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प्रयोग बकनली का और बकबक नली का

 

क्या प्यार का भी कोई गारंटी पीरियड होता है? किसने कहा कि ढलती ज़िन्दगी में पति-पत्नी के बीच प्यार नहीं होता? कल की ही बात है। बड़े घर की शादी में दावत पर जाना हुआ। उँगलियाँ चाटने वाला खाना सजा था। बुफ़े डिनर था, सब खड़े-खड़े खा रहे थे। तभी दूर एक कोने में नज़र गई, एक चाचा और चाची कहीं से कुर्सियाँ लगाकर आमने-सामने बैठे थे। दोनों की प्लेटें भरी थीं, पर दोनों साथ नहीं खा रहे थे। काकी शर्माते हुए काका को कौर खिला रही थीं। मैं तो चकित रह गया। मैंने मेज़बान से कान में कहा, “देखिए, इस उम्र में भी कैसा प्यार है!” 

मेज़बान ने चालाकी से हँसकर कहा, “प्यार-व्यार छोड़ो भाई। बात यह है कि कंजूस चंपक चाचा और चंचल चाची के बीच थाली एक ही है, इसलिए बारी-बारी से खिला रहे हैं।” 

शुरूआत में साझा थाली की बात सुनकर और एक लेखक के जीवन में नली के ज़रिए चलती बातों को देखकर और नल-दमयंती नहीं, बल्कि नली-दमयंती को अपनी आँखों से देखकर लगा कि सच में प्रेम की शीशी पर कोई एक्सपायरी डेट नहीं लिखी होती। 

एक लेखक ड्राइंग रूम में सोफ़े पर बैठे थे। बग़ल में उनकी वृद्ध अर्द्धांगिनी कुछ पढ़ने में मग्न थीं। लेखक से कई बातें हुईं, पर उनकी पत्नी मानो परीक्षा की तैयारी कर रही हों, किताब में सिर गड़ाए बैठी रहीं। मुझे अजीब लगा। मैंने पूछ लिया, “भाभी, कुछ बोलती क्यों नहीं?” 

यह सुनते ही लेखक ने एक सिरे पर फनल बँधी नली उठाई और पत्नी के कान में डालकर मेरा सवाल दोहराया। भाभी हँसकर बोलीं, “सुनाई दे तो आपकी बातों में दख़ल दूँ न?” तब पता चला कि उन्होंने वर्षों पहले कान की दुकान बढ़ा ली है। दुनिया का अनुभव है कि घरवाली अक्सर पति की बात कान में नहीं धरती, इस लेखक महोदय को पत्नी से बात कान तक पहुँचाने के लिए नली रखनी पड़ी। 

मैंने पूछा, “अब तो उँगली के सिरे जितने छोटे हियरिंग-एड बाज़ार में मिलते हैं, वह क्यों नहीं लेते?” 

लेखक ने खुले दिल से कहा, “नली से जो नज़दीकी बनी रहती है, उसकी आदत पड़ गई है। मैं फ़नल में मुँह डालकर बोलता हूँ और भाभी कान देकर सुनती हैं। मैं गला फाड़कर बोलता हूँ और भाभी मेरा कहा गले उतार लेती हैं। हमारी फ़िल्टर टाक यूँ ही चलती रहती है।” 

मैंने हँसते हुए पूछा, “विज्ञान में बकनली का प्रयोग होता है। आप जो नली इस्तेमाल करते हैं, उसे क्या कहेंगे?” 

लेखक बोले, “विज्ञान में वासुदेव के प्याले में बकनली लगाई जाती है, टोकरी में सोए कन्हैया के अँगूठे तक पानी पहुँचे और सारा पानी निकल जाए, उसे बकनली कहते हैं। पर मैं जो इस नली से बोल-बोलकर बात भाभी के कान तक पहुँचाता हूँ, उससे प्रेम कम नहीं होता। इसलिए विज्ञान का प्रयोग बकनली और मेरा प्रयोग बकबक नली है।” 
 

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