विरोधियों से थको मत, विरोधियों को थका दो: विपक्ष के नेता खरगोशलाल का नया सूत्र
हास्य-व्यंग्य | हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी वीरेन्द्र बहादुर सिंह1 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
जंगल की राजनीति में राजा सिंह का दबदबा लगातार बढ़ता जा रहा था। जंगल के हर हिस्से के चुनाव में राजा सिंह किसी न किसी तकनीक से जीत जाते थे और जंगल के राजा बनने के चुनावों में भी राजा सिंह विपक्ष के नेता खरगोशलाल को हरा देते थे। इतना ही नहीं, खरगोशलाल स्वयं तो हारते ही थे, उनके साथी भी हार जाते थे। हार के बाद खरगोशलाल ‘जंगल जोड़ो यात्रा’ करते थे और वनसंपर्क करके फिर से जीतने की कोशिश शुरू कर देते थे। अपनी पार्टी के नेताओं के साथ बैठकर खरगोशलाल चिंतन शिविर करते थे और उनमें नए-नए सूत्र देकर पार्टी नेताओं और बचे-खुचे कार्यकर्ताओं को लड़ने के लिए प्रेरित करते थे।
पहले जंगल के चुनाव में हार के बाद खरगोशलाल ने ‘पराजय समीक्षा बैठक’ आयोजित की थी और उसमें विचारोत्तेजक भाषण देते हुए कहा था, “हार क्या है? हार और कुछ नहीं, जीत की अनुपस्थिति ही हार है। लगातार जीतते रहने से आप महान नहीं बनते, आपको महान बनाती हैं आपकी पराजय। हमें अब तक विजय के गुणगान ही सिखाए गए हैं, लेकिन मैं जो कह रहा हूँ, वह कोई नहीं कहेगा, हारना सीखो।”
उस समय उन्होंने एक नारा भी दिया था, “पराजय पचाओ . . . जंगलशाही बचाओ।”
खरगोशभाई के नेता यह नारा भूल चुके थे और पार्टी बदलकर राजा सिंह की पार्टी में जाने लगे थे। इसलिए खरगोशभाई को लगा कि फिर से नया सूत्र देने का समय आ चुका है। पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को प्रेरित करने के लिए उन्होंने एक विशेष बैठक बुलाई। उनके निर्देश पर पार्टी अध्यक्ष लंगूर लपलपिया ने बत्तक बटकबोला, ऊंटषउटपटांग जैसे वरिष्ठ नेताओं सहित सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं को उपस्थित रहने का आदेश दे दिया।
निर्धारित दिन बैठक हुई। वरिष्ठ नेता पहुँच गए, जंगल के दूर-दूर से नेता और कार्यकर्ता भी बैठक स्थल पर आ गए। सभी खरगोशलाल की प्रतीक्षा कर रहे थे कि तभी अचानक मार्शल आर्ट की पोशाक में खरगोशलाल बैठक में पहुँचे। नाज़ुक-नम्र-नरम खरगोशलाल को इस रूप में देखकर सभी चकित रह गए। कोई कुछ समझे-सोचे, उससे पहले ही खरगोशलाल मार्शल आर्ट करने लगे। कुछ दाँव दिखाने के बाद हाँफते हुए उन्होंने कहा, “यह तकनीक हमें राजा सिंह के ख़िलाफ़ लड़ने में काम आएगी। हम मार्शल आर्ट की तकनीक से राजा सिंह को हरा सकते हैं।”
यह सुनकर सब एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। राजा सिंह के सामने मार्शल आर्ट की तकनीक टिक नहीं सकती थी। राजा सिंह तो पंजा मारकर सारी तकनीक बिखेर सकते थे। उन्हें बल से नहीं, बल्कि कला से यानी जंगलशाही से हराया जा सकता था। यदि जंगलवासी समर्थन करें और राजा सिंह के ख़िलाफ़ वोटिंग करें, तभी उन्हें पराजित किया जा सकता है, यह बात खरगोशलाल के समर्थक नेताओं और कार्यकर्ताओं को पता थी, इसलिए खरगोशलाल की बात उन्हें समझ में नहीं आई।
असल में खरगोशलाल के मित्र बारहसिंघा ने मार्शल आर्ट के गुणगान करते हुए कहा था कि मार्शल आर्ट की जिउ-जित्सु तकनीक से राजा सिंह को हराया जा सकता है। खरगोशलाल किसी भी तरह राजा सिंह को हराना चाहते थे। उन्होंने तुरंत मार्शल आर्ट का प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया। ट्रेनर ने उन्हें समझाया कि विरोधी को थका देने से मार्शल आर्ट में जीत हासिल की जा सकती है। यह सुनते ही खरगोशलाल को मानो चाबी मिल गई। उन्हें लगा कि जो ज्ञान उन्हें मिला है, वह तुरंत अपने समर्थकों को दे देना चाहिए। इसी कारण उन्होंने तत्काल बैठक बुलाई थी।
“खरगोशलाल चुनाव जीतकर राजा सिंह को हराया जा सकता है। मुझे नहीं लगता कि मार्शल आर्ट में राजा सिंह को पराजित किया जा सकता है।” बत्तक बटकबोला ने सभी को सुनाई देने वाले स्वर में कटाक्ष किया।
“यू मिसअंडरस्टुड माई पॉइंट, मिस्टर बतक।” खरगोशलाल ने आत्मविश्वास भरी मुस्कान के साथ कहा, “हम मार्शल आर्ट से राजा सिंह को नहीं हराने वाले, बल्कि उसकी तकनीक का उपयोग करके उसे पराजित करेंगे।”
“कैसे? ज़रा विस्तार से बताइए।”
बतक बटकबोला को बोलते हुए रोकते हुए लंगूर लपलपिया ने कहा, “हम सब सवाल करने के बजाय एक बार माननीय श्री खरगोशलाल की पूरी बात सुन लें। हम सब से अधिक वनसंपर्क का अनुभव उन्हीं के पास है।”
लंगूर की टोक के बाद बत्तक चुप हो गया, तब खरगोशलाल ने ज्ञान बघारा, “मार्शल आर्ट की जिउ-जित्सु तकनीक के अनुसार विरोधी की शक्ति से ही विरोधी को हराया जाता है। विरोधी के सामने थकने के बजाय उसे थका देने से उसकी हार सुनिश्चित की जाती है।”
खरगोशलाल ने थोड़ा विराम लिया और फिर आगे कहा, “मैंने आप सब को एक सूत्र देने के लिए बुलाया है। यदि आप इसे याद रखें, तो हम राजा सिंह को हरा सकते हैं। वह सूत्र है—‘विरोधियों से थको मत, विरोधियों को थका दो।’”
सूत्र सुनकर बत्तक बटकबोला ने पूछा, “अगर यही तकनीक राजा सिंह भी जानते हों और हमें ही थका दें, तो फिर क्या करेंगे?”
इस सवाल का जवाब खरगोशलाल के पास नहीं था। उन्होंने कहा, “मैं ट्रेनर से पूछकर फिर से बैठक बुलाऊँगा!”
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