अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

करत-करत अभ्यास ते : भोजपुरी लोककथा

बात उन दिनों की है जब काशी विद्या के केन्द्र के रूप में विश्व-प्रसिद्ध था। विद्याध्ययन के लिए, दूर-दूर से लोग यहाँ आते थे। विद्याध्ययन की ललक लिए एक गरीब ब्राह्मण कुमार काशी पहुँचा। वह एक योग्य गुरु के सानिध्य में विद्याध्ययन करने लगा। वह अपने गुरु का बहुत प्रिय था पर पढ़ाई में फिसड्डी था। कई सालों तक वह परीक्षा में अनुत्तीर्ण होता रहा। बार-बार परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने के कारण उसका मन पढ़ाई से उचट गया। एक दिन बोरिया-बिस्तर समेटकर वह अपने गाँव की ओर चल पड़ा। उसके दिमाग में अब एक ही बात चल रही थी, "पढ़ने नहीं जाऊँगा और भीख माँगकर खाऊँगा"। उस समय भिक्षाटन ब्राह्मणों का जन्मसिद्ध अधिकार समझा जाता था। आप इसका यह अर्थ कत्तई न निकालें कि उस समय ब्राह्मण आलसी होते थे।

चलते-चलते वह ब्राह्मण कुमार, दोपहर को एक गाँव में पहुँचा। कड़ी धूप थी और उसका पूरा शरीर पसीने में नहाया हुआ था। उसकी ज्ञान-पिपासा तो मर गई थी पर जल-पिपासा तेज हो गई थी। वह एक कुएँ पर पहुँचा और गठरी से लोटी-डोरी निकालकर पानी भरने लगा। पानी भरते समय अचानक उसके दिमाग में कुछ कौंधा। वह विस्मय से कभी रस्सी को देख रहा था तो कभी कुएँ की जगत को।

उसने सोचा कि जब इस घासफूस की रस्सी के बार-बार घर्षण से पत्थर (कुएँ की जगत) भी घिस जाता है। उसमें रस्सी के निशान भी पड़ जाते हैं तो विद्या के बार-बार अभ्यास से मेरा दिमाग क्यों नहीं घिस सकता। इसके बाद उसके कदम पुनः विद्या प्राप्ति के लिए काशी की ओर मुड़ गए। कालान्तर में उसकी मेहनत रंग लाई और उसकी गणना काशी के बड़े-बड़े विद्वानों में होने लगी।

सच ही कहा गया है-

करत-करत अभ्यास ते, जड़मति होत सुजान,
रसरी आवत जात ते, सिल पर परत निशान।

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

गिटारवादक
|

रूसी लोककथा "रूस देश के किसी गाँव में…

चावल बन गया धान : भोजपुरी लोककथा
|

नमस्कार, क्या आप लोगों को पता है कि बहुत…

चूहे का ब्याह
|

इथोपिया की लोककथा एक बार एक ख़ूबसूरत सफ़ेद…

जैसे को तैसा : भोजपुरी लोककथा
|

नदी के किनारे के जंगल में एक ऊँट रहता था।…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

अनूदित लोक कथा

कविता

बाल साहित्य कविता

आप-बीती

साहित्यिक आलेख

बाल साहित्य कहानी

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं