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बस अच्छे ही लोग मिले

सागर तट पर मोती,
सूरज ढलते ही ज्योति,
ऐसे सुखद संयोग मिले,
जिस जगह रहा,
जिस जगह गया,
वहीं पर अच्छे लोग मिले।



कुछ अजनबी अपने बने,
कुछ अपनों ने क़ुर्बानी दी,
कुछ बड़ों ने प्यार से डाँटा,
कुछ बच्चों ने नादानी की।
अनजानों के संग चलने के,
उनके संग घुलने-मिलने के,
अद्भुत-अतुल्य प्रयोग मिले,
जिस जगह रहा,
जिस जगह गया,
वहीं पर अच्छे लोग मिले।


उनका हुनर था तारे छूने का,
पर पाँव थे ज़मीं पर टिके हुए,
प्रेम, सादग़ी, विनम्रता जैसे,
‘शब्द’ थे दिल पर लिखे हुये।


पाकर भी अहंकार ना हो,
निंदा से सरोकार ना हो,
ऐसे वचन अमोघ मिले,
जिस जगह रहा,
जिस जगह गया,
वहीं पर अच्छे लोग मिले।


एक सुंदर तस्वीर ही बनती,
डालता जब कागज़ पर स्याही को,
इतना वक़्ता कहाँ कि परखूँ?
उनमें छिपी बुराई को।
पर दुःख में रोने वाले,
ख़ुशी में ख़ुश होने वाले,
सज्जन ‘दीनू’ को रोज़ मिले,
जिस जगह गया,
जिस जगह रहा
वहीं पर अच्छे लोग मिले।

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