अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका महाकाव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई कतआ

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सामाजिक शोध निबन्ध ललित निबन्ध अपनी बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य रंगमंच

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा डायरी बच्चों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

रेखाचित्र कार्यक्रम रिपोर्ट

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

लगन (राजेन्द्र कुमार शास्त्री ’गुरु’)

एक गाँव के मोहल्ले में कुछ बच्चे बाहर गली में खेल रहे थे। कोयल सुबह की राग अलाप रही थी। मोहल्ले में जन्नत की सी शांति छाई हुई थी। एक ग़रीब परिवार में एक 4-5 वर्ष का बालक अपने पिता से प्राथमिक शिक्षा ग्रहण कर रहा था। दोनों बाप-बेटे को घर के दूसरे कामकाज व पारिवारिक कार्यक्रमों में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वो तो मानो बरसों से एक दूसरे से मिले हों। पिता के पास जो कुछ भी किताबी ज्ञान था, वह  उसे एक ही दिन में दे देना चाहता था। पिता ने पुत्र से प्रेमपूर्वक स्लेट पर गणित की संख्या 23 लिखकर पूछा, "ये कितने हैं?"

"पिताजी तेईस है," बेटे ने झटपट बता दिया।

पिता ने पुन: 54 लिखते हुए पूछा, "अब बता ये कितने हैं?"

"पिताजी चौवन है,"उसने झटपट जवाब दे दिया। 

पिता की ख़ुशी का कोई ठिकाना न रहा। उन्हें मानो स्वर्ग का सुख मिल गया हो। वैसे भी एक पिता को सबसे ज़्यादा ख़ुशी तब होती है, जब उसका पुत्र उसके इरादों पर खरा उतरता हो और यह छोटा सा बालक तो बड़ा बुद्धिजीवी प्रतीत हो रहा था। उसने जिज्ञासु होकर अपने पिता से कहा, "पिताजी और पूछो न क्या हुआ?"

"ठीक है तो अब बता 8 और 12 को जोड़ने पर कितने आयेंगे?"

"पिताजी ये तो कितना सरल है बीस," बच्चे ने जब प्रसन्नता पूर्वक जवाब दिया तो पिता ख़ुशी के मारे उछल पड़ा। 

"अरे वाह! मेरे शेर।"

उनके उछलने से मिट्टी की स्लेट ज़मीन पर गिर गई और टूट गई। जैसे ही बालक ने टूटी हुई स्लेट को देखा तो वह फूट-फूटकर कर रोने लगा।   

"पिताजी आपने मेरी स्लेट तोड़ दी।"

"बेटा मैंने जानबूझकर नहीं तोड़ी, पर तू रो मत दूसरी ले ले," पिता ने प्रेमपूर्वक कहा। 

"नहीं पिताजी ये एक ही थी मेरे पास। आप दस रुपये दे दो मैं नई ले आऊँगा। अपने बेट का जवाब सुनकर पिता स्तब्ध रह गया। जब उसके पिता कुछ नहीं बोले तो बालक ने फिर से कहा, "पिताजी दे दो न दस रुपये।"

"नहीं है बेटा मेरे पास! क्या है न नौकरी छूटी हुई है, जैसे ही लग जाएगी तुम्हे मैं बहुत सी स्लेट दिलवा दूँगा," जब पिता ने मजबूरी भरी भारी आवाज़ में कहा तो बालक ने भी अपनी बात रख दी, "पिताजी बिना स्लेट मैं पढ़ूँगा कैसे? यही तो थी मेरे पास- एक मात्र। आपके पास हैं न दस रुपये दे दो न पिताजी।"

"नहीं हैं बेटा," पिता ने जब झूठमूठ कहा तो बालक ने कहा, "है न पिताजी आपकी ऊपर वाली जेब में। झूठ क्यों बोल रहे हो?" बेटे की  पारखी नज़र से पिता बच न सका। 

"बेटे ये दस रुपये. . . ये तो मेरी बीड़ी के लिए हैं," जब पिता ने मजबूरी जताई तो पुत्र से रहा नहीं गया।

उसने कहा, "दे दो न पापा आज-आज बीड़ी मत पीना।"

"ठीक है ले जा," पिता ने मायूस होकर जैसे ही पैसे दिए, बालक की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। वह दौड़ता हुआ दूकान की तरफ़ निकल पड़ा और उस पिता को अपने बेटे की पढ़ाई के प्रति ’लगन’ देखकर अपने नशे की क़ुरबानी देनी नागवार न लगी।     
 

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

अँधेरा
|

डॉक्टर की पर्ची दुकानदार को थमा कर भी चच्ची…

अंजुम जी
|

अवसाद कब किसे, क्यों, किस वज़ह से अपना शिकार…

अंडा
|

मिश्रा जी अभी तक'ब्राह्मणत्व' का…

अंधविश्वास
|

प्रत्येक दिन किसी न किसी व्यक्ति की मौत…

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

नज़्म

सांस्कृतिक कथा

लघुकथा

बाल साहित्य कविता

कविता

कहानी

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं