वसंत-ग्रीष्म के मजियारे आँगन से
काव्य साहित्य | कविता वीरेन्द्र बहादुर सिंह15 May 2026 (अंक: 297, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
चैत्र की उँगलियाँ
धीरे-धीरे छूट रही हैं
जैसे माँ की गोद से उतरता कोई बच्चा
और वैशाख की धूप
दूर खड़ी मुस्कुरा रही है,
पर उस मुस्कान में
एक अनकहा इंतज़ार भी है।
नीम के नीचे बैठा चैत्र
अपनी हरियाली समेट रहा है,
पत्तों की सरसराहट में
उसका मन बोलता है
मैं जा रहा हूँ,
पर क्या सच में जाता हूँ?
आम की डाल पर
अधखिली ख़ुश्बू ठहरी है,
वह जानती है
कि उसका जन्म चैत्र में हुआ,
पर उसका यौवन
वैशाख के नाम लिखा जाएगा।
यही तो विरह है
जन्म किसी का,
जीवन किसी और का।
कोयल की पहली कूक
अब उतनी मधुर नहीं लगती,
उसमें कहीं छुपा है
बिछड़ने का स्वर,
जैसे कोई प्रेम
पूरा होने से पहले ही
ऋतु बदल दे।
सेमल के लाल फूल
धरती पर बिखरते हुए पूछते हैं
क्या सौंदर्य का अंत ही
उसकी नियति है?
और हवा
चुपचाप उन्हें दूर ले जाती है,
जैसे यादें
जिन्हें कोई रोक नहीं सकता।
गरमाला के झरते फूल
किसी अधूरी चिट्ठी जैसे हैं,
जिसे चैत्र ने लिखा
और वैशाख पढ़ भी न पाया।
उनमें रंग है,
पर अर्थ
हवा में खो गया।
मोगरे की ख़ुश्बू
अब धीरे-धीरे बढ़ रही है,
पर उसमें भी
एक हल्की उदासी है
जैसे नया प्रेम
पुराने के निशान छिपा रहा हो।
धूप का रंग गहरा हो गया है,
छाँव लंबी हो चली है,
और इस फैलती गर्मी में
चैत्र की शीतलता
कहीं भीतर सिमटती जा रही है।
पत्ते गिरते हैं
धीरे, चुपचाप,
जैसे कोई बिना विदा कहे चला जाए।
और नई कोंपलें फूटती हैं
जैसे कोई नया सम्बन्ध
पुराने के दर्द पर उग आए।
पर क्या हर नया आरंभ
पुराने का अंत नहीं होता?
रेगिस्तान की हवा में
एक सूनी आवाज़ गूँजती है,
समुद्र की लहरें भी
आज कुछ थकी-सी हैं,
और जंगल के पेड़
आपस में धीमे-धीमे कह रहे हैं
हर मिलन के भीतर
एक विरह छिपा होता है।
चैत्र अब दूर जा रहा है,
उसकी चादर पर
वैशाख की धूल जम चुकी है,
और दोनों के बीच
एक अदृश्य रेखा खिंच गई है
जिसे कोई देख नहीं सकता,
पर हर कोई महसूस करता है।
आम के फल
अब नववधू की तरह सज रहे हैं,
पर उनके भीतर
चैत्र का स्पर्श अब भी है
एक स्मृति,
जो कभी पूरी तरह जाती नहीं।
नीम की निम्बोलियाँ
हवा में झूमती हैं,
पर हर झोंके में
एक प्रश्न है
क्या हर हरियाली
कभी न कभी पीली नहीं होती?
तब मन कह उठता है
ऋतुएँ ईर्ष्या नहीं करतीं,
वे बिछड़ती भी हैं
तो मुस्कुराकर।
पर यह मुस्कान ही तो
सबसे गहरा विरह है
जहाँ आँसू दिखते नहीं,
पर भीतर
पूरा मौसम रोता है।
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