अमानवीकरण को उकेरती कहानी
समीक्षा | रचना समीक्षा डॉ. मीनकेतन प्रधान15 Jun 2026 (अंक: 299, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
डॉ. शैलजा सक्सेना की कहानी ‘डियर जैनी . . .’ की समीक्षा
कैनेडा की चर्चित प्रवासी कहानीकार डॉ. शैलजा सक्सेना की कहानी ‘डियर जैनी . . .’ अमानवीकरण के भीषण त्रास और कारुणिक संवेदनाओं की अभिव्यक्ति है। इसमें एक पिता के रूप में डेविड नामक पात्र की मार्मिक अन्तर्व्यथा-कथा है। उसकी सौतेली पुत्री ‘जैनी’ द्वारा स्वैच्छाचारिता, थ्रिल और आज़ादी के मंसूबों से उस पर पेडोफाइल (बाल शोषक) अर्थात् दुराचारी होने का मिथ्या आरोप लगाया जाता है जिसके परिणामस्वरूप उसे 12 वर्ष की सज़ा हो जाती है। डेविड, जेल में रहते अपने बेगुनाह होने की बात को अत्यंत भावुक स्वर में सौतेली पुत्री के विचारों में परिवर्तन लाने के उद्देश्य से मर्माहत हो कर 8 बार पत्र में लिखता है, जिसमें तिथियों का भी अंकन है। सभी पत्रों में वह जैनी की सदबुद्धि के लिए प्रार्थना करता है। वह अपनी 15 वर्षीया सौतेली पुत्री जैनी को अपनी 10 वर्षीया पुत्री नैंसी की तरह मानता है। वह दोनों में कोई भेद नहीं करता। उसमें एक अनुशासन प्रिय और संतान के प्रति आदर्श पिता होने के सारे गुण विद्यमान हैं।
जेल में सज़ा भोगते डेविड केवल इतना जानना चाहता है कि उसकी सौतेली पुत्री जैनी आख़िर उससे घृणा क्यों करती है? जबकि उसकी माँ ‘सारा’ से विवाह के पूर्व छह माह तक बातचीत करते बच्चों से सहमति ली गई थी। जैनी ने भी सहमति दी थी। वह जेल से लिखे अपने पहले पत्र में कहता है, “मुझे जैसे अपनी बेटी की स्वीकृति के बिना दूसरा विवाह करना मंज़ूर नहीं था, तुम्हारी माँ को भी नहीं था।” डेविड को अपनी मातृहीन पुत्री ‘नैंसी’ की बहुत चिंता है। जिसकी उम्र कम होने के कारण सरकारी फ़ॉस्टर होम में रखा गया है। डेविड सोचता है जब वह बड़ी होगी तो अपने पिता के कलंकित होने का उसे गहरा दुःख होगा। उसका जीवन असुरक्षित हो जायेगा। डेविड को इसकी गहरी चिंता है।
डेविड की पत्नी ‘सारा’ पूरे घटना चक्र में अपनी पुत्री जैनी की बातों पर ही भरोसा करती है इसलिए उसे अपने पति की कोई चिंता नहीं है और न ही उसकी सौतेली पुत्री 10 वर्षीया नैंसी की, जो ‘फ़ॉस्टर’ माता-पिता के संरक्षण में है। डेविड सोचता है, “वह पिता के दुराचारी होने के कलंक को ले कर अपना शेष जीवन कैसे बिताएगाी? हाय मेरी नैंसी!!! उस बच्ची का मेरे बिना कोई नहीं और मैं भी इस आरोप में जेल में पड़ा हूँ। 18 के बाद तो उसे ‘फ़ॉस्टर होम’ भी नहीं मिलेगा, वह सड़कों पर होगी। ओह! वह कैसे जियेगी।” यह कारुणिक स्थिति पाठक को द्रवीभूत कर देती है।
