खुरदुरे यथार्थ को बयाँ करता संग्रह ‘आईने से पूछो’
समीक्षा | पुस्तक समीक्षा अनिरुद्ध सिन्हा15 Mar 2026 (अंक: 294, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
पुस्तक का नाम: आईने से पूछो
ग़ज़लकार: डॉ. अविनाश भारती
प्रकाशक: श्वेतवर्णा प्रकाशन, नई दिल्ली
पृष्ठ: 104
मूल्य: ₹199
अविनाश भारती बिहार की वर्तमान पीढ़ी के जागरूक और प्रतिभाशाली ग़ज़लकार हैं। विश्वविद्यालय में अध्यापन के साथ-साथ अपनी सृजनात्मक गतिशीलता बनाए हुए हैं। निर्भीकता, दो टूक बात, युक्ति-संगत विचार एवं स्वछंद चिंतन इनके ग़ज़ल-लेखन के मुख्य तेवर हैं। ग़ज़ल लेखन के साथ-साथ ग़ज़ल आलोचना के प्रति भी इनका रुझान प्रशंसनीय है। इनकी ग़ज़लों में जीवन का यथार्थ है। सृजन की आग है। रचनात्मक क्षमता है। जीवन-संघर्ष से उत्पन्न निरंतर वर्तमान के सच को समझते, भोगते और जानते हुए भविष्य के प्रति सचेत एवं सार्थक अपेक्षाएँ हैं। यथार्थ के धरातल पर सुनहले सपनों का सुकून है। एक उत्कट अभिलाषा है, असंगता के दर्द को सृजन में व्यंजित कर देने की उत्कंठा है। भाव वैविध्य की बहुलता के बावजूद एक निष्कर्ष के रूप में पिष्टपेषण-सा प्रतीत होने वाला निर्णय है। किसी वाद की उँगली पकड़कर नहीं चलने वाले अविनाश भारती अपनी एक अलग राह तैयार करते नज़र आते हैं। इनकी अपनी विचारधारा है जो राजनीतिक प्रतिबद्धता की संकीर्णता तथा आक्रामकता में न उलझकर अपनी अस्मिता में अक्षुण्ण है। यही इनकी ग़ज़ल की मानवतावादी धारा है।
भाव और कला दोनों पर बराबर का ध्यान देनेवाले अविनाश भारती के इस शेर को देखें:
कुन्दन जैसा बनना है तो
ताप अनल का सहना होगा
इस शेर पर अलग-अलग नज़र डालकर देखने से पता चलता है इसकी रवानी, शब्दों का कसाव, लहजे का तालमेल मुखर है और बता रहा है ग़ज़लकार के भीतर ग़ज़ल कहने की सलाहियत है। कहन में एक प्रकार की शालीनता है जो सहज ही पाठकों को अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। इस अशआर पर किसी अतिरिक्त टिप्पणी की आवश्यकता नहीं है।
इसमें कोई शक नहीं है कि अविनाश भारती हिन्दी साहित्य की धरती पर ग़ज़ल के जो बीज बो रहे हैं, वे आने वाले दिनों में अंकुरित एवं पल्लवित होकर हिन्दी साहित्य की एक प्रमुख काव्य विधा के रूप में जाने जाएँगे। इन्होंने अपने रचना-कर्म द्वारा ग़ज़लों को एक नया रंग प्रदान किया है। इनकी ग़ज़लों के कथ्य यथार्थ के नए रंग-रूप लेकर सामने आते हैं। ग़ज़लों में प्रयुक्त भाषा विकास-पथ पर चलते रहने के कारण पुराने ग़ज़लकारों की भाषा से अधिक पुष्ट है। आम बोलचाल की भाषा तो है ही, साथ में भाषा में नयापन भी है। इसके अतिरिक्त कुछ नये प्रयोग भी इनकी रचनाओं में दिखाई देते हैं जिनमें यथार्थता और व्यंग्यात्मकता के स्वर गूँथे हुए नज़र आते हैं। वर्तमान युग मानवीय मुखौटों का युग है, क़दम-क़दम पर विश्वासघात, धोखा, झूठ, बेईमानी तथा बनावटीपन आज की विशेषता हो गई है। अविनाश भारती ने अपनी ग़ज़लों में इन सारी विद्रूपताओं का सफलतापूर्वक रेखांकन किया है। इसके अतिरिक्त इनकी ग़ज़लों में प्रतीकों के साथ-साथ लाक्षणिक अभियोजना भी दर्शनीय है।
संग्रह की सारी ग़ज़लें उत्कृष्ट ग़ज़ल-लेखन का नमूना हैं, जिनमें जीवन-दर्शन के सभी पहलू मौजूद हैं। ग़ज़लें अनेक आयामों से मिलकर मानव-जीवन का चित्रण करती हैं। सोच, सद्भावना, प्रेम और सौहार्द के द्वारा सामाजिक विसंगतियों को सद्भाव में बदला जा सकता है। वस्तुतः संग्रह की सारी ग़ज़लों का यही मक़सद है।
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