10 मिनट में डिलीवरी भारतीय संस्कृति के ख़िलाफ़
हास्य-व्यंग्य | हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी वीरेन्द्र बहादुर सिंह1 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
नवरालाल ने ख़ुशी जताते हुए कहा, “दस मिनट में डिलीवरी बंद हो गई।”
फालतूचंद ने तुरंत पलटकर सवाल किया, “तो अब कितने मिनट में डिलीवरी होगी? पंद्रह या बीस?” फालतूचंद की इस गुगली पर नवरालाल क्लीन बोल्ड हो गए।
“यार, यह बात तो सही है। सरकार ने 10 मिनट में डिलीवरी बंद करने की बात तो कह दी, लेकिन फिर कितने मिनट में डिलीवरी करनी है, यह बताया ही नहीं। आधा घंटा, एक घंटा या चार घंटे, ऐसा कोई स्पष्ट फ़ैसला किया ही नहीं।”
फालतूचंद मूँछों में ही हँसने लगे।
“अरे भोले भाई, यही तो सरकार की चालाकी है। हमारे देश में अगर कोई काम फटाफट हो जाए, तो वह हमारी सरकारी संस्कृति के ख़िलाफ़ है। जिस देश में सरकारी फ़ाइलें एक मेज़ से दूसरी मेज़ तक पहुँचने में सालों का सफ़र तय करती हों, जिस देश में सड़क के गड्ढे भरने में छह महीने लग जाते हों, जिस देश में हर घर के नल में पीने का साफ़ पानी पहुँचने में 75 साल से ज़्यादा लग जाते हों, उस देश में लोगों को दस मिनट में डिलीवरी की आदत डालना ही ग़लत है।”
नवरालाल नाराज़ होकर बोले, “आप यार, हर बात में सरकार को बीच में ले आते हो। हमारे महान लोकतांत्रिक देश में सरकार बिलकुल वैसा ही व्यवहार करती है, जैसा जनता करती है। आप समझिए, जनता इंजन है और सरकार पीछे जुड़ा हुआ डिब्बा। जिस रफ़्तार से इंजन दौड़ता है, उसी रफ़्तार से डिब्बा भी चलता है। कभी देखा है कि इंजन 18 किलोमीटर प्रति घंटा चले और डिब्बा 19 किलोमीटर प्रति घंटा?
“हमारे देश में लोग पान की दुकान पर यूँ ही एक घंटा बिता देते हैं, महिलाएँ दो घंटे के कार्यक्रम के लिए कौन सी साड़ी पहननी है, यह तय करने में तीन घंटे लगा देती हैं। हमारी जनता मॉल से पाँच रुपए की चीज़ भी न लेनी हो, तब भी ऐसी की ठंडक खाने में तीन घंटे बिता देती है। रिसेप्शन के स्टेज पर आने से पहले दूल्हा-दुल्हन तैयार होने और फोटो सेशन में चार घंटे लगा देते हैं। लोग घर बैठकर टीवी देखकर जल्दी-जल्दी दिमाग़ ख़राब करने के बजाय नेक काम करने के नाम पर थिएटर जाकर चार घंटे बर्बाद कर देते हैं। और कई कलाकार तो एक ही सीन में ठीक से अभिनय लाने में पूरी की पूरी कैरियर खपा देते हैं।
“ऐसे देश में दस मिनट में डिलीवरी चाहिए थी, लेकिन किसे?
“मैं तो कहता हूँ, यह 10 मिनट में डिलीवरी की व्यवस्था भारतीय संस्कृति के बिलकुल ख़िलाफ़ थी। यह सिस्टम बंद हुआ, तो समझो हमारी संस्कृति बच गई।”
फालतूचंद ने बिलकुल आराम से जम्हाई लेते हुए कहा, “मुझे तो इस 10 मिनट की डिलीवरी बंद होने में एक ही बड़ा फ़ायदा दिखता है। अब तेज़ डिलीवरी नहीं होगी, मतलब पैसे ख़र्च होने की रफ़्तार भी उतनी ही कम हो जाएगी, है न?”
नवरालाल सिर हिलाते हुए बोले, “भाई, यह भूल ही जाओ। मध्यमवर्गीय आदमी की आमदनी की रफ़्तार कभी बढ़ने वाली नहीं है, लेकिन ख़र्च करने की रफ़्तार किसी न किसी तरह बढ़ती ही रहेगी। इससे कोई नहीं बच सकता। मध्यमवर्ग की यह हालत भी पूरी तरह भारतीय संस्कृति के अनुकूल ही है।”
फालतूचंद ने एकदम तेज़ी से लंबी साँस छोड़ी।
(सरकारी दफ़्तरों की घड़ियों में मिनट की सूई होती ही नहीं, सीधे घंटे की सूई ही होती है)
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