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आज स्वामी विवेकानंद की जन्म जयंती: धर्म और भक्ति, युवा पीढ़ी, श्रद्धा, महिला जगत तथा भारत के भविष्य के बारे में उन्होंने क्या कहा . . . 

 

महात्मा गाँधी के सिद्धांतों और उनके योगदान को संस्थाओं, प्रकाशनों तथा पाठ्यक्रमों के माध्यम से जिस तरह जीवित रखा गया है, यदि वही प्रयास स्वामी विवेकानंद के लिए भी हुआ होता, तो राष्ट्रीय गौरव, युवा चरित्र और देश की स्थिति कहीं अधिक ऊँचे स्तर पर होती। 

स्वामी विवेकानंद की 2013–2014 में 150वीं जन्म जयंती मनाई गई थी। उस समय भारत में इस महान आत्मा के सनातन धर्म संबंधी विचारों, युवा पीढ़ी के लिए उनके संदेश और हमारी धर्म संस्कृति की महानता के प्रचार के साथ-साथ उनके भावी भारत के स्वप्न को पुनर्जीवित करने का वातावरण बना था। लेकिन उसके बाद ऐसा लगता है कि स्वामी विवेकानंद फिर से बाल और युवा पीढ़ी से दूर होते चले गए। 

कोलकाता के रामकृष्ण मिशन और भारत के बड़े शहरों में जिन-जिन स्थानों पर स्वामी विवेकानंद ने यात्रा की या प्रवास किया, वहाँ विवेकानंद केंद्र अवश्य हैं। परन्तु विवेकानंद जैसी विराट वैश्विक प्रतिभा की जो विरासत हमें मिली है, उसकी हम पर्याप्त क़द्र नहीं कर पाए। उनकी अद्वितीय दृष्टि और संदेश का लाभ हमने सही अर्थों में नहीं उठाया। यदि महात्मा गाँधी की तरह स्वामी विवेकानंद के विचारों को भी संस्थाओं, प्रकाशनों और शैक्षणिक पाठ्यक्रमों के माध्यम से जीवित रखा गया होता तो राष्ट्रीय गौरव और युवा चरित्र कहीं अधिक ऊँचे स्तर पर होते। 

पिछले वर्षों में मंदिर और संप्रदाय अवश्य विकसित और विस्तृत हुए हैं, लेकिन स्वामी विवेकानंद और पूज्य अरविंद के प्रति हमारी सजगता कम दिखाई देती है। विवेकानंद केंद्र मौजूद हैं, पर उनके विचारों का अपेक्षित विस्तार और वैचारिक दिशा में प्रसार नहीं हो पाया। 

स्वामी विवेकानंद, सुभाष चंद्र बोस और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे महापुरुषों को अक्सर केवल बंगाल या कोलकाता तक सीमित मान लिया जाता है। अन्य राज्यों में उनके प्रति वैसी पहचान और श्रद्धा नहीं दिखती। इसी तरह महाराणा प्रताप मेवाड़ में और छत्रपति शिवाजी महाराज महाराष्ट्र में विशेष रूप से पूजित हैं। हम अपने इतिहास की रत्न समान महान विभूतियों को भी उनके जन्मस्थानों तक सीमित कर देते हैं। यही स्थिति अन्य राज्यों के राष्ट्रपुरुषों के साथ भी है। सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे भारत के निर्माता समान नेता को भी गुजरात के बाहर वैसा सम्मान और पहचान नहीं मिली। 

विदेशी भले ही स्वामी विवेकानंद को ‘Hindu Monk of India’ के रूप में पहचानें, पर हमें यह जानना चाहिए कि वे शायद एकमात्र ऐसे युगपुरुष थे, जिन्होंने 19वीं सदी में भारत के नागरिकों, विशेषकर युवाओं को यह कहकर झकझोरा कि हीनता की भावना छोड़ो। पश्चिम से जो सीखने योग्य है, उसे अवश्य सीखो, लेकिन हमारे धर्म, संस्कृति, ऋषि-परंपरा, दर्शन, वेद और उपनिषद जैसा विरासत संसार में कहीं नहीं है। इसे आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत करो। भारत और पश्चिम की संस्कृति में 'How much' और 'What much' जैसा गहरा अंतर है। 

स्वामी विवेकानंद ने उन मंदिरों और धर्मगुरुओं की भी आलोचना की जो जनता को केवल कर्मकांड और पाखंड पर निर्भर रखते थे। उन्होंने कहा कि ऐसे तत्त्व देश की वास्तविक प्रगति और चरित्र निर्माण में बाधक हैं। वे मंदिर में दर्शन के विरोधी नहीं थे, लेकिन कहते थे कि मंदिर तो बाल मंदिर की तरह है, जहाँ से संस्कारों की नींव पड़ती है। उसके बाद जैसे विद्यार्थी विद्यालय, महाविद्यालय और उच्च शिक्षा की ओर बढ़ता है, वैसे ही व्यक्ति को ज्ञान, विज्ञान, अध्ययन और शिक्षा के माध्यम से स्वयं और देश के निर्माण में योगदान देना चाहिए। यदि कोई जीवन भर मंदिर जाता रहे और उसके स्वभाव व जीवन में कोई परिवर्तन न आए तो वह जीवन व्यर्थ है। वे मूर्