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पंडित का ढोंग

लौहपथ गामिनी यान काशी में खड़ी होकर चली तो कोई ख़ास भीड़ न थी, जो काशी में चढ़े थे‚ उन्हें गंगा नदी तक आते-आते सीट मिल गयी। लोग करजोर गंगा मईया की पवित्रता और विशालता के आगे नतमस्तक होते। कितना भव्य और सुहावना दृश्य, कितनी भक्तिमय और पावन समां बँध गया था। बहुत से लोग खिड़कियों से सिक्का फेंक परम्परा का निर्वाह करते, कितनों के सिक्के लौह पुल पर ही अटक जाते। जिनके सिक्के बिना किसी अवरोध के गंगा मईया की सेवा में चले जाते‚ वे अपने को धन्य और भाग्यवान समझते। वहाँ बैठे छात्रगण इसकी आलोचना करते, इसके लिए वे वैज्ञानिक दलील देते। उनका कहना था, "पहले वाले ताँबे के सिक्के पानी को शुद्ध रखने का काम करते थे‚ इसलिए यह परम्परा लायी गयी थी; किन्तु अब के नये वाले सिक्के में शीशा की मात्रा अधिक होने के कारण कई घातक रोगों का कारण बन रहा है। अतः इस प्रथा पर रोक लगनी चाहिए। इससे हम मनुष्यों और जलीय जीवों को नुक़सान हो रहा है।" 

एक अधेड़ उम्र के पंडित जी सपत्नी काशी में चढ़े थे। बड़ी मुश्किल से जगह बना पाये। उनके ललाट पर तिलक, मुख पर तेज, बड़ी शिखा, भारी शरीर, आगे को निकला बड़ा तोंद‚ कुल मिलाकर प्रभावशाली व्यक्तित्व। धोती-कुरता पहने सीट पर आराम से बैठकर आस-पास को संबोधित करके बोले, “आज कल के बच्चे दो आखर पढ़ क्या लेते हैं‚ अपने आगे किसी को आँकते ही नहीं। जो रीत सदियों से चली आ रही है, उसके पीछे गूढ़ रहस्य छिपा रहता है। हमारे पूर्वज भविष्यदर्शी थे। परम्परा के साथ छेड़-छाड़ मुझे बिल्कुल भी पसन्द नहीं।”

पंडितजी के समर्थन में कई और पुराने लोगों का साथ मिल गया। ऐसी स्थिति में रामायण, महाभारत और वेद-पुराण की बातें निकलना लाज़िमी था। भला उस अज्ञात शक्ति को भी कोई ठुकरा सकता है! छात्रगण बहुमत के आगे चुप हो गये। यहाँ अपनी बात कहना भैंस के आगे बीन बजाने जैसा था। 

सहसा ढोल बजने की आवाज़ कानों में आयी। थोड़ी ही देर में एक बच्ची और उसकी माँ रेलगाड़ी के इस डब्बे के दूसरे हिस्से में आयीं। माँ के हाथों में ढोल था, जिसे वह बजा रही थी। कंधे से एक झोला और एक लोहे की रिंग टाँगे थी। काला शरीर, मैली साड़ी रुखे से बाल और मलिन मुख। बच्ची की उम्र यही कोई सात साल की होगी, साँवली-सी दुबली-पतली, फ़्रॉक और पायजामा पहने थी। वह अपनी तोतली आवाज़ में इस समय का मशहूर फ़िल्मी गीत गा रही थी। सिर पर बड़ा-सा टोप जिसके ऊपर केन्द्र में एक लम्बी कपड़े की रस्सी जिसके अंतिम छोर पर कोई भारी वस्तु लगी थी, जिससे सिर हिलाने पर वह रस्सी टोपी से लगी सिर के चारों तरफ़ घूमती थी। लड़की बाँयें हाथ की अंगुली को दायें हाथ से पकड़कर सिर के ऊपर से होते हुए पीछे से घुमाकर पैर के रास्ते से निकालकर पुनः आगे ला देती। लोग अचम्भित देखते रह गये। कई बार यह खेल दिखाने के बाद दूसरा खेल शुरू किया। लोगों को एक तरफ़ कर कुछ दूर तक गलियारा साफ़ कर लिया, हाथों को पीछे की तरफ़ ले जाकर फ़र्श छू लिया। अरे! ये क्या? यह तो उछलकर सीधी खड़ी हो गयी। यह खेल भी कई बार दिखाने के बाद अपनी माँ के कंधे पर टँगा छल्ला लेकर उसमें प्रवेश करने लगी। उस छोटे से छल्ले में अपना पूरा शरीर पार कर लेती। सिर की तरफ़ से छल्ला घुसाती और पैर की तरफ़ से निकाल लेती।

रोज़ के यात्रियों के लिए यह साधारण बात थी। उन्हें यह अक़्सर देखने को मिल जाता था; किन्तु नये यात्रियों के लिए यह किसी अचम्भे से कम न था। यह खेल भी कई बार दिखाने के बाद अपनी माँ के पास गयी। माँ ने झोले से एक एल्युमीनियम का पुराना पचका और काला‚ रीठा हुआ कटोरा निकाल कर उसे दे दिया। वह बच्ची एक-एक व्यक्ति के आगे जाकर कटोरा फैलाकर पैसा माँगती। कई लोगों ने एक-एक, दो-दो रुपये कटोरे में डाल दिये। कुछ लोगों ने इंकार कर दिया। पंडिताइन बच्ची के खेल देखकर बहुत ख़ुश हुई। बच्ची की दीन-हीन दशा से आहत होकर वह दयामयी, वात्सल्यपूर्ण भाव से बोली, “देखो, इती-सी उम्र में कैसे-कैसे कर्म करने को बाध्य है। एक अपनी बेटी है, ताड़ जैसी हो गयी‚ अभी तब चौका-बर्तन करना नहीं सीखी।”

यह कहते हुए उसने झोले से एक दस का नोट निकालकर डाल दिया। लड़की ने ख़ुशी की उन्मत्ता में पंडिताइन के गालों को चूम लिया। पंडिताइन की नसें तन गईं, भौहें सिकुड़ गईं, ग़ुस्से में उसने लड़की को दो-चार थप्पड़ जड़ दिए। लड़की दूर जा गिरी, सारे पैसे छितर-बितर हो गये। कटोरा अलग जा गिरा। पंडिताइन के मुख ने क्रोध से चंडी का रूप ले लिया था। साड़ी से गालों को पोंछती हुई बोली, “मारों इन सत्यनाशियों को, मेरा धर्म भ्रष्ट कर दिया। भगवान इन पापियों को उठा भी नहीं लेते। अब मैं इस ट्रेन में कहाँ नहाऊँ?”

पंडितजी क्रोध से लाल होकर बोले, “जी तो चाहता है कि माँ-बेटी दोनों को बाहर फेंक दूँ। धर्म-कर्म का ज़रा भी ख़्याल नहीं किया, इसका हियाव तो देखो। झोले में गंगालज है, गालों को धो लो।”

छात्रों में से एक बुदबुदाया, “और हाथों को भी, जो मारने में छू गया है।”

लड़की को भीड़ की वज़ह से चोट न आयी किन्तु वह रोने लगी। सात साल की नन्हीं बच्ची छुआ-छूत, ऊँच-नीच, जात-पाँत क्या जाने! बच्चे और कुछ समझें या न पर नफ़रत की भाषा को पहले समझ जाते हैं। ऐसी ही परिस्थितियाँ उनके अंदर नफ़रत और द्वेष पैदा करती हैं। इसके ज़िम्मेदार हम स्वयं हैं।

उसकी माँ ने दौड़ते हुए आकर बच्ची को गोद में उठा लिया और चुप कराने लगी। पंडितजी की बाहर फेंकने की बात पर उसे भी ग़ुस्सा आ गया, “ऐसा क्यों कहते हो बराहमन देवता? आपके घर में बच्चे नहीं हैं क्या?”

