपदेश कुशल बहुतेरे’।

आज राजतन्त्र नहीं है फिर भी एक लोकतंत्र में ऐसे प्रश्न करना बहुत जोखिम भरा क्यों हो गया है? कवि और लेखक समाज के सजग प्रहरी होते हैं, इसीलिए राजतंत्र में भी एक कवि जब शासक को ग़ैर-जिम्मेदार होने से रोकना चाहता है तो पूरी ज़िम्मेदारी के साथ सहज भाव से कह जाता है, “जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी/सो नृप अवसि नरक अधिकारी।” कवि ने फन्ने खां शीर्षक से दस कविताएँ लिखी हैं जिसमें एक ऐसे शासक की ओर संकेत किया गया है जो आत्ममुग्ध है। वह जो कुछ भी करता है उसे ऐतिहासिक बताता है और ऐतिहासिक साबित करने के लिए पूरे तंत्र को काम पर लगा देता है। साथ ही, कवि ने इतिहास के उन काले पृष्ठों को दिखाते हुए पाठकों की संवेदनाओं को विस्तार दिया है जिसमें एक क्रूर शासक अपनी ज़िम्मेदारियों की अनदेखी कर जनता की परेशानियों में भी स्वयं को आनंदमय स्थिति में रखता है। कवि प्रश्न करता है, “आज का नीरो। क्या कर रहा है। जब शहर जल रहा है?”

पेशे से पत्रकार होने के नाते कवि के काव्य में तथ्यात्मकता और संवेदनात्मता का अद्भुत संयोजन दिख पड़ता है। सवाल पूछने का जो दायित्व पत्रकारिता में था, वही दायित्व बिम्ब, प्रतीक व संकेतों के सहारे अधिक प्रभावशाली बन गए हैं। भाषा कहीं–कहीं सीधे सपाटबयानी करती नज़र आ रही है और यह कवि के पेशेवर अनुभव का प्रभाव है। यह महज़ संयोग है या कि सायास, इस संग्रह में 64 कविताएँ संकलित हैं। वैसे तो कलाओं की संख्या अनंत मानी गयी है फिर भी उनमें 64 ही मुख्य हैं। इस दृष्टि से ये कविताएँ उन सभी ज़रूरी मुद्दों की ओर संकेत करती है जो एक समाज को स्वस्थ व बेहतर बनाने के लिए अपेक्षित हैं। पाठकीय संवेदना को गहरे तक स्पर्श कर उन्हें अपने समय और सत्ता का पुनरावलोकन करने एवं मूक दर्शक होने के बजाय सार्थक हस्तक्षेप करने के लिए प्रेरित करती हैं राजेन्द्र राजन की कविताएँ। 

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