राष्ट्रपाल गौतम के एकांकी नाटक ‘गोबर के गेहूँ’ पर परिचर्चा
भारत समाचार 24 Oct 2024
नव दलित लेखक संघ, दिल्ली ने ‘नाटक और कविता की संगत’ नामक गोष्ठी का आयोजन किया। गोष्ठी में सर्वप्रथम हाल ही में परिनिर्वाण को प्राप्त हुए लक्ष्मीनारायण सुधाकर जी को आदरांजलि देते हुए दो मिनट का मौन रखा गया। तत्पश्चात् राष्ट्रपाल गौतम द्वारा रचित एकांकी नाटक ‘गोबर के गेहूँ’ पर चर्चा हुई। साथ ही उपस्थित कवियों का उम्दा काव्यपाठ भी हुआ। शाहदरा स्थित संघाराम बुद्ध विहार में रखी गई इस गोष्ठी का संयोजन डॉ. अमित धर्मसिंह ने किया। अध्यक्षता डॉ. कुसुम वियोगी ने की और संचालन मामचंद सागर ने किया। गोष्ठी में डॉ. कुसुम वियोगी, मामचंद सागर, राष्ट्रपाल गौतम, पुष्पा विवेक, डॉ. पूरन सिंह, डॉ. ऊषा सिंह, डॉ. गीता कृष्णांगी, डॉ. अमित धर्मसिंह, लोकेश कुमार, मदनलाल राज़, राधेश्याम कांसोटिया, देवराज सिंह देव, इंद्रजीत सुकुमार, एदल सिंह और विकास कुमार आदि कविगण उपस्थित रहे।
गोबर के गेहूँ एकांकी नाटक पर बोलते हुए डॉ. अमित धर्मसिंह ने कहा, “‘गोबर के गेहूँ’ नाटक आज़ादी से पूर्व की पृष्ठभूमि से लेकर वर्तमान तक फैला हुआ ऐतिहासिक और सामाजिक नाटक है। यह न सिर्फ़ दलित दशा को उद्घाटित करता है अपितु संबंधित सामाजिक कुरीति का प्रतिरोध भी करता है। अपने कथ्य, संवाद, भाषा, शैली और मंचन आदि को लेकर, यह एक सफल एकांकी नाटक है। डॉ. कुसुम वियोगी ने कहा, “यह जातीय अथवा सामाजिक भेदभाव से अधिक वर्ग संघर्ष का नाटक है। इसमें किसी भी प्रकार की सामाजिक बुराई का प्रतिरोध नज़र नहीं आता, बल्कि अपने-अपने सामाजिक स्तर को ऊँचा बनाए रखने की क़वायद दिखाई पड़ती है।” राष्ट्रपाल गौतम ने कहा कि नाटक में गोबर के गेहूँ खाने की जिस घटना का वर्णन किया गया है, वह मेरे साथ स्टुडेंट टाइम में घटित हुई थी। उस समय तो मैं कुछ कह नहीं सका था, बाद में जब यह नाटक मैंने यह लिखा तब भी मैंने इसके विषय में इतना नहीं सोचा था, जितना कि आज इस नाटक पर समीक्षकों ने कहा है। इसके लिए मैं नदलेस का आभारी हूँ, ख़ासकर डॉ. अमित धर्मसिंह और इस पर बात रखने वाले सभी वक्ताओं का।” इनके अलावा मदनलाल राज़, मामचंद सागर, पुष्पा विवेक, इंद्रजीत सुकुमार, देवराज सिंह देव आदि ने भी नाटक पर विशेष टिप्पणियाँ की।
नाटक पर परिचर्चा के उपरांत उपस्थित कवियों का काव्यपाठ हुआ। डॉ. पूरन सिंह ने दीवारें और भूख शीर्षक से दो कविताएँ पढ़ीं। उन्होंने दीवारें कविता में पढ़ा, “बचपन में मैं और रामसनेही साथ-साथ खेला करते थे/ . . . हम बड़े हुए तब समझ आया कि रामसनेही सिर्फ़ रामसनेही नहीं है/वह रामसनेही चमार है/ . . . बस दीवारें खड़ी होने लगीं।” एदल सिंह ने बाबा की ज्योति शीर्षक से लोकगीत में रसिया कुछ यूँ पढ़ा, “बाबा की ज्योति बड़ी प्यारी/जो दिल में कर दे उजियारी/मैं तुझको रहा समझाए/मत पड़े पिछारी देवन के।” इनके अलावा मदनलाल राज़, डॉ. अमित धर्मसिंह, इंद्रजीत सुकुमार, देवराज सिंह देव, राष्ट्रपाल गौतम, पुष्पा विवेक, डॉ. कुसुम वियोगी, मामचंद सागर और राधेश्याम कांसोटिया आदि ने भी अपनी-अपनी बेहतरीन कविताएँ प्रस्तुत कर, गोष्ठी को सफल एवं सार्थक बनाने में महती योगदान दिया। अंत में डॉ. पूरन सिंह द्वारा उपलब्ध करवायी गई, डी.के. भास्कर द्वारा सम्पादित ‘डिप्रेस्ड एक्सप्रेस’ (मासिक पत्रिका) की कुछ प्रतियों का हाईलाइट किया गया। सभी उपस्थित कवियों का सादर धन्यवाद पुष्पा विवेक ने किया।
प्रेषक
लोकेश कुमार
राष्ट्रपाल गौतम के एकांकी नाटक ‘गोबर के गेहूँ’ पर परिचर्चा
हाल ही में
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