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राजा सिंह की काम करने की पद्धति: ‘सिस्टम न बदलो, नाम बदलो।’

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जंगल में राजा सिंह ने नाम बदलने की भव्य परंपरा शुरू की थी। जंगल के नियमों से लेकर इमारतों तक के नाम बदले ही जा रहे थे, अब उन्होंने जंगल के क्षेत्रों के नाम बदलने की शुरूआत कर दी . . . 

जंगल में जब बूढ़े सिंह का राज था, तब वर्तमान राजा सिंह उनका स्थान लेने के लिए उत्सुक थे। उस समय के राजा सिंह की तुलना में वर्तमान राजा सिंह युवा थे। उन्होंने जंगलवासियों से कहा, “मैं इस जंगल का राजा बनने के योग्य हूँ। मैं जंगल को नई ऊँचाइयों पर ले जाऊँगा। आप वर्षों से बूढ़े सिंह को राजा बना रहे हैं। मुझे एक मौक़ा दीजिए। मैं सिस्टम बदल दूँगा।”

बूढ़े सिंह को चुनाव में हराने के लिए उन्होंने नारा दिया, “नया वन, नया पर्यावरण, नया परिवर्तन।”

जंगलवासी नए परिवर्तन की बात से प्रभावित हो गए। उन्हें लगा कि जंगल में बदलाव की ज़रूरत है। बूढ़े सिंह में अब नवीनता नहीं रही और वे निर्णय लेने में कमज़ोर साबित हुए हैं। चुनाव में बूढ़े सिंह की भारी हार हुई और जंगलवासियों ने नए राजा को सत्ता सौंप दी।

बूढ़े सिंह के सिंहासन पर वर्तमान राजा सिंह विराजमान हुए। उन्होंने अपने निजी सलाहकार रीछराज को आंतरिक मामलों की ज़िम्मेदारी दी।

हाथीभाई को सड़क, परिवहन और रेल विभाग सौंपे गए। उन्होंने तुरंत कई योजनाएँ घोषित कर दीं। जैसे पहले जंगलवासी बैंकों में जाकर सामान्य तरीक़े से खाता खोल लेते थे। राजा सिंह ने वही प्रक्रिया रखी, लेकिन खाते का नाम दे दिया, “वन धन योजना।”

जंगल में सदियों से ऋतुएँ बदलती रहती थीं और जंगलवासी इसे सामान्य प्रक्रिया मानते थे। राजा सिंह ने एक योजना बनाकर उसका नाम रख दिया, “परिवर्तनशील पर्यावरण।”

ऐसे प्रभावशाली नाम देखकर जंगलवासी स्मार्ट राजा चुनने पर गर्व महसूस करने लगे।

धीरे-धीरे राजा सिंह को समझ में आया कि जंगल की सिस्टम बदलना चुनावी नारे देने जितना आसान नहीं है। सिस्टम बदलने के लिए ईमानदारी से काम करना पड़ता है, आलोचना सहनी पड़ती है, दरबार का ख़र्च कम करना पड़ता है, सादगी अपनानी पड़ती है और दिन-रात जंगल के हित में सोचना पड़ता है।

बहुत विचार करने के बाद राजा सिंह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि सिस्टम बदलने की ज़रूरत नहीं है। यदि नाम बदलने की परंपरा मज़बूत बना दी जाए तो समर्थक उसी को सिस्टम परिवर्तन मान लेंगे। सलाहकार रीछराज के साथ चर्चा के बाद उन्होंने सरकार की कार्यपद्धति बदल दी, “सिस्टम न बदलो, नाम बदलो।”

इस योजना के तहत सबसे पहले उन्होंने जंगल का ‘काल’ बदल दिया। उन्होंने कहा, “अब तक जंगल मृतकाल में था, मैं उसे अमृतकाल में ले आया हूँ।”

सरकारी दस्तावेज़ों, बैनरों और विज्ञापनों में हर जगह ‘अमृतकाल’ लिख दिया गया। जंगलवासी अमृतकाल में प्रवेश कर ख़ुश हो गए।

एक दिन राजा सिंह ने घोषणा की, “अब जंगल के नियमों को नियम नहीं कहा जाएगा, उन्हें ‘दंडशास्त्र’ कहा जाएगा।”

जंगलवासियों ने इसे भी स्वीकार कर लिया। समर्थकों ने कहा कि इससे पूरी व्यवस्था बदल जाएगी।

फिर राजा सिंह ने घोषणा की, “सरकारी इमारतों को अब इमारत नहीं, ‘सेवालय’ कहा जाएगा।”

उन्होंने दरबारियों रीछराज, हाथीभाई और अधिकारियों बब्बन बिलाड़ा तथा मगर मारवाह को आदेश दिया, “अब हम सेवालय में बैठकर जो काम करेंगे उसे सेवा कहा जाएगा।”

समर्थक ख़ुशी से झूम उठे। उन्हें लगा कि जंगल में स्वर्णयुग आ गया है और ऐसा शासन वर्षों तक चलना चाहिए।

समर्थकों का उत्साह देखकर राजा सिंह भी उत्साहित हो गए। अब वे अक्सर बुदबुदाते, “नाम बदलने से ही सिस्टम बदल जाता है।”

इसके बाद उन्होंने जंगल के अलग-अलग क्षेत्रों के नाम बदलने शुरू कर दिए। उन्हें ख़ूब प्रसिद्धि मिली। उनके समर्थकों ने भी विरोधी नेताओं के नाम बदलने शुरू कर दिए। विपक्ष के नेता ख़रगोश, कछुआ, बारहसिंगा और वाघिन को ‘जंगलद्रोही’, ‘जंगलविरोधी’ जैसे नाम दिए जाने लगे।

एक दिन राजा सिंह को विचार आया, “मेरे मित्र गोल्डन ईगल का जंगल ‘समृद्ध वन’ कहलाता है और मेरे प्रतिद्वंद्वी राजा ड्रैगन अपने जंगल को समृद्ध बना रहे हैं। मुझे भी कुछ ऐसा करना चाहिए।”

उन्होंने अपने सलाहकार रीछराज से यह बात कही। रीछराज ज़ोर से हँस पड़े और बोले, “माफ़ कीजिए महाराज, आप अपनी विचारधारा से भटक गए हैं।”

राजा सिंह आश्चर्य से उन्हें देखते रहे। तब रीछराज ने कहा, “हमें तो सिर्फ़ नाम ही बदलना है, याद है?”

बात समझते ही राजा सिंह ने नया भाषण दिया, “अब हमारा जंगल ‘समृद्ध वन’ के नाम से जाना जाएगा।”

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