मेरी वाटिका—मेरा सुकून
कथा साहित्य | कहानी डॉ. हंसराज1 Jan 2026 (अंक: 291, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
शहर की व्यस्त सड़क से कुछ ही क़दम की दूरी पर, राज का घर, शान्ति का टापू था। राज के घर का आकर्षण थी—एक छोटी सी वाटिका, जिसे उन्होंने पिछले लगभग 8 वर्षों से सिर्फ़ पानी से नहीं, बल्कि अपनी भावनाओं से सींचा था। उनकी वाटिका में फूल एवं फलों के सैकड़ों पौधे थे और कई औषधीय पौधे भी ख़ुश्बू बिखेर रहे थे। उनकी पत्नी रिया अक्सर उन्हें लेखन में घण्टों डूबा हुआ देखती, लेकिन जैसे ही राज क़लम रखकर उठते, तो उनके क़दम सीधे वाटिका की ओर मुड़ जाते। राज का वाटिका के पौधों से इतना गहरा लगाव था कि जब भी वे बाहर से घर वापस आते तो सीधे वाटिका में पहुँच जाते और एक-एक पौधे के पास जाकर ऐसे निहारते, मानो वे इनसे इनका हालचाल पूछ रहे हों। वे हमेशा कहा करते थे कि ये पौधे मेरी ख़ामोशी भी सुनते हैं, मेरे सच्चे दोस्त हैं।
हर सुबह की शुरूआत एक अनूठे तालमेल से होती, जहाँ राज पौधों की गुड़ाई करते और रिया उनमें खाद और पानी डालती। राज अक्सर कहते, रिया देखो, “ये रातरानी आज कितनी ख़ुश हैं?” रिया मुस्कराकर जवाब देती, “होगी क्यों नहीं? कल रात आपने जो नई कहानी इसे सुनाई थी।” रिया और राज ने एक सुन्दर नियम भी बनाया था। वे हर ख़ास दिन एवं त्योहार पर एक नया पौधा वाटिका में लगाते थे। जब कोई अतिथि उनके घर आता, तो उसे वे अपनी वाटिका में ज़रूर ले जाते और पौधों से परिचय करवाते और कभी तुलसी, तो कभी एलोवेरा, कभी महकता हुआ गुलाब देकर विदा करते।
एक शाम रिया ने देखा कि राज बड़े ध्यान से कभी आम, तो कभी अमरूद और कभी केले के उन पौधों को देख रहे थे, जो अब काफ़ी बड़े हो गए थे। रिया ने कहा, “आप आज इन्हें इतना ग़ौर से क्यों देख रहे हो?”
राज ने धीरे से कहा, “रिया देखो, ये पौधे कितने बड़े हो गए हैं? मुझे लगता है, इन्हें अब हमारे मित्रों या इष्टजनों के यहाँ चले जाना चाहिए।”
रिया ने कहा कि हम इन्हें बोनसाई बनाकर भी लम्बे समय तक अपनी वाटिका में रख सकते हैं।
इस पर राज ने कहा, “रिया, मैं इन पौधों को एक मित्र के रूप में देखता हूँ। मेरा इनसे अपनापन इतना है कि इनकी कटिंग भी मैं नहीं करना चाहता और आप सोच रही हो कि इनकी गर्दन काटकर बौना बना दिया जाए। नहीं रिया, ऐसा ठीक नहीं है।”
रिया ने मुस्कुराते हुए कहा, “आप इन्हें घर से बाहर कर रहे हैं। क्या आपको दुख नहीं होगा? आपने इन्हें बच्चों की तरह पाला है। आप तो हमेशा कहते हैं कि ये मेरे परिवार के सदस्य हैं।”
राज की आँखों में एक चमक थी। उन्होंने कहा, “रिया पौधे बेटियों की तरह होते हैं। आज जब मैं इन्हें अपने इष्ट मित्रों के घर भेजूँगा, तो ये वहाँ भी ख़ुशियाँ बिखेरेंगे। जब मैं कभी उनके घर जाऊँगा और इन पौधों को लहराते देखूँगा, तो वैसी ही ख़ुशी मिलेगी, जैसी एक पिता को अपनी बेटी के घर जाने पर मिलती है।”
आगामी रविवार के दिन राज और रिया ने मिलकर उन पौधों के साथ कई फोटो खींचे और पौधों को विदा किया। पौधों को विदा करने के बाद, राज को ऐसा लग रहा था कि वाटिका में आज कुछ अधूरा-सा है। वे अपनी पत्नी रिया के साथ एक नर्सरी की ओर निकल पड़े और दो छोटे-छोटे पौधे लाकर वाटिका में लगा दिए। राज का उस वाटिका से इतना गहरा लगाव था कि जब भी राज का मन उदास होता, तो इन पौधों की हरियाली ही उनका सहारा बनती। जब वे ख़ुश होते तो फूलों की महक उनकी ख़ुशी दोगुना कर देती।
सर्दी की ठिठुरन हो या गर्मी की तपिश। ये पौधे अडिग रहकर राज का इंतज़ार करते थे। धीरे-धीरे वाटिका में नन्ही चिड़ियाँ आने लगीं और कुछ ही दिनों में चिड़ियों ने वाटिका में अपने घोंसले बना लिए। और फिर घोंसलों में चिड़ियों के बच्चों की चीं-चीं की आवाज़। चिड़ियों का चहचहाना और पत्तों की सरसराहट राज के लेखन के लिए एक नई ऊर्जा बन गई थी।
कुछ दिनों के बाद, राज अपने मित्र के घर गए, तो उन्होंने देखा कि उनके द्वारा दिया गया पौधा, एक छोटा पेड़ बन चुका है। उसे देखते ही राज के चेहरे पर सुकून भरी मुस्कान तैर गई। उन्हें ऐसा लग रहा था, जैसे वह पौधा उनसे कह रहा हो, ‘देखिए, मैं यहाँ भी आपकी यादें सँजोए हुए हूँ।’ राज उस पौधे के पास गए और हाथ से छू कर देखने लगे। ऐसा लग रहा था मानो अपने पुराने साथी से मिल रहे हों।
रिया ने राज का हाथ थामते हुए कहा, “सच में आपकी तरह यदि हर मनुष्य प्रकृति से ऐसे ही जुड़ाव रखे, तो हम सिर्फ़ धरती को ही हरा-भरा नहीं बनाएँगे, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को जीने का सलीक़ा भी सिखा पाएँगे।”
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