अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

अभी नहीं 1- जाको राखे साईंयाँ, मार सके न कोए

जीवन की कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जो अपनी छाप छोड़ कर चली तो जाती हैं मगर जब जब उनकी याद आती है तो एकाएक कंपकपी सी उठने लगती है। मेरे साथ भी कई बार कुछ ऐसा ही हुआ। हर बार लगता था कि जीवन का बस अन्त हो गया है मगर हर बार कहीं से यह आवाज़ आती थी - अभी नहीं... अभी नहीं... अभी नहीं...

कुएँ में साँप - 1953

अम्बाले में अपने बाग में पिता जी ने कुआँ लगवाने का निश्चय किया। भूमि पूजन के बाद एक गोल गढ़ा खोदा गया और उसमें पहिए जैसा लकड़ी का चाक डाला गया। चाक पर ईंटों से कुएँ की चिनाई होने लगी। जब यह ढाँचा कोई तीस फ़ुट का हो गया तो उसके ऊपर बहुत सा वज़न रक्खा गया। नीचे जाकर मज़दूर मिट्टी खोदते थे और उसको चरखी द्वारा बाहर फेंका जाता था। इस तरह से कुआँ धीरे धीरे नीचे धंसत जाता था। पानी के दर्शन होने के बाद भी यह सिलसिला चलता रहा और कुआँ जल्दी जल्दी नीचे जाने लगा।

छुट्टी का दिन था। मैंने साईकिल उठाई और बाग पर जा पहुँचा। मज़दूरों को काम करते देख कर मुझे भी कुएँ में उतरने की इच्छा हुई। माधो के बार बार मना करने पर भी में नीचे उतर गया और मज़दूरों के साथ मिट्टी खोदनी शुरु कर दी। आधा घण्टा रह कर कुएँ से बाहर आ गया और फिर एकदम घर की ओर प्रस्थान किया।

इसी बीच पिताजी को भी मेरी इस हरकत की खबर मिल गई। शाम को डाँट तो जो पड़ी सो पड़ी, उसके साथ यह भी पता चला कि मेरे बाहर आने के एक मिनट बाद ही एक बहुत बड़ा साँप निकला और उसने एक मज़दूर को डस भी दिया था। मज़दूर को तुरन्त हस्पताल ले जाया गया और वो मरते मरते बचा।

सर्प रूप में आए थे, बनकर काल महान,
अभी नहीं, कह चल दिये दान रूप दे प्राण।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

28 अक्टूबर, 2015 की वो रात
|

बात २४ जनवरी २०१३ की है। उस दिन मेरा ७५वां…

 काश! हम कुछ सीख पायें
|

अभी कुछ दिनो पूर्व कोटा से निज़ामुद्दिन जनशताब्दी…

अभी नहीं 2 - चाय का दूध बहुत महँगा पड़ा : 1961
|

जीवन की कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जो अपनी…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

सांस्कृतिक कथा

कविता

किशोर साहित्य कहानी

लोक कथा

ललित निबन्ध

आप-बीती

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं