अन्तरजाल पर
साहित्य-प्रेमियों की विश्राम-स्थली

काव्य साहित्य

कविता गीत-नवगीत गीतिका दोहे कविता - मुक्तक कविता - क्षणिका कवित-माहिया लोक गीत कविता - हाइकु कविता-तांका कविता-चोका कविता-सेदोका महाकाव्य चम्पू-काव्य खण्डकाव्य

शायरी

ग़ज़ल नज़्म रुबाई क़ता सजल

कथा-साहित्य

कहानी लघुकथा सांस्कृतिक कथा लोक कथा उपन्यास

हास्य/व्यंग्य

हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी हास्य व्यंग्य कविता

अनूदित साहित्य

अनूदित कविता अनूदित कहानी अनूदित लघुकथा अनूदित लोक कथा अनूदित आलेख

आलेख

साहित्यिक सांस्कृतिक आलेख सामाजिक चिन्तन शोध निबन्ध ललित निबन्ध हाइबुन काम की बात ऐतिहासिक सिनेमा और साहित्य सिनेमा चर्चा ललित कला स्वास्थ्य

सम्पादकीय

सम्पादकीय सूची

संस्मरण

आप-बीती स्मृति लेख व्यक्ति चित्र आत्मकथा यात्रा वृत्तांत डायरी रेखाचित्र बच्चों के मुख से बड़ों के मुख से यात्रा संस्मरण रिपोर्ताज

बाल साहित्य

बाल साहित्य कविता बाल साहित्य कहानी बाल साहित्य लघुकथा बाल साहित्य नाटक बाल साहित्य आलेख किशोर साहित्य कविता किशोर साहित्य कहानी किशोर साहित्य लघुकथा किशोर हास्य व्यंग्य आलेख-कहानी किशोर हास्य व्यंग्य कविता किशोर साहित्य नाटक किशोर साहित्य आलेख

नाट्य-साहित्य

नाटक एकांकी काव्य नाटक प्रहसन

अन्य

पत्र कार्यक्रम रिपोर्ट सम्पादकीय प्रतिक्रिया पर्यटन

साक्षात्कार

बात-चीत

समीक्षा

पुस्तक समीक्षा पुस्तक चर्चा रचना समीक्षा
कॉपीराइट © साहित्य कुंज. सर्वाधिकार सुरक्षित

गैस कंट्रोल और गेस्ट कंट्रोल

 

 

देशभक्ति के साथ-साथ चारों ओर फैले गैस-भक्ति के माहौल में आज सुबह मैंने हमारे पराक्रमी पिरथी काका और हमेशा हड़बड़ाए रहने वाली वबाला काकी को नए-नकोर कपड़ों में हाथ में टिफ़िन लेकर घर से निकलते देखा। मैं भी बिल्ली नहीं, बल्कि बिलौटे की तरह रास्ता काटकर उनके सामने आ गया।

मैंने पूछा, “काका, इतना सज-धजकर और हाथ में टिफ़िन लेकर काकी के साथ कहाँ जा रहे हो?”

पिरथक काका हँसते हुए बोले, “तेरी काकी तो लिमिटेड कंपनी है। आज हम गीधु के इकलौते बेटे की शादी में जा रहे हैं।”

मुझे आश्चर्य हुआ, मैंने पूछा, “शादी में जाना ठीक है, लेकिन ऐसे टिफ़िन लेकर क्यों जा रहे हो, जैसे किसी मरीज़ को खाना देने अस्पताल जा रहे हो?”

पिरथी काका गुनगुनाते हुए बोले, “हम जी के क्या करेंगे, जब गैस ही ख़त्म गया। मालूम न था इतनी मुश्किल है गैस की लाइन।”

मैंने बीच में रोककर पूछा, “सीधी बात बताओ, टिफ़िन क्यों?”

काका बोले, “गीधु ने 200 मेहमान बुलाए थे, लेकिन गैस की क़िल्लत के कारण कैटरिंग वाला आख़िरी समय पर मुकर गया। बोला, इतने लोगों के लिए गैस सिलेंडर नहीं हैं। मजबूरी में गीधु ने व्हाट्सऐप पर मैसेज भेज दिया, ‘शादी में ज़रूर आइए, लेकिन अपना टिफ़िन साथ लाना। मिठाई और नमकीन हमारी तरफ़ से होगा।’ बस, हम भी अपना-अपना टिफ़िन लेकर जा रहे हैं।”

काका-काकी को जाते देख मैं सोचने लगा और गुनगुनाया, “जिया बेक़रार है, गैस की तकरार है।”

इसी बीच महल्ले के कोने पर गैस सिलेंडर की लंबी लाइन दिखी। एक बोर्ड लगा था, “यहाँ ऑनलाइन गैस मिलेगी (मतलब जो लाइन में खड़ा रहेगा उसे गैस मिलेगी)।”

अगले दिन मुझे भी एक शादी में जाना था। निमंत्रण में लिखा था, “दोपहर 1 बजे भोजन।” लेकिन शादी की रस्में ख़त्म होने के बाद भी खाने का कोई अतापता नहीं। भूख से हालत ख़राब थी। मैंने एक जानकार से पूछा, “इतनी देर क्यों?” 
वह बोला, “चार सिलेंडर ख़त्म हो गए, आधी ही रसोई बनी। अब चार और सिलेंडर ब्लैक में मँगवाए जा रहे हैं। इसलिए भोजन-दार से मिलेगा।”

मैंने मन में सोचा कि अमेरिका और ईरान लड़ें तो अलग बात, लेकिन यहाँ तो हमें शादी में भी इंतज़ार करना पड़ रहा है! 
अब तो हालत यह है कि गैस कंट्रोल के साथ-साथ गेस्ट कंट्रोल भी लागू करना पड़ रहा है। पिरथी काका ने रिश्तेदारों को साफ़ कह दिया, “छुट्टियों में मत आना, गैस नहीं है, नहीं तो हमें ही गालियाँ सहनी पड़ेंगी।”

गैस की कमी के कारण अब लोग चूल्हे, सिगड़ी या कोयले पर रोटी बना रहे हैं। लेकिन महाराष्ट्र के विदर्भ में तो बिना ईंधन और तवे के रोटी बनाने का तरीक़ा देखा गया!

मैंने काका को वीडियो दिखाया, महिलाएँ सड़क पर रोटी सेंक रही थीं और कुछ लोग कार के गर्म बोनट पर।

काका हैरान होकर बोले, “इसे रोटी नहीं, रोडली कहना चाहिए।”

मैंने मज़ाक़ में कहा, “वहां मुर्ग़ियाँ अंडा नहीं, सीधे आमलेट देती हैं।”

काका ने मुझे डाँटते हुए कहा, “इतने बड़े-बड़े झूठ बोलता है, क्या तुझे ‘ट्रम्प’ हो गया है?”

मैंने हँसते हुए कहा, “जो भी हो, गैस हो या न हो, खाना तो बनाना ही पड़ेगा।”

अन्य संबंधित लेख/रचनाएं

टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी

कविता

किशोर साहित्य कहानी

सामाजिक आलेख

चिन्तन

कहानी

ऐतिहासिक

ललित कला

बाल साहित्य कहानी

सांस्कृतिक आलेख

लघुकथा

काम की बात

साहित्यिक आलेख

सिनेमा और साहित्य

स्वास्थ्य

सिनेमा चर्चा

पुस्तक चर्चा

विडियो

उपलब्ध नहीं

ऑडियो

उपलब्ध नहीं