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मदर्स डे

 

मातृत्व, स्मृति और संस्कृति: एक संस्मरणात्मक निबंध

 

आज सुबह जब मदर्स डे पर बच्चों ने अपना स्नेह व्यक्त किया तो तन‑मन ऊर्जा से भर उठा। अक्सर मैं यह सोचती थी कि मदर्स डे, फ़ादर्स डे पश्चिमी सभ्यता की रिश्ता निभाने की औपचारिकता मात्र हैं। जो माँ अपने बच्चों के लिए सुरक्षा कवच की तरह जीवन के हर पड़ाव में उनके साथ खड़ी रहती है, उसी माँ के लिए क्या एक मदर्स डे पर्याप्त है? नहीं, यह काफ़ी नहीं है।

यह जाता हुआ वह साया है; इसकी छाँव और सुकून में फ़ुर्सत निकालकर बैठ लीजिए। माँ है तो गहरा सुकून है, बड़ा भरोसा है, सुरक्षा का एहसास है, छोटी‑बड़ी परेशानी का हल निकालने वाला मंत्र है। व्यक्त कीजिए माँ के प्रति कृतज्ञता, स्नेह, सम्मान और प्यार। अक्सर हम सोचते हैं—कहने की ज़रूरत क्या है . . . पर आपकी सहज अभिव्यक्ति माँ को जीवंत कर देती है। मदर्स डे की सार्थकता उस चिंतन में है, जहाँ प्रत्येक माँ थोड़ा वक़्त निकालकर सोचे कि वह अपने बच्चों की परवरिश को और बेहतर कैसे बनाए, जिससे वे अच्छे इंसान और ज़िम्मेदार नागरिक बन सकें।

आप अपने जीवन‑साथी को यह बताएँ कि आपकी माँ की जगह आपके जीवन में क्या है, ताकि वह भी आपके समान व्यवहार करे। दूसरी ज़रूरी बात—आप भी अपने जीवन‑साथी की माँ को बराबर का सम्मान दें। बहुत बदलाव आए रिश्तों में, लाइफ़स्टाइल में, घर के वातावरण में, पर माँ के साम्राज्य में सेंध न लगी। मातृत्व के घटकों को किसी भी सोच की परिधि से बाहर समझना पड़ता है।

टेक्नॉलॉजी के क्षेत्र में चाहे हम कितना ही आगे बढ़ गए हों, लेकिन पारिवारिक संस्कार हमें कभी भी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करने देते।

माँ‑बाप को मज़बूत बनाने पर ध्यान अवश्य दें—फिर चाहे उन्हें आर्थिक रूप से सक्षम बनाना हो, उनकी मेडिकल प्लानिंग हो या उनका एकाकीपन। आप उन्हें भरोसा दिलाएँ कि आप दुनिया का सबसे स्ट्रॉन्ग सपोर्ट सिस्टम है, जो बिना शर्त उनके साथ है।

यह क़तई ज़रूरी नहीं कि हम माँ के नज़रिए को अपने अनुसार बदलें। एक बार अपनी दुनिया उनके अनुसार देखें तो क्या सुधार करना है, यह स्पष्ट हो जाएगा।

जीवन‑संध्या के इस पड़ाव पर मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि हमने अपनी माँ को शायद ही कभी यह एहसास दिलाया हो कि वे हमारे जीवन में क्या अहमियत रखती हैं।

उम्र की रेस और व्यस्तता में भी जब हम इस ख़ालीपन को महसूस करते हैं तो मन भारी हो जाता है। याद आती है उनकी वह बात, जब वह कहती थीं, “मेरी बात सुन लो, फिर पूछने वाला नहीं मिलेगा।” जब भी माँ नाराज़ होतीं, तब बात करना बंद कर देतीं; माँगते रहिए माफ़ी—वह आसानी से माफ़ नहीं करती थीं।

माँ को कहानी सुनने और सुनाने का शौक़ था। वह रोज़ रात को रेडियो पर आने वाला हवा महल कार्यक्रम ज़रूर सुनती थीं।

एक दफ़ा जब वह मुझसे नाराज़ थीं, मैंने उन्हें मनाने के लिए कहानी सुनाने की सोची। अपनी छोटी बहन से कहा, “कहानी सुनोगी? बहुत अच्छी है, लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि सच्ची घटना है—कैसे बाँकेबिहारी एक लड़के के आग्रह पर साक्षी देने वृंदावन से उड़ीसा आए।”

मुझे मालूम था, माँ भी कहानी सुनेंगी। मैंने कहानी इस प्रकार शुरू की:

बहुत समय पहले की बात है। उड़ीसा राज्य में भुवन नामक एक छोटा‑सा गाँव था, जहाँ मुश्किल से पचास‑साठ घर थे। अधिकतर लोग खेती करके गुज़ारा करते थे। वहाँ मोहन नाम का किसान उन सबमें सबसे अधिक समृद्ध था; लोग उसका बहुत सम्मान करते थे। मोहन की रूप नाम की एक बेटी थी, जो इतनी सुंदर थी कि उसकी सुंदरता के चर्चे आस‑पास के गाँवों में भी होते थे। रूप भोला नाम के लड़के से प्यार करती थी। भोला एक ग़रीब किसान का बेटा था—बहुत मेहनती और ईमानदार। गाँव के सभी लोग उसे बहुत प्यार करते थे।

मोहन को यह रिश्ता बिल्कुल पसंद नहीं था। उसकी लड़की इतनी सुंदर है—उसे एक से एक वर मिलेगा, फिर वह क्योंकर इस ग़रीब लड़के से रिश्ता करे? भोला ने मोहन की बहुत मिन्नत की, लेकिन वह नहीं माना। इसी बीच ज़मींदार के लड़के का रिश्ता रूप के लिए आया और मोहन ने ख़ुशी‑ख़ुशी रिश्ता मंज़ूर कर लिया।

माँ कहानी बहुत ध्यान से सुन रही थीं। मैं थोड़ी देर के लिए चुप हो गई। तभी माँ बोलीं, “फिर क्या हुआ?”

मैंने कहा, “पहले आप मुझे माफ़ तो करें।” इस तरह उस दिन मुझे माफ़ी मिल गई।

मैंने कहानी आगे शुरू की—

भोला और रूप दोनों ही मोहन को मनाने में असमर्थ रहे। मोहन बेटी की शादी से पहले बाँकेबिहारी जी का दर्शन करना चाहता था। वह गाँव के कुछ लोगों के साथ मथुरा‑वृंदावन की यात्रा के लिए निकला। भोला के साथ चलने के आग्रह पर मोहन यह सोचकर राज़ी हो गया कि सफ़र में सामान उठाने में भोला मदद कर देगा। उन दिनों लोग पैदल या बैलगाड़ी पर ही निर्भर रहते थे—कहाँ उड़ीसा, कहाँ मथुरा‑वृंदावन! रास्ते में डकैतों का भी डर।

दिन भर चलते, रात को कहीं पड़ाव डाल लेते। भोला सबकी सेवा करता—पानी भर लाता, खाना बना देता, यहाँ तक कि थके हुए लोगों के पैर भी दबा देता। मोहन सोच रहा था—ज़मींदार के लड़के को जमाई बनाया तो हमेशा उसकी जी‑हज़ूरी ही करनी पड़ेगी। भोला जैसा मेहनती और ईमानदार लड़का पूरे गाँव में कोई नहीं, लेकिन ज़मींदार के यहाँ शादी करने से मेरा मान‑सम्मान कितना बढ़ जाएगा और रूप भी राज करेगी।

महीनों बाद वे लोग वृंदावन पहुँचे। मोहन बीमार पड़ गया—तेज़ ज्वर के साथ माता निकल आई। सराय के मालिक ने उसे सराय से बाहर निकाल दिया। साथ आए लोग छूत लगने के डर से उसे वहीं फुटपाथ पर छोड़कर चले गए।

भोला ने मोहन की बहुत सेवा की। मोहन ठीक हो गया। वह भोला से बोला, “मुझे बाँकेबिहारी जी के दर्शन करा दो। तुमने मेरी बहुत सेवा की है। मैं रूप का विवाह तुमसे ही करूँगा।”

भोला बोला, “मैं आपकी बात का कैसे यक़ीन करूँ? गाँव पहुँचकर आप अपनी बात से मुकर गए तो?”

मोहन बोला, “परदेश में किसे साक्षी बनाओगे?”

भोला बोला, “बाँकेबिहारी जी को ही साक्षी बना लेते हैं।”

मोहन ने सोचा—भोला सच में बहुत भोला है। न बाँकेबिहारी जी साक्षी देने हमारे गाँव आएँगे, न मुझे रूप की शादी भोला से करनी पड़ेगी।

दोनों मंदिर गए। मोहन ने बिहारी जी के समक्ष रूप का विवाह भोला से करने का वादा किया। भोला बोला, “देखो बिहारी जी, आपको साक्षी देने आना ही पड़ेगा।”

मोहन मन ही मन खुश हो रहा था—भला बाँकेबिहारी इसकी साक्षी देने हमारे गाँव आएँगे!

मैंने देखा—माँ बहुत तन्मय होकर कहानी सुन रही हैं।

उस रात भोला मंदिर में बैठकर बिहारी जी से मिन्नत करने लगा। जब काफ़ी रात हो गई तो थककर सो गया। सपने में उसने बिहारी जी को देखा। वे बोले, “मैं साक्षी देने अवश्य आऊँगा। जब तुम यात्रा करोगे, मैं तुम्हारे पीछे‑पीछे चलूँगा। मेरी घुँघरू की आवाज़ से तुम्हें पता लगता रहेगा कि मैं आ रहा हूँ। लेकिन जैसे ही तुम पीछे मुड़कर देखोगे, मैं वहीं रुक जाऊँगा। अब तुम निश्चिंत होकर जाओ।”

दूसरे दिन दोनों ने यात्रा आरम्भ की। भोला को बराबर घुँघरू की आवाज़ आती रही। कुछ माह बाद जब वे गाँव की सरहद पर पहुँचे तो घुँघरू की आवाज़ आनी बंद हो गई। भोला घबरा गया—क्या बिहारी जी लौट गए?

वे अपना वादा भूल गए और पीछे मुड़कर देख लिया। बिहारी जी वहीं रुक गए।

भोला ने पास जाकर देखा—वृंदावन बिहारी वहाँ खड़े हैं, लेकिन पत्थर की मूर्ति के रूप में। भोला ने पैरों की तरफ़ देखा—घुँघरू में बालू भर गई थी, इसलिए आवाज़ बंद हो गई थी।

भोला ने पैरों पर गिरकर विश्वास न करने की क्षमा माँगी, “प्रभु, आप कितना कष्ट करके यहाँ आए!”

भोला गाँव चला गया। उसने मोहन को उसका वादा याद दिलाया। मोहन हँसकर बोला, “क्या बच्चों जैसी बातें करते हो? मैंने कोई वादा नहीं किया है। है कोई साक्षी?”

तब भोला बोला, “स्वयं बिहारी जी साक्षी देने आए हैं।”

सारा गाँव भोला को पागल कहने लगा। तब ज़मींदार बोले, “चलकर देखने में क्या हर्ज़ है? बाँकेबिहारी स्वयं साक्षी देने आए हैं—कोई पागल ही बोल सकता है।”

सब गाँव के बाहर आए। थोड़ी दूर चलकर सब हैरान हो गए—रास्ते के बीच साक्षात् बाँकेबिहारी जी खड़े थे।

मोहन भय से काँपने लगा, “क्षमा करें प्रभु! मैं अपने वादे से मुकर गया और आपको साक्षी देने आना पड़ा। मैं रूप की शादी भोला से ही करूँगा। मुझे क्षमा कर दें।”

तब से उस गाँव का नाम साक्षी गोपाल पड़ गया। आज भी लोग उस गाँव को इसी नाम से जानते हैं—जहाँ प्रभु अपने भक्त का मान रखने के लिए स्वयं साक्षी देने आए थे।

माँ कहानी सुनकर भूल ही गईं कि मुझसे नाराज़ थीं।

माँ—जीवन की हर वेदना में संवेदना बनकर, तो कभी उपलब्धियों में ख़ुशी बनकर हमारे साथ रहीं। यह वह रिश्ता है, जहाँ न रिश्ता निभाने की औपचारिकता है, न स्नेह व्यक्त करने की मजबूरी। कोमलता से हमारी भावनाओं को सजग करने वाली। अतीत के सुखद प्रसंगों की याद से उभरी आनंद और विषाद की मिश्रित भावना है—माँ।

लेकिन आज समय कितना बदल गया है। आधुनिक जीवन की दौड़ में अनेक माताएँ उपेक्षा, अकेलेपन और भावनात्मक असुरक्षा से गुज़र रही हैं। एक समय वह भी था, जब हम माँ के नाराज़ होने पर उन्हें मनाने की हर सम्भव चेष्टा करते थे—लेकिन आज समय कितना बदल गया है।

रिश्तों में मधुरता और कर्तव्यनिष्ठा समाप्त होती जा रही है।

आज जहाँ शहरी जीवन सुविधाओं से परिपूर्ण है, वहीं मनुष्य संवेदनहीन होता जा रहा है। वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या सामाजिक विफलता और भावविहीन मानसिकता का प्रमाण है।
 

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