25 अक्टूवर 2020 से 19 सितंबर 2023 के मध्य तिथि अंकन सहित 8 बार जैनी के जन्मदिन, क्रिसमस, नये वर्ष के अवसर पर डेविड द्वारा लिखे गये इन पत्रों के विवरण के बाद पता चलता है कि कहानी का कथा तत्त्व एक अलमारी की दराज़ में प्राप्त पत्रों पर आधारित है। लेखिका शैलजा सक्सेना की लेखकीय उपस्थिति इस कहानी के अतिंम हिस्से में अल्पकालिक है किन्तु इसी से कहानी के उद्देश्य और उसकी कालजयिता सिद्ध होती है।
पत्र जिस घर में मिलते हैं उसे डेविड की पत्नी ‘सारा’ ने लेखिका के पास बेच दिया है। वे यह शहर छोड़कर एटलांटा रहने जा रहे हैं (हमेशा के लिए)। इस घर की चाभी मिलने के बाद अपने दोनों बच्चों के साथ लेखिका नये शहर के अपने पहले घरौंदे में जाती हैं। जहाँ बच्चों की ख़ुशी और खेल से घर खिलखिला रहा था। लेकिन वहीं इसी घर में वे पत्र मिले जहाँ एक परिवार की सिसकियाँ दूर तक सुनाई पड़ रही थीं।
अपने पहले घर में सामान जमाने के बीच एक अलमारी की दराज़ में वे पत्र जब मिलते हैं तो पढ़कर लेखिका हकबका (हक्का बक्का) जाती हैं। वे लिखती हैं—“मैं इन पत्रों को हाथ में लिए बैठी थी। मन अजीब सा होने लगा . . हर चिट्ठी फाँस सी गड़ी . . . ऐसी भी कोई लड़की होती है? डेविड नाम के अदेखे व्यक्ति की सुबकियाँ मुझे इस घर के हर कोने में सुनाई देने लगी।” वह सोचती हैं—पत्र खुले थे जिन्हें उनके द्वारा (सारा) पढ़ा गया होगा। जैनी को उसने पढ़ने के लिए दिया होगा या नहीं, नहीं कहा जा सकता और यदि वह पढ़ी भी होगी तो उस पर इसका क्या प्रभाव पड़ा होगा, यह अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता। हो सकता है उसने इन पत्रों को कोई तवज्जोह न दिया हो या डेविड के विश्वास के अनुकूल उसमें ‘सद्बुद्धि’ न आयी हो। इतना अवश्य कि जैनी को कोई पछतावा नहीं हुआ। डेविड के जेल जाने के दो वर्ष बाद अब वह सत्रह साल की होने जा रही है। उसे पता है कि डेविड बेगुनाह है फिर भी स्वतंत्र रूप से मौज मस्ती करने, अपने से बड़े लड़कों के साथ पार्टी करने, आदि में वह डेविड को रोड़ा मानती रही है। इसी कारण उसे जज के सामने अपने दोस्तों की मदद से दुराचारी साबित करने में कोई हिचक नहीं हुई थी। जैनी के किशोर मन में रंगीन सपने आने लगे किन्तु डेविड की उम्मीद के मुताबिक़ उसकी सोच में कोई बदलाव नहीं आया। कथानक के अंतिम हिस्से से यह ज्ञात होता है। अन्यथा घर बेचकर दूसरी जगह जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। यह भी कि इस घर और शहर में उनका रहना दुश्वार हो गया होगा। इससे यह भी संकेत मिलता है कि डेविड की 12 वर्षों की सज़ा में अभी केवल दो वर्ष ही हुए हैं और जेल में वह बीमार रहने लगा है। सज़ा की अवधि के पहले या बाद में जिसकी घर वापसी की कोई निश्चितता नहीं। उसने अपने छठे पत्र दिनांक 24 दिसंबर 2022 को लिखा है, “जैनी, ज़रा अपने झूठ के परिणाम पर गहराई से सोचो और जल्दी सोचो। मैं बहुत भावुक इंसान हूँ, कहीं ऐसा न हो जब तक तुम्हें अपनी ग़लती स्वीकार करने की बुद्धि आए, तब तक इस दुख में मैं मर ही चुका हूँ (होऊँगा)। ईश्वर तुम्हें शीघ्र ही सद्बुद्धि दे। डेविड।” यह भी कि घर अब डेविड के स्वामित्व में न हो। तभी तो सारा उसे बेच डालती है अथवा यह भी हो सकता है, चूँकि डेविड उससे बहुत प्रेम करता है, ऐसी स्थिति में विवाह के साथ ‘सारा’ ने शर्तिया तौर पर इस अचल सम्पत्ति को वैधानिक रूप से अपने नाम करवा ली होगी। यद्यपि कहानी में यह वर्णित नहीं है। यह लेखिका की शैली का कमाल है कि कहानी अपने अकथ में बहुत कुछ कह जाती है। डेविड, सारा से बहुत प्रेम करता है किन्तु सारा, डेविड से उतना ही प्रेम करती है, यह कहानी में कहीं भी नहीं झलकता। कहीं ऐसा तो नहीं, यह षड्यंत्र विवाह के पूर्व से ही सारा और उसकी बेटी की योजना रही हो। हालाँकि सारा के चरित्र से ऐसा कहीं भी स्पष्ट नहीं होता। सारा की बेटी जैनी के साथ ही उसका एक छोटा बेटा नील भी है। सम्भव है उसकी सुरक्षा और भविष्य की चिंता रही हो सारा में। वे तीनों, डेविड और उसकी 10 वर्षीया बेटी नैंसी के साथ मिलजुलकर रहते थे। अपने प्रथम पत्र (25अक्टूवर 2020) में एक जगह वह लिखता भी है—“ओह जैनी, तुमने यह क्या किया!!! नैंसी के बारे में सोचते ही मेरा कलेजा फटने लगता है। कम से कम तुम्हारी माँ तो तुम्हारे साथ हैं पर मेरी नैंसी तो अब सरकारी फ़ॉस्टर होम में भटक रही होगी। क्या तुम्हें नैंसी से बिलकुल लगाव नहीं हो पाया था? दो वर्ष से तुम और तुम्हारा भाई, मेरे और नैंसी के साथ रह रहे थे . . क्या तुममें उस छोटी, बिन माँ की बच्ची के लिए कोई ममता नहीं जागी?” ऐसे बहुत सारे संभावित सवालों को यह कहानी अपनी ख़ामोशी में दबाये रखती है, मुखर है तो डेविड का त्रास और करुणा से कौंधता हृदय।
उक्त एकाकी संवाद में सारा के मनोभावों को लेखिका ने बड़ी बारीक़ी से उकेरा है जो बरबस पाठक का ध्यान खींचता है, “वह इन पत्रों के शब्दों से उठती ग्लानि की मार को भूल जाना चाहती थी?” लेखिका के इस वाक्य में प्रश्नवाचक चिह्न लगा है। अर्थात् यह आवश्यक नहीं कि सारा को उक्त घटना के लिए कोई ग्लानि हुई ही हो। डेविड के कथित दुराचार को बेटी के कहने पर वह सही मानती है तभी तो जैनी द्वारा कोर्ट में झूठा बयान देने के लिए मना नहीं करती या कोई प्रतिवाद नहीं करती। डेविड इसका ज़िक्र अपने पत्र में करता है, “सारा ने जब तुम्हारी बात पर विश्वास किया तो वह अपनी बेटी की चिंता करने वाली माँ थी, मैं उसे दोष नहीं देता। मेरी नैंसी अगर किसी पर इसी तरह रो-रो कर आरोप लगाती तो मुझे भी बहुत चिंता होती, मैं भी उस पर विश्वास करने के लिए बाध्य होता। फिर तुमने तो अपने दोस्तों की मदद से मेरे दुराचार की गवाही भी बना ली थी! इस फ़रेब से उन्हें क्या मिला? शायद पॉवर! शायद कुछ भी कर सकने की आज़ादी! या बस एक थ्रिल भरी मस्ती . . .! या यह सब तुम सब के लिए एक खेल था?” इस कथन के आख़िरी वाक्य में कहानी का अव्यक्त भाव और ग्लोबलाइज़ेशन के वर्तमान युग में मनुष्य की आत्मकेन्द्रित स्वार्थपरकता निहित है।
पत्र शैली की इस कहानी के अंतिम हिस्से में कहानीकार के दिलोदिमाग़ में एक साथ कई सवाल खड़े हो जाते हैं—पिता के रूप में तिल-तिल टूटता हुआ एक आदमी का क्या हुआ होगा? नैंसी को उसका पिता मिलेगा या नहीं? सारा को उसकी सच्चाई का ज्ञान हुआ या नहीं? आदि। लेखिका को नहीं मालूम इस सम्बन्ध में आगे क्या हुआ होगा? इतना ज़रूर कि, “जानती हूँ तो बस यह कि एक पिता इन चिट्ठियों के हर शब्द में तड़प रहा था। मैं हकबकाई सी बैठी उसके दर्द को देख रही थी . . .” कहानी का यह अंतिम वाक्य लेखिका द्वारा कहानी लिखने की उत्प्रेरणा है, और पाठक मन को बेतरह झकझोर देने वाला झंझावात।
आलोच्य कहानी ‘डियर जैनी’ में जो सवाल लेखिका के दिलोदिमाग़ में अनुत्तरित रह जाते हैं वे पाठक तक पहुँचते-पहुँचते उस सामाजिक, अनमेल विचारों का दोबारा बसा परिवार, युवा मन की उच्छृंखलता से उपजी विकृतियाँ, यौन कुंठा, अनुशासन पसंद पिता का भाव, कोरोनाकालीन प्रतिबंधों का मनोविकार, मानवीय मूल्यों का क्षरण, नैतिक चरित्र का पतन, न्याय व्यवस्था की अदूरदर्शिता, अपने-पराये की स्वार्थपरकता, भ्रातिपूर्ण धारणाएँ, चारित्रिक विघटन, जेल की पीड़ा, मानसिक संघात, भौतिकतावादी दृष्टिकोण इत्यादि के टूटते-चरमराते परिदृश्य तक ले जाते हैं जहाँ मनुष्य का अस्तित्व नकारा हो गया है।
कहानी तत्त्वों की दृष्टि से आज की कहानियों के मानदंडों में यह कहानी बेशक खरी उतरती है। काल्पनिकता के तत्त्व यथार्थ परक भावबोध से आच्छादित हैं। कथा विन्यास और शिल्प में नवीनता है। विदेश की पृष्ठभूमि पर सृजित पात्र और चरित्र सार्वदेशिक बन पड़े हैं (पात्रों के नाम, एटलांटा, शहर विदेश के हैं)। कहानी पढ़ते हुए लगता है कि हम अपने आसपास सारे घटना चक्र को घूमते हुए देख रहे हैं, जैसा कि कहानीकार डॉ. शैलजा सक्सेना एक अजाने और अभागे पिता डेविड के दर्द को देख रही थीं। किसी के दर्द को देखने की व्यंजना बहुत मारक होती है। सामान्यतया दर्द को महसूस किया जाता है, ‘देखने’ शब्द का प्रयोग कर लेखिका ने अपनी गहरी संवेदनशीलता का परिचय दिया है। कहानी के प्रत्येक शब्द को जैसे उसने छू-छू कर उनकी धड़कनों को महसूस किया है। जैसे डेविड के पत्रों में एक शब्द ‘ओह’ हर बार आता है। यह डेविड के कारुणिक त्रास की कथा संवेदना है। इस शब्द से कहानी का अव्यक्त कथ्य सीधे पाठक के दिमाग़ में गूँजने लगता है। डेविड के पत्र में अक्सर यह शब्द आता है। क्या यह शब्द केवल डेविड का है? नहीं, केवल डेविड का नहीं, यह तो कहानीकार की उस चेतना की कसक है जो ‘डेविड’ नामक अजाने पात्र की अन्तर्वेदना में ध्वनित होती है। आधुनिक युगीन मूल्य हीनता और अमानवीकरण को यह कहानी बख़ूबी कहती है। कथा विन्यास में प्रवाह है। भाषा-शिल्प से पाठक बँधा रहता है।
हिन्दी कहानी हो या प्रवासी कथा साहित्य, यह कहानी ‘डियर जैनी . . .’ देशान्तर की मानवीय संवेदना से साक्षात्कार कराती है। कहानी शीर्षक ‘जैनी’ शब्द के बाद डैश-डैश-डैश से यह संकेत मिलता है कि कहानी में ऐसे बहुत सारे तथ्य मौजूद हैं जो कथा-शिल्प से बाहर भी देश काल और परिवेश में असर दिखाते हैं। इस कहानी को पढ़ते हुए हिन्दी के प्रमुख कहानीकार कमलेश्वर की यह बात ठीक लगती है कि—अच्छी कहानी वह होती है जिसमें जीवन को प्रामाणिकता के साथ जिया जाता है। ख़ैर . . .।
‘डियर जैनी . . .’ कहानी की अन्तर्वस्तु से ऐसे कई कोण उभरते हैं जो समकालीन हिन्दी कहानी के आगे का द्वार खोलते हैं। लिहाज़ा प्रवासी कहानी और भारत में लिखी जा रही हिन्दी कहानी की संवेदना के धरातल को यह कहनी ‘डियर जैनी . . .’ एकाकार करती है। यह शैलजा सक्सेना की बड़ी कामयाबी है। उनकी चर्चित कहानी ‘लेबनान की एक रात’ (भारत के विश्वविद्यालयीन पाठ्यक्रमों में समादृत) तथा कविता के क्षेत्र में जहाँ स्त्री विमर्श के तत्त्व अधिक सशक्त हैं वहीं विवेच्य कहानी ‘डियर जैनी . . . ’ में एक अजाने पुरुष की गहरी संवेदना छलक रही है। यह लेखिका के बहुआयामी व्यक्तित्व का परिचायक है। उषा प्रियंवदा के पुरुष पात्र गजाधर बाबू (वापसी कहानी) हो या प्रवासी साहित्यकार तेजेंद्र शर्मा के कहानी संग्रह ‘संदिग्ध’ की शीर्षक कहानी का कथा नायक शाहिद हो (यद्यपि कथानक में भिन्नता है) को संदर्भित इसलिए किया जा सकता है कि इनमें पुरुष पात्रों की त्रासदी मुखर है। हिन्दी और प्रवासी कथा साहित्य में अन्य कई कहानियाँ इस बोध से रचित हैं जिनमें अपने शिल्प और कथ्य दोनों दृष्टि से शैलजा सक्सेना की कहानी ‘डियर जैनी’ का विशिष्ट स्थान है।
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
एक कलाकार की मौत - डॉ. रानू मुखर्जी
रचना समीक्षा | डॉ. शोभा श्रीवास्तवकहानी: एक कलाकार की मौत कहानीकार: डॉ. रानू…
एक चींटे का फ़्लर्ट - अनीता श्रीवास्तव
रचना समीक्षा | डॉ. शोभा श्रीवास्तवकहानी: एक चींटे का फ़्लर्ट कहानीकार: अनीता…
कविता में भाषा और शब्द के संदर्भ : ’हमारी हिंदी’ - रघुवीर सहाय
रचना समीक्षा | विजय नगरकर’हमारी हिन्दी’ रघुवीर सहाय (1957)…
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
रचना समीक्षा
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं