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माँ बताती है

पंजाबी कविता

हिन्दी अनुवाद : सुभाष नीरव

माँ
मेरी ओर देखती है
और बताती है
उसने पहाड़ों से लिया मोर्चा
उनका गुमान तोड़ा
राहों को दिशा दी सीधी
वादियों की खाइयों को पाटा
ऊँचे पर्वतों को देखा घूर कर।

माँ
फुलझड़ी की तरह खिलती है
मुझे बताती है
तेरे जन्म के समय
वह फरहाद की तरह
शिवालिक की पहाड़ियों के बीच
दिन–रात खोदता था नहरें
ताकि हों लहरें–बहरें
ताकि हरे–भरे हों रेगिस्तान
खुशहाल हो सके बंजर ज़मीन।

माँ
मुझे बताती है
और हँसती है
जब तू खेलने–कूदने लगा
गिर-गिर कर दौड़ने लगा
तब वह दरियाओं पर पुल बना
पिचकी छाती चट्टानी सीना तना
ताकि कम हो सकें दूरियाँ–फासले
ताकि गुज़र सकें क़ाफ़िले।

माँ
मुझे बताती है
कोई सोच उसे परेशान करती है
फिर भी बताती है
उसने ऊँचे स्वर में पुकारा
मैंने खेतों को सँवारा
महलों को बनाया
डूबते देश को पार लगाया
और उन्होंने
कितनी सहजता से कहा–
तू तो प्रताड़ना का अधिकारी
युगों–युगों तक
‘तेरी सेवा-अधिकार की बारी’।

माँ
मुझे बताती है
मानो, घोड़े की काठी कसती है
जग में बेशक हैं बेशुमार लोग
पर कहीं–कहीं जूझते हैं जुझारू लोग
और मैं निहारता हूँ
वृद्ध पिता का
झुर्रियों से भरा मुचड़ा–सा चेहरा
आँखों में अंगारों की भाँति
दिपदिपाती लाली।
और अब मैं
बार–बार
माँ के कहे शब्दों पर करता हूँ गौर
और बढ़ता हूँ घोड़े की ओर।

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