पंडितजी भड़के, “हैं, मगर नीच और पाजी नहीं। तुम नीच, अछूत क्या जानो धर्म-कर्म क्या होता है? ऐसे ही ब्राह्मण नहीं हो जाते, अच्छे कर्म और शुद्ध आचरण करना पड़ता है, चार बजे नहाकर वेदाध्ययन करना, धर्म-कर्म से रहना‚ इतना आसान होता तो सभी ब्राह्मण हो जाते। फिर ब्रह्मा जी हमें ही अपने मुख से क्यों उत्पन्न करते, जो सर्वश्रेष्ठ और मानवों में सबसे बुद्धिजीवी होता है। संसार के प्रमुख कुल कार्यों को हमें ही क्यों सौपते?”

वहाँ बैठे तमाम लोगों की सहानुभूति उस माँ-बेटी के प्रति हो गयी। पंडित दम्पत्ति को, थोड़े-से दकियानूसी व्यक्तियों को छोड़कर, सभी मन ही मन कोस रहे थे।

वहाँ बैठे छात्रों में से एक बोला, “ब्राह्मण जी अभी आप जहाँ बैठे हैं‚ वहाँ एक नीच कोढ़ी बुढ़िया बैठी थी, जो काशी में ही उतरी है।”

पंडित उठ खड़े हुए, “राम! राम! इन सत्यनाशी, अधर्मियों के मारे अब ट्रेन में सफ़र करना भी दूभर हो गया है। अच्छा किया बता दिया बेटा!” पंडित जी एक बार पूरे डब्बे के चक्कर लगा आये, कहीं सीट न मिली तो, अंत में हारकर अपने झोले से गंगाजल निकाला और छिड़ककर बैठ गये। पंडिताइन ने अपनी जगह भी पवित्र करा ली।

उनमें से एक दूसरे छात्र ने लड़की को उसकी माँ की गोद से लेकर पंडितजी के सामने खड़ा करके बोला, “ब्राह्मण देवता, थोड़ा-सा जल डालकर इसे भी पवित्र कर दीजिए।”

पंडितजी भड़क गये, “जिसे ईश्वर ने नीच बनाया हो, उसे मैं कैसे पवित्र कर सकता हूँ? चारों वर्णों की उत्पति उन्होंने ही की है।” 

“और जातियों, उपजातियों की?”

“उनकी मर्ज़ी के बग़ैर एक पत्ता भी नहीं हिलता। उनकी इच्छा सर्वोपरि है।”

“फिर पंडिताइन माता ने लड़की को क्यों मारा? हो सकता है यह ईश्वर की इच्छा थी।”

“बिल्कुल नहीं, इन लोगों की शोख़ी है।”

तीसरा छात्र बोला, “अच्छा! ब्राह्मण देवता गंगा नहा के आ रहे हैं?”

“हाँ बेटा, मन एकदम चंगा हो गया। ऐसा लगता था‚ माँ गंगे और काशीनाथ की नगरी में काशीदेव साक्षात् दर्शन दे रहे हों। मन में इतनी शुद्धता और पवित्रता कभी न समाई थी। सच कहा गया है, मोक्ष की नगरी है काशी।”

पंडिताइन भक्ति में विभोर होकर बोली,“जी चाहता है, कहीं न जाऊँ, यही गंगा के तट पर रम जाऊँ। तभी कहूँ फुलमतिया हर तीसरे महीने काशी क्यों आती है? धन्य है काशी नगरी और धन्य है यहाँ के रहने वाले।”

फिर उसी छात्र ने लड़की से पूछा, “तुम कहाँ रहती हो बच्ची?”

उसके पहले उसकी माँ पैसा इकट्ठा कर कटोरे में रखती हुई बोली, “काशी में साहब, वही गंगा तट के बग़ल में मँड़ई बनाकर रहती हूँ। रोज़ एक बार गंगा स्नान हो जाता है।”

दूसरा छात्र मुस्कुराते हुए बोला, “तब तो पंडितजी और पंडिताइन माता को आपसे कोई आपत्ति नहीं। वे दोनों अपने कृत्य पर लज्जित हैं और आपसे क्षमा याचना के प्रार्थी है।”

पंडितजी क्रोधित हुए, “हरगिज़ नहीं, धरती इधर की उधर हो जाए‚ तब भी नहीं। इन नीचों की जगह हमारे चरणों में है, हम मानवों में श्रेष्ठ हैं।”

“फिर यह गंगा स्नान, ध्यान, पूजा, व्रत‚ यह देवता और पत्थरों की पूजा व्यर्थ है, इसका कोई पर्याय नहीं, कोई सार्थकता और उपयोगिता नहीं।”

पंडित कानों पर हाथ रखकर बोले, “राम! राम! कैसी नास्तिकों जैसी बातें करते हो। यही सब मुक्ति का द्वार खोलता है, आदमी का उद्धारक है।”

“आपको कैसे पता की आप मानवों में उत्तम है।”

“वेद-पुराण में साफ़-साफ़ लिखा है।”

“मैंने पढ़ा है पंडित जी, जाति-धर्म नहीं; वर्ण-व्यवस्था के बारे में लिखा है। उसमें वंशानुगत का कोई स्थान नहीं। योग्यता ही चयन की अंतिम निर्णायक प्रक्रिया है। आपने कैसे जाना कि आपमें वह योग्यता है, इसका कोई प्रमाण हो तो दिखाइये।”

इन बातों से अगल-बग़ल बैठे लोगों को आनंद आने लगा था। कई वाद-विवाद को उतारू थे।

पंडित आवेशित हो गए, “अंग्रेजी पढ़ के सनक तो नहीं गये हो! मेरे पिताजी, दादाजी सभी पंडित थे। मैं भी वेद-शास्त्र में निपुण हूँ।”

तीसरा छात्र ने चुटकी ली, “आपके पिताजी और दादाजी पाँचवीं पास थे, इसका मतलब यह नहीं कि वह डिग्रियाँ आपके भी काम आ जायें। आपको ख़ुद से पढ़कर अपनी डिग्री हासिल करनी होगी। उनकी सनद पर आप इठला नहीं सकते। मान लिया कि आपको वेद-पुराण का ज्ञान है, डिग्रियाँ हैं, तो पंडिताइन माता किस बूते पर चहक रही हैं, उनसे वेद का एक मंत्र उच्चारण करवाइये।”

पंडिताइन जलकर बोली, “बेटा, मैं अनपढ़ हूँ, अँगूठा लगाती हूँ। वेद-पुरान का मुझे कुछ ज्ञान नहीं।”

पहले छात्र ने पूछा, “तब आपने कैसे जान लिया कि लड़की अछूत है और आपका धर्म भ्रष्ट हो गया?”

“यह भी कोई पूछने की बात है बेटा! आदमी समाज, पास-पड़ोस, घर-परिवार से सब सीख जाता है।”

दूसरा छात्र ने फिर चुटकी ली, “इसका मतलब कर्म से, वर्णानुसार आप ब्राह्मण नहीं है।”

पंडित ग़ुस्से में जल-भुन गए, “ज़ुबान सम्भाल कर बोलो बच्चे! ब्राह्मणों का कोप तुम नहीं जानते!”

“वे ब्राह्मण दूसरे थे, जो शिक्षा दान देते थे और भिक्षाटन कर अपना जीवन निर्वाह करते थे।”

“तुम लोग ब्राह्मण को क्या पहचानोगे! अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है!”

पहले छात्र ने दलील देते हुए पूछा, “प्रमाण दीजिए की आप दोनों ब्राह्मण हैं‚ तो ज़रूर पहचान लेंगे। ये काशी नगरी है। यहाँ हर कोई टीका लगाये, भभूत रमाये, जटा बढ़ाये गेरुये वस्त्र धारण किये घूमता है। किसी के माथे पर लिखा नहीं रहता।”

पंडित ने उत्तेजित होकर दस-पन्द्रह वेद और गीता के श्लोक सुना दिये। ढोलक बजाने वाली औरत ने भी दस-बारह श्लोक सुना दिए। काशी घाट पर, साधु-सन्तों, भक्तों का तांता लगा रहता है, दिन-रात उनके संसर्ग और मुख से यही सुनते-सुनते याद हो गया था। छोटी बच्ची ने भी माँ की देखा-देखी आँसू पोंछती हुई अपनी तोतली बोली में दो-तीन श्लोक सुना दिए।

चहुँओर तालियाँ बजीं। सैकड़ों लोग तमाशा बना के देखने लगे। हो-हल्ला सुनकर चारों तरफ़ से लोगों गए; यहाँ भीड़ इकट्ठी हो गई।

दूसरा छात्र मुस्कुराया, “क्यों पंडित जी, अब तो क्षमा प्रार्थी हो? पंडिताइन से कहिए क्षमा माँग कर अपनी कीर्ति उज्ज्वल करें।”

“दो-चार श्लोक रट लेने से नीच ऊँच नहीं हो जाता।”

एक दर्शक ने पूछा, “फिर काहे से होता है महाराज?”

“ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर।”

“आपने लिया है।”

“और नहीं तो क्या?”

“हम कैसे माने?”

“मत मानो, तुम्हें मानने को कौन कहता है?”

“आपका झोला जुलाहे का बनाया हुआ है, जो नीच होते हैं। ट्रेन के कारखानों में बहुत से नीच लोग काम करते हैं। ट्रेन पर बैठना छोड़ दीजिए। किसान अनाज उपजाता है, आपके घर में जो सूप है, उसे डोम बनाता है।”

“हाँ, मैं जानता हूँ, इसलिए शुद्ध करके प्रयोग करता हूँ।”

दूसरा दर्शक ने व्यंग्य कसा, “बच्ची को उसी विधि से शुद्ध कर दीजिए।”

“असम्भव!”

एक नवयौवना युवती बोली, “भला ऐसा क्यों?”

“इसे समझने में तुम्हें वर्षों लग जाएँगे। ब्रह्मतेज समझना सबके बस की बात नहीं।”

युवती आवेश में आकर कहा, “आप केवल उन्हीं चीज़ों को शुद्ध और पवित्र कर सकते हैं‚ जिनसे आपको प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से फ़ायदा है, जिनके बिना आपका काम नहीं चल सकता।”

तीसरा दर्शक भड़का, “मुठमर्दी की भी हद होती है पंडित जी, आप तो एक दम बेशर्मी और हठधर्मी पर उतर आये हैं।”

पंडितजी ने स्वयं को तमाशा बनते देख ज़ोरदार तर्क दिया, “धर्म और ईश्वर को समझना इतना सहज होता तो, तप, भक्ति और कर्म की आवश्यकता ही क्यों होती? यही नीच और ऊँच का फ़र्क़ करता है। जो वासनाओं से ग्रसित और सांसारिकता में लिप्त है‚ वह ईश्वर और ब्रह्म को क्या समझेगा! ब्रह्म को जानने वाला ही ब्राह्मण है।”

गाड़ी एक हाल्ट स्टेशन से खड़ी होकर चली थी। कई नये लोग चढ़ गये। एक जगह भीड़ इकट्ठी देख उन्हें कुतूहल हुआ। वे भी देखने चले आये। नीचे वाली सीट पर एक तरफ़ पाँच लोग बैठे थे। जिनमें दो अधेड़ और तीन वृद्ध थे। दूसरी तरफ़ तीन कॉलेज के छात्र थे, जिनकी उम्र पच्चीस से नीचे की रही होगी। वहीं बीच वाले छात्र के आगे लड़की खड़ी थी और सीट के अंतिम छोर पर उसकी माँ खड़ी थी। उसी सीट पर दो और नौजवान व्यक्ति बैठे थे, जो रोगग्रस्त थे और वाराणसी से दवा लेकर लौट रहे थे। उनके चारों तरफ़ भीड़ इकट्ठा थी। ऊपर वाली सीट पर भी पाँच-पाँच लोग बैठे थे। दूसरी तरफ़ एकल सीट पर नवयुवती बैठी थी। ठीक उसके सामने एक बुज़ुर्ग महिला थी, जो पंडित जी के विचारों से सहमत थी; और विपक्षियों को मन-ही-मन कोस रही थी। 

नवयात्रियों में से एक महाशय भीड़ के बीच में आकर पंडित जी से बोले, “अरे ढोलू पाण्डे किसपर इतना ग़ुस्सा उतार रहे हो?” 

पंडित जी इस व्यक्ति को देखकर सहम गये। वह व्यक्ति पंडिताइन की तरफ़ इशारा करके बोला, “यह भाभीजी हैं न? कई साल हो गये आपको घर गये। शुरू में घरवाले नाराज़ थे; किन्तु अब तो राजी हैं। आते क्यों नहीं? जहाँ आप नौकरी करते थे, वहीं भाभीजी सफाई वाली थीं, है न भाभीजी?”

पंडिताइन ने सफ़ाई में सिर हिलाया। शरीर से पसीना टपक रहा था‚ झूठ न बोल सकी। शर्म और ग्लानि से मुखमण्डल लाल हो गया था। गर्दन ऊपर न कर सकी।

पंडित के बचपन का दोस्त आगे बोला, “आपकी छोटी जाति के कारण इनके घरवाले आजतक इनसे ख़फ़ा हैं और ये भी पचीस सालों में एक बार भी गाँव नहीं गये।”

ट्रेन में एकाएक शोर मच गया। वहाँ मौजूद भीड़ ठहाका मार के हँसने लगी। कई लोगों ने उस आगंतुक यात्री को गले लगा लिया। पंडितजी पर चारों तरफ़ से अंगुली उठने लगी। एक ही रँगा हुआ सियार है। बातें बनाना कोई इनसे सीखे। अरे! नहीं भई, इसी को ब्रह्मतेज और ब्रह्मज्ञान कहते हैं। यह समझना सबके बूते की बात नहीं, केवल ब्राह्मण ही ऐसा कर सकते हैं।

पंडितजी शर्म के मारे सिर न उठा सके। ज़िन्दगी में पहली बार इतनी बुरी तरह से फँसे थे। रूपमतिया से शादी की थी तब भी इतना बेइज़्ज़त न होना पड़ा था। चुप रहने के सिवा और कोई चारा न था। न जाने यह कमबख़्त इसी वक्त कहाँ से आ निकला। इन लम्पट, मूर्खों को परिस्थिति का ख़्याल भी नहीं रहता। उन्हें अपने पांडित्य के अलाप पर पश्चाताप होने लगा। अब तो अगले स्टेशन पर उतर जाना ही उचित रहेगा। वहाँ से घण्टा-दो घण्टा बाद दूसरी गाड़ी पकड़ के चला जाऊँगा। यह ज़िल्लत अब और नहीं सही जाती। यह अपमान और बेइज़्ज़ती मरते दम तक याद रहेगी।

सहसा पहला छात्र हँसी रोककर बोला, “क्यों पंडितजी, बेशर्मी छोड़कर अब तो माफ़ी माँग लो, आप भी पंडिताइन माता। प्रायश्चित् के लिए क्षमा माँगने में शर्म की नहीं, गर्व की बात है।”

थोड़ी देर में पंडित और पंडिताइन सिर झुकाये बच्ची और माँ से करजोर क्षमा माँग रहे थे। उनके पहचान का व्यक्ति अलग खड़ा था। वह वस्तुस्थिति को समझने की कोशिश कर रहा था। तरह-तरह के तानों से पंडित और पंडिताइन का कलेजा छलनी हो रहा था। 

अगले स्टेशन पर दोनों ने उतर कर ठंडी साँस ली। जब गाड़ी चली गयी तो दोनों पास के बेंच पर ऐसे बैठे मानों मछली काँटे में फँसकर निकल आयी हो।

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