ऑस्ट्रेलिया की प्रमुख हिंदी लेखिका रेखा राजवंशी के साथ पूर्णिमा पाटिल की बातचीत
साक्षात्कार | बात-चीत पूर्णिमा पाटिल1 Oct 2023 (अंक: 238, प्रथम, 2023 में प्रकाशित)
आइये, इस वर्ष हिंदी दिवस पर बात करें ऑस्ट्रेलिया की प्रतिष्ठित लेखिका रेखा राजवंशी से। हिंदी साहित्य के प्रति जिनका लगाव सिर्फ़ स्वांतः सुखाय ही नहीं है, अपितु ऑस्ट्रेलिया के नए पुराने हिंदी के लेखकों को प्रोत्साहित कर विभिन्न विषयों पर लिखवाना और उनकी पुस्तकें प्रकाशित करने का महत्त्वपूर्ण कार्य वे करती रहीं हैं। नई पीढ़ी को लेखन के लिए मंच प्रदान करना, सराहनीय क़दम है। वास्तव में आज वे बड़ी शिद्दत से एक सच्चे लेखक का धर्म निभा रहीं हैं। उनकी कर्मठता देख कर आश्चर्य और कौतुक होता है कि अपनी अध्यापिका की व्यस्त दिनचर्या के साथ, घर परिवार की ज़िम्मेदारी सफलतापूर्वक निभाते हुए, वे ऑस्ट्रेलिया में हिंदी की एक अग्रणी लेखिका भी हैं।
रेखा राजवंशी शिक्षाविद्, लेखक, कवयित्री के रूप में हिंदी की ज्योति को ऑस्ट्रेलिया में निरंतर प्रकाशमान रखने का अभिनन्दनीय कार्य कर रही हैं। वह प्रवासी भारतीय लेखिका के रूप में हिंदी भाषा-साहित्य-संस्कृति की सेवा में रत हैं। रेखा जी की सक्रियता देखकर सहज विश्वास करना मुश्किल है कि उन्हें 2006 में ब्रेस्ट कैंसर हुआ था। इस जानलेवा बीमारी से रेखा जी ने साहस के साथ संघर्ष किया और जंग जीत कर वर्षों से साहित्य सृजन और हिंदी सेवा को समर्पित रचनात्मक उद्देश्यपूर्ण जीवन की राह पर वे चल रहीं हैं।
मृदुभाषी विदुषी रेखा राजवंशी जी से साक्षात्कार लेना रोचक रहा! साक्षात्कार से प्राप्त सभी जानकारियों को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है।
रेखा जी, आप एक प्रतिष्ठित हिंदी लेखिका और कवयित्री हैं। ऑस्ट्रेलिया में हिंदी के साहित्यिक प्रचार प्रसार में आपके योगदान के बारे में जानकारी दें।
ऑस्ट्रेलिया के अधिकांश लेखकों और कवियों को एक सूत्र में बाँधने का प्रयास मैंने किया है। अपनी संस्था इंडियन लिटरेरी एंड आर्ट सोसाइटी ऑफ़ ऑस्ट्रेलिया (ऑस्ट्रेलिया की भारतीय साहित्य और कला संस्था, इलासा) के माध्यम से अनेक कवि सम्मेलन, कविता प्रतियोगिता, कहानी और नाटक प्रतियोगिता का आयोजन करती रहती हूँ। न्यू साउथ वेल्स की संसद में युवा काव्य प्रतियोगिता और सिडनी विश्वविद्यालय में हिंदी संगोष्ठी भी आयोजित की है। मैंने, हिंदी शिक्षण और साहित्य में अपना योगदान देते हुए, निरंतर हिंदी के प्रसार में परिश्रम से कार्य किया है।
हिंदी में रुचि रखने के कारण मैं ऑस्ट्रेलिया के शनिवार हिंदी कक्षाओं में पढ़ाने जाती रही हूँ। एस बी एस रेडियो, ऑस्ट्रेलिया में समय समय पर योगदान भी देती रही भी रही हूँ। मैंने अनुवादक और दुभाषिया (इंटरप्रेटर) का कार्य भी किया है। ऑस्ट्रेलिया में चुनाव के दौरान लेबर पार्टी के प्रचार का हिंदी अनुवाद कार्य मुझसे करवाया गया। एडल्ट हिंदी कोर्स बनाकर उसका संचालन कार्य मैंने किया। एच एस सी हिंदी परीक्षक कार्य भी किया है। सिडनी के विभिन्न स्कूलों, संस्थाओं में हिंदी शिक्षिका भी रही हूँ। सम्प्रति मैं सिडनी विश्वविद्यालय से सम्बद्ध शिक्षा केंद्र में शिक्षिका हूँ।
आपके ताज़ा प्रकाशित सृजन कार्य के बारे में जानकारी दें।
अब तक मेरी आठ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इस वर्ष मेरी तीन पुस्तकें प्रकाशन में हैं। जिनमें एक कहानी संग्रह, एक यहाँ की आदिवासी कहानियों का अनुवाद और ग़ज़लों की एक किताब सम्मिलित हैं।
आपने ऑस्ट्रेलिया के लेखकों की किताबों का संपादन भी किया है, ये पुस्तकें कौन सी हैं?
अब तक मैंने ऑस्ट्रेलिया के विविध शहरों में रहने वाले कवि और लेखकों की तीन पुस्तकों का प्रकाशन किया है। इनमें कहानी की किताब इसी साल केंद्रीय हिंदी संसथान से प्रकाशित हुई है जिसमें बीस कहानियाँ हैं जिसमें ऑस्ट्रेलिया के विभिन्न शहरों सिडनी, मेलबर्न, कैनबरा, पर्थ, और एडिलेड के लेखकों ने योगदान दिया है। बूमरैंग एक और दो काव्य संकलन हैं। पहला किताबघर से प्रकाशित हुआ था जिसमें ग्यारह कवि थे और दूसरे में चालीस कवियों की कविताएँ संकलित हैं।
संकलन की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि सभी कवि विभिन्न पेशों से जुड़े हुए हैं और यह सृजन उन्हें अपने देश और मिट्टी से जोड़े रखता है, उनके मन को तसल्ली देता है और उनकी रचनात्मकता को बनाए रखता है।
बूमरैंग शीर्षक क्यों और इसका अर्थ क्या है?
मैंने इस काव्य संग्रह का शीर्षक बूमरैंग दिया है। ऑस्ट्रेलिया की एबोरीजनल जनजाति से जुड़ा यह शब्द है। अक़्सर कहा जाता है कि यह व्यक्ति बूमरैंग हो गया यानी पहले यहाँ था, फिर कहीं और गया और अब वापस आ गया। हम प्रवासी भारतीय भी बार बार बूमरैंग होते हैं, दिल से और शरीर से भी इसीलिए मैं चाहतीं थीं कि भारतीय साहित्यकार नाम सुनते ही समझ जाएँ कि यह पुस्तक ऑस्ट्रेलिया के साहित्यकारों की है। इसके अतिरिक्त मैंने यह भी कोशिश की है कि आवरण चित्र भी यहाँ की पारम्परिक कला पर आधारित हो। इसमें प्रवासी भारतीयों की तीन पीढ़ियों के कवि सम्मिलित हैं, जिसमें सभी ने अपने समय और परिस्थितियों के प्रति उनकी भावनाओं को क़लम द्वारा अभिव्यक्ति प्रदान की है। इस पुस्तक की कविताएँ तीन पीढ़ियों की भाषा शैली, चिंतन और सोच में अंतर को स्पष्ट करती हैं।
अपनी लेखन प्रतिभा कहाँ से प्राप्त हुई?
मुझे लेखन प्रतिभा अपने पिता से प्राप्त हुई है। मैं बचपन से ही लिखने लगी थी। पत्रिकाएँ भी घर में बहुत आतीं थीं। हिंदी अध्यापिका ने जब मेरी कविताएँ पहली बार सुनीं तो विश्वास नहीं कर पाईं। ये कविताएँ स्कूल की पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। युवावस्था में कादम्बिनी और साप्ताहिक हिंदुस्तान में रचनाएँ प्रकाशित होने लगीं।
रेखा जी, ऑस्ट्रेलिया के साहित्यकारों के साहित्यिक योगदान के बारे में आप क्या कहेंगी?
साहित्यिक योगदान संबंधी प्रश्न पर मैं कहना चाहूँगी कि ऑस्ट्रेलिया काफ़ी नया देश है। यहाँ भारतीयों का आगमन पिछले कुछ वर्षों में ही हुआ है। साहित्य के प्रति रुझान रखने वाले व्यक्तियों की संख्या भी अन्य देशों की अपेक्षा कम है। यूरोप और अमेरिका में माइग्रेशन बहुत साल पहले ही शुरू हो गया था, जबकि ऑस्ट्रेलिया के भारतीय प्रवासियों के लिए पहली समस्या होती है सेटलमेंट की। हाँ, अब पहली पीढ़ी थोड़ी व्यवस्थित हो गई है, और हिंदी साहित्य के प्रति योगदान दे रही है।
ऑस्ट्रेलिया में हिंदी लेखकों की स्थिति और अगर उनकी कोई समस्या है तो इस बारे में आप क्या बताना चाहती हैं?
ऑस्ट्रेलिया में हिंदी के प्रचार प्रसार को लेकर मेरे कुछ विनम्र सुझाव हैं। मेरा मानना है कि ऑस्ट्रेलिया के साहित्यकारों को अन्य देश के साहित्यकारों की तुलना में हिंदी जगत में अपनी पहचान स्थापित करने के लिए अधिक संघर्ष करना पड़ रहा है। वैक्यूम में रहकर कुछ भी पनपना मुश्किल होता है।
हम हिंदी सेवी तो प्रयासशील हैं ही, परन्तु सबकी यही इच्छा है कि यहाँ भी भारत सरकार हिंदी सम्मेलन का आयोजन करे। यहाँ के साहित्यकारों को आमंत्रित करे और संपर्क सूत्र बनाए रखे। साहित्यकारों को प्रोत्साहन देने हेतु उन्हें सम्मानित किया जाना चाहिए।
वर्तमान में आप कौन सा सृजन कार्य कर रहीं हैं?
मैं जिन परियोजनाओं पर शोध कार्य कर रही हूँ, उनमें सम्मिलित हैं: ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासी आदिवासी, ऑस्ट्रेलिया में भारतीय आगमन का इतिहास और विकास।
रेखा जी, आप आस्ट्रेलिया में एक लेखिका और कवयित्री के रूप में लोकप्रिय हैं। कृपया अपनी पुस्तकों की जानकारी दें।
मेरी पुस्तकों में सम्मिलित हैं:
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जीवित रहेगी स्त्री-केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा 2023
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कितनी बार होता है–नज़्में 2021 एनी बुक पब्लिकेशन
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ऑस्ट्रेलिया से रेखा राजवंशी की कहानियाँ-2021 किताबघर प्रकाशन
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मुट्ठी भर चाँदनी-ग़ज़ल संग्रह 2016 एनी बुक पब्लिकेशन
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कंगारुओं के देश में-कविता संग्रह 2011 किताबघर प्रकाशन
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ये गलियों के बच्चे-भारत के स्ट्रीट चिल्ड्रन पर आधारित 2000 भारतीय प्रकाशन संस्थान दिल्ली
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छोटे-छोटे पंख-बाल कविता संग्रह 2000 भारतीय प्रकाशन संस्थान दिल्ली
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अनुभूति के गुलमोहर-कविता संग्रह 1999 दिल्ली हिंदी अकादमी के अनुदान से प्रकाशित
प्रकाशन में:
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ऑस्ट्रेलिया की लोक कथाएँ ड्रीमटाइम कहानियाँ
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प्रवासी कथाकार शृंखला-कहानी संग्रह
संपादन:
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ऑस्ट्रेलिया के बीस लेखकों की कहानियाँ-केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा 2023
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बूमरैंग 2-ऑस्ट्रेलिया के चालीस कवि 2019
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बूमरैंग 1-ऑस्ट्रेलिया से कविताएँ 2010
ऑस्ट्रेलिया में आपकी साहित्यिक गतिविधियाँ क्या हैं?
मैंने अपना अधिकांश समय बच्चों और वयस्कों को हिंदी शिक्षण देने में व्यतीत किया है। मैं हमेशा नवोदित हिंदी लेखकों को प्रोत्साहित करती हूँ। मैंने 2010–2018 तक सेंटर फ़ॉर कंटिन्यूइंग एजुकेशन सिडनी यूनिवर्सिटी में वयस्कों को हिंदी सिखाने का कार्य किया है। 2002–2011 तक इंडो आस्ट्रेलिया हिंदी स्कूल और शनिवार को लगने वाले सेकेंडरी स्कूल और एचएससी को भी हिंदी पढ़ाने का कार्य किया है। अपनी संस्था इलासा के माध्यम से 2007 में सिडनी में एक कवि सम्मेलन का आयोजन किया और प्रतिवर्ष हिंदी दिवस मनाने की परंपरा का शुभारंभ किया। ऑस्ट्रेलिया के कई संगठनों और स्कूलों ने अब हिंदी दिवस मनाना शुरू कर दिया है। ऐन एस डब्ल्यू संसद भवन (2015) में युवाओं को हिंदी काव्य लेखन के लिए प्रोत्साहित करने की दृष्टि से एक काव्य प्रतियोगिता का आयोजन किया। इस प्रतियोगिता में कई सांसदों और मुख्य अतिथियों ने सहभाग लिया था।
वर्तमान में भी 15 अगस्त, 26 जनवरी, होली, हिंदी दिवस, स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव जैसे विशेष अवसरों पर मैं संगोष्ठी, प्रतियोगिताओं, काव्य पाठ, निबंध लेखन आदि कार्यक्रमों का संयोजन साहित्य और संस्कृति को ऑस्ट्रेलिया में जीवित बनाए रखने के लिए करते रहती हूँ। एक और बड़ी उपलब्धि 2016 में सिडनी विश्वविद्यालय में एक राष्ट्रीय स्तर का हिंदी सम्मेलन आयोजित करना था। प्रति वर्ष अपनी संस्था के माध्यम से सिडनी में हिंदी दिवस का आयोजन करती हूँ, जहाँ सभी हिंदी, संस्कृत शिक्षक, हिंदी कवि और लेखक और सामुदायिक संगठन ‘ऑस्ट्रेलिया में हिंदी’ के बारे में चर्चा करते हैं। ला ट्रोब यूनिवर्सिटी से डॉ. इयन वूलफोर्ड और ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी कैनबरा से डॉ. पीटर फ्रेडलेंडर जैसे प्रतिष्ठित विद्वानों ने भी इस चर्चा में सहभाग लिया है।
‘ऑस्ट्रेलिया में हिंदी’ से संबंधित मेरे आलेख तथा विभिन्न रचनाएँ राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहती हैं।
भारतवर्ष के विश्वविद्यालय पाठ्य पुस्तकों में आपकी रचनाएँ सम्मिलित हुईं हैं, इस बारे में बताएँ।
कर्नाटक के बच्चों की की पाठ्य पुस्तक में मेरी एक कविता ‘अलबेली घंटी’ पढ़ाई जा रही है। मेरी एक कविता महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय बिहार और एक कहानी महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पाठ्यक्रम में सम्मिलित है।
मेरी कोशिश है कि ऑस्ट्रेलिया में हिंदी साहित्य और संस्कृति पुष्पित पल्ल्वित होती रहे।
पुस्तकों के नाम पढ़ते हुए मैंने आपकी ग़ज़ल की पुस्तक ‘मुट्ठी भर चाँदनी’ का जब नाम पढ़ा तो बड़ा आकर्षक लगा। तो क्या आप ग़ज़ल में भी ख़ासी रुचि रखती है?
जब मैं इक्कीस साल की थी, तो अचानक एक ग़ज़ल मैंने क़लमबद्ध की ‘ज़िन्दगी धुँध है, कुहासा है, मन समंदर है फिर भी प्यासा है’ जो बाद में ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ पत्रिका की सम्पादक शीला झुनझुनवाला ने प्रकाशित की थी। वह मेरी पहली ग़ज़ल थी।
बाद में कुछ और भी ग़ज़लें लिखीं। एक बार दिल्ली यात्रा के दौरान लक्ष्मीशंकर वाजपेई जी ने रशियन सेंटर में काव्य पाठ के लिए आमंत्रित किया तो मैंने ‘फूल काँटों में खिला के रखिये, दीप रातों में जलाके रखिये’ का सस्वर पाठ किया। तब उन्होंने कहा, ‘तुम्हारी ग़ज़ल पर पकड़ अच्छी है तो अगली किताब तुम्हारी ग़ज़ल पर आनी चाहिए’ और इस तरह बाद में मेरी पुस्तक ‘मुट्ठी भर चाँदनी’ ऐनी बुक पब्लिकेशंस से प्रकाशित हुई। इसकी भूमिका डॉ. कुँवर बेचैन और वाजपेई जी ने क़लमबद्ध की है। इसमें 51 ग़ज़लें हैं और ये एक तरफ़ उर्दू लिपि में है व दूसरी तरफ़ हिंदी में हैं।
मेरी ये कुछ ग़ज़लें सिडनी के स्थानीय कलाकारों द्वारा स्वरबद्ध की गईं हैं।
अंत में रेखा जी, आप क्या संदेश देना चाहेंगी?
बस यही कि ख़ुश रहिये। जहाँ भी जैसे भी रहें ख़ुश रहें। मेरी एक लोकप्रिय ग़ज़ल का शेर है, ‘राह लम्बी है ज़िन्दगी छोटी, दीप ख़ुशियों के जलाके रखिये।’
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