पालिटिक्स में हँसी के लिए और प्रदूषण में खाँसी के लिए तैयार रहना पड़ता है
हास्य-व्यंग्य | हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी वीरेन्द्र बहादुर सिंह1 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
दुश्मन वार करता है और डॉक्टर इलाज करता है। इलाज में देर हो जाए तो मरीज़ की हालत बिगड़ जाती है। बीमार से कहा जाता है कि दवा-दारू कराओ, लेकिन बिना पर्ची के दवा नहीं मिलती और गुजरात तथा बिहार में बिना प्रतिबंध के दारू नहीं मिलती। ये तीनों पीछा नहीं छोड़ते-मरीज़, वर्दी और सर्दी। महँगे इलाज में काट-छाँट होती है और आख़िरकार जेब पर ही कैंची चलती है। मेडिकल केयर और बीवी-केयर में क्या फ़र्क़ है? डॉक्टर मरीज़ की देखभाल करे तो मेडिकल केयर कहलाती है और पत्नी अगर बीमार पति की भी देखभाल करे तो उसे कहते हैं बीवी-केयर।
बीमारी और इलाज से जुड़े ऐसे ही अजीब-गरीब तुक दिमाग़ में घूम रहे थे कि तभी पिरथी काका खाँसते-खाँसते निकल आए। मैंने पूछा, “इतनी बलगम और खाँसी है, फिर भी दवा क्यों नहीं लेते? मुंबई में एक पाश इलाक़े का नाम ‘कफ परेड’ है, पता है न? आपकी छाती में जमे कफ के कारण जब ‘ठों . . . ठों . . . ठों . . . ’ खाँसी आती है, तो लगता है जैसे छाती में ही ‘कफ परेड’ चल रही है। दवा क्यों नहीं लेते? ज़रा बैठिए, मैं कफ सिरप पिला देता हूँ।”
सिरप का नाम सुनते ही, जैसे किसी ने कान में पिघला सीसा डाल दिया हो, वैसे भड़क उठे काका, “खाँसी निकालने के लिए मुझे फाँसी देनी है क्या? सिरप पीकर कितनों के बुरे हाल हो गए, पता है? मैं तो सिरप-विरप कुछ नहीं लेने वाला। आदमी दवा से मरे या ख़राब हवा से? चैनलिया कथाकारों की भाषा में कहूँ तो आदमी को सिरप मारता है और साँप तार देता है . . .”
दिल्ली के प्रदूषण की महिमा देखिए। अभी काका की इस ‘खाँसी-कथा’ की बात चल ही रही थी कि हमारे ही हाउसिंग काम्प्लेक्स में रहने वाले मशहूर डॉक्टर तनसुखराय खाँसते-खाँसते लिफ़्ट से उतरे और पार्क की हुई कार की ओर बढ़े। मैंने पूछा, “साहब, कहीं जा रहे हैं?”
डॉक्टर बोले, “खाँसी बहुत बढ़ गई है, इसलिए सरकारी अस्पताल के डॉक्टर के पास दवा लेने जा रहा हूँ।”
मैंने हैरानी से पूछा, “आप ख़ुद डॉक्टर होकर सरकारी अस्पताल क्यों जा रहे हैं? आप अपना इलाज ख़ुद क्यों नहीं करते?”
डॉक्टर बोले, “मेरी फ़ीस बहुत ज़्यादा है। जो मुझे ही न पड़े, उससे बेहतर है सरकारी अस्पताल से मुफ़्त दवा ले आऊँ।”
डॉक्टर के जाने के बाद काका बोले, “देखा? बड़े-बड़े प्राइवेट डॉक्टर कितनी ऊँची फ़ीस लेते हैं! ऐसी फ़ीस उन्हें ख़ुद को भी नहीं पड़ती, तो हमारे जैसों को कहाँ से पड़ेगी?”
मैंने काका से कहा, “आप सँभलकर रहिए, डॉक्टर साहब को मुँह पर सच्चाई सुना कर नाराज़ मत कर दीजिए।”
काका बोले, “इसमें क्या है? डॉक्टर को नाराज़ क्यों न करें?”
मैंने कहा, “डायरे में हास्य कलाकार ने क्या कहा था, याद है न? बीमारी आती है तो लोग कहते हैं कि ऊपरवाला नाराज़ है। इसलिए भगवान नाराज़ हो तो डॉक्टर के पास जाना पड़ता है, लेकिन डॉक्टर नाराज़ हो जाए तो कहीं सीधे भगवान के पास ही न भेज दे, यही डर रहता है।”
मेरी बात सुनकर काका हँस पड़े, मगर फिर खाँसी चढ़ गई। बोले, “ठीक है भाई, ठीक है . . . पालिटिक्स में हँसी के लिए तैयार रहना पड़ता है और प्रदूषण में खाँसी के लिए तैयार रहना पड़ता है . . . ”
खाने से दवाखाने तक
पहले छोटे-छोटे गाँवों में कहीं-कहीं नाड़ीवैद्य के नाम के बोर्ड दिखते थे। अब तो तरह-तरह के ई-नाड़ीवैद्य (इलास्टिक वैद्य) उग आए हैं। स्वमूत्र प्रयोग कराने वाले एक वैद्यराज ने अपने क्लिनिक के बाहर बोर्ड लगाया था—रेलोपैथी क्लिनिक। होम्योपैथी की मीठी गोलियाँ खिलाकर कम-से-कम तीन-चार महिला मरीज़ों को दिल दे चुके (हार्ट ट्रांसप्लांट!) एक डॉक्टर के बोर्ड पर किसी ने शरारत कर दी। होम्योपैथी की जगह चाक से लिख दिया गया—रोमियोपैथी।
पिछले हफ़्ते ही हमारी गली के मोड़ पर एक नया दवाखाना खुला, दरवाज़े पर बोर्ड लगा था—पेट डॉक्टर।
एक दिन ऐसा हुआ कि खाने और दवाखाने के बीच अटूट रिश्ता बना चुकी पड़ोसन ठमकू भाभी अचानक पेट डॉक्टर के यहाँ जा पहुँचीं, लेकिन जितनी तेज़ी से गई थीं, से दोगुनी रफ़्तार से लौट आईं। मैंने पूछा, “क्या हुआ भाभी, ऐसे अचानक तूफ़ान की तरह पेट डॉक्टर के यहाँ क्यों चक्कर लगा आईं?”
मुरझाए चेहरे और धीमी आवाज़ में भाभी ने अपने पैरों की ओर देखते हुए कहा, “आप तो अपने हैं, इसलिए अपनी बेवुक़ूफ़ी बता देती हूँ। रात को वड़े खाए थे, गैस हो गई, पेट में दर्द उठा, तो सुबह-सुबह पेट डॉक्टर को पेट दिखाने दौड़ी। लेकिन उस डॉक्टर ने सबके सामने मुझे डाँट दिया। मैं ‘पेट’ डॉक्टर हूँ यानी पालतू जानवरों का डॉक्टर। आपका पेट मैं कहाँ से देखूँ?”
लोग बीमार पड़ें तो उनकी ख़बर लेने जाते हैं, मगर मेरा हाल यह है कि जिस दिन मैं ठीक रहता हूँ, उसी दिन कई लोग मेरी ख़बर ले जाते हैं। दो दिन पहले दिल की धड़कनें सरकारी चाल से धीमी चलने लगीं। मैं सीधे पहुँचा एक जाने-माने हार्ट स्पेशलिस्ट के पास। डॉक्टर ने छाती पर स्टेथोस्कोप रखा और जाँच शुरू की। फिर आँखें बंद कर सिर हिलाने लगे। मुझे चिंता हुई। आधा उठकर मैंने पूछा, “डॉक्टर, आप दिल की धड़कन सुन रहे हैं या क्या कर रहे हैं?”
डॉक्टर ने आँखें खोलकर कहा, “कमाल हो गया। आप पहले से संगीत-प्रेमी रहे हैं। जैसे ही स्टेथोस्कोप रखा, तो दिल की धड़कनों में ‘दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है, आख़िर इस दर्द की दवा क्या है . . . ’ की धुन सुनाई दे रही है।”
मुझे झटका लगा। मैंने डॉक्टर के दोनों कानों से स्टेथोस्कोप निकालकर कहा, “संगीत की धुन कहाँ ढूँढ़ रहे हैं? स्टेथोस्कोप की जगह वॉकमैन की ईयरफोन लगाओगे तो यही गीत सुनाई देगा न?”
ऐसे डॉक्टर मिल जाएँ तो हार्ट अटैक के बजाय आर्ट अटैक आ जाए!
दिल्ली में नया-नया आया था, तो पास के एक डॉक्टर से दवा लेता था। डॉक्टर इतने उतावले कि जाँच पूरी होने से पहले ही उल्टे-सीधे अक्षरों में पर्ची घसीट देते। उनके अक्षर सिर्फ़ केमिस्ट ही पढ़ पाता। हुआ यूँ कि हमारे महल्ले की एक लड़की से डॉक्टर साहब प्रेम में पड़ गए। दिन में चार-पाँच चिट्ठियाँ लिखकर किसी तरह उसे पहुँचाते। रात को लड़की सारी चिट्ठियाँ समेटकर चुपचाप केमिस्ट की दुकान पहुँच जाती और एक-एक करके सब पढ़वा लेती। यह सिलसिला लगभग दो साल तक चला। फिर क्या हुआ? लड़की और केमिस्ट की शादी हो गई।
कभी-कभी सरकारी अस्पतालों में भी दिलफेंक डॉक्टर मिल जाते हैं। एक परिचित नर्स नंदु ने एक बार कहा, “हमारे अस्पताल में नाइट ड्यूटी वाली नर्सों को रोज़ सेब खाने की सलाह दी जाती है।”
मैंने पूछा, “ऐसा नियम क्यों?”
नर्स बोली, “वह अंग्रेज़ी कहावत सुनी है न, रोज़ एक सेब खाओ, डॉक्टर दूर रहेंगे।”
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
10 मिनट में डिलीवरी भारतीय संस्कृति के ख़िलाफ़
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी | वीरेन्द्र बहादुर सिंहनवरालाल ने ख़ुशी जताते हुए कहा, “दस…
60 साल का नौजवान
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी | समीक्षा तैलंगरामावतर और मैं लगभग एक ही उम्र के थे। मैंने…
(ब)जट : यमला पगला दीवाना
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी | अमित शर्माप्रतिवर्ष संसद में आम बजट पेश किया जाता…
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
- 10 मिनट में डिलीवरी भारतीय संस्कृति के ख़िलाफ़
- इंसानों को सीमाएँ रोकती हैं, भूतों को नहीं
- इस साल के अंत का सूत्र: वन नेशन, वन पार्टी
- कंडक्टर ने सीटी बजाई और फिर कलाकार बनकर डंका बजाया
- किसानों को राहत के बजट में 50 प्रतिशत रील के लिए
- गए ज़ख़्म जाग, मेरे सीने में आग, लगी साँस-साँस तपने . . .
- नई स्कीम घोषित: विवाह उपस्थिति सहायता अनुदान योजना
- पालिटिक्स में हँसी के लिए और प्रदूषण में खाँसी के लिए तैयार रहना पड़ता है
- पेंशन लेने का, टेंशन देने का
- प्रयोग बकनली का और बकबक नली का
- बारहवीं के बाद का बवाल
- मैच देखने का महासुख
- राजा सिंह के सहयोगी नेता नेवला कुमार के चुनाव जीतने का रहस्य
- शिक्षा में नई डिग्री—बीएलओ बीएड
- साल 3032 में शायद
- ग़रीबी, बेरोज़गारी, महँगाई, भुखमरी, भ्रष्टाचार: जंगल की अमूर्त विरासतें
कविता
- अकेला वृद्ध और सूखा पेड़
- कृष्ण की व्यथा
- जीवन
- तुम्हारा और मेरा प्यार
- नारी हूँ
- बिना पते का इतिहास
- बुढ़ापा
- बेटी हूँ
- भेड़
- मनुष्य
- माँ
- मेरा सब्ज़ीवाला
- मैं उन सड़कों पर नहीं चल सकता
- मैं तुम्हारी मीरा हूँ
- रंगमंच
- रणचंडी की पुकार
- रह गया
- रूखे तन की वेदना
- शब्द
- शीशों का नगर
- सूखा पेड़
- स्त्री क्या है?
- स्त्री मनुष्य के अलावा सब कुछ है
सामाजिक आलेख
- आज स्वामी विवेकानंद की जन्म जयंती: धर्म और भक्ति, युवा पीढ़ी, श्रद्धा, महिला जगत तथा भारत के भविष्य के बारे में उन्होंने क्या कहा . . .
- आर्टीफ़िशियल इंटेलिजेंस और बिना इंटेलिजेंस का जीवन
- क्या अब प्यार और सम्बन्ध भी डिजिटल हो जाएँगे
- ग्लोबल वर्कफ़ोर्स में जेन-ज़ी: एक कंपनी में औसतन 13 महीने की नौकरी
- तापमान भले शून्य हो पर सहनशक्ति शून्य नहीं होनी चाहिए
- नए वर्ष का संकल्प: दुख की शिकायत लेकर मत चलिए
- ब्राउन कुड़ी वेल्डर गर्ल हरपाल कौर
- हैं दीवारें गुम और छत भी नहीं है
चिन्तन
कहानी
किशोर साहित्य कहानी
ऐतिहासिक
ललित कला
बाल साहित्य कहानी
सांस्कृतिक आलेख
- अहं के आगे आस्था, श्रद्धा और निष्ठा की विजय यानी होलिका-दहन
- आसुरी शक्ति पर दैवी शक्ति की विजय-नवरात्र और दशहरा
- त्योहार के मूल को भुला कर अब लोग फ़न, फ़ूड और फ़ैशन की मस्ती में चूर
- मंगलसूत्र: महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा देने वाला वैवाहिक बंधन
- महाशिवरात्रि और शिवजी का प्रसाद भाँग
- हमें सुंदर घर बनाना तो आता है, पर उस घर में सुंदर जीवन जीना नहीं आता
लघुकथा
काम की बात
साहित्यिक आलेख
सिनेमा और साहित्य
स्वास्थ्य
सिनेमा चर्चा
- अनुराधा: कैसे दिन बीतें, कैसे बीती रतियाँ, पिया जाने न हाय . . .
- आज ख़ुश तो बहुत होगे तुम
- आशा की निराशा: शीशा हो या दिल हो आख़िर टूट जाता है
- कन्हैयालाल: कर भला तो हो भला
- काॅलेज रोमांस: सभी युवा इतनी गालियाँ क्यों देते हैं
- केतन मेहता और धीरूबेन की ‘भवनी भवाई’
- कोरा काग़ज़: तीन व्यक्तियों की भीड़ की पीड़ा
- गुड्डी: सिनेमा के ग्लेमर वर्ल्ड का असली-नक़ली
- दृष्टिभ्रम के मास्टर पीटर परेरा की मास्टरपीस ‘मिस्टर इंडिया'
- पेले और पालेकर: ‘गोल’ माल
- मिलन की रैना और ‘अभिमान’ का अंत
- मुग़ल-ए-आज़म की दूसरी अनारकली
पुस्तक चर्चा
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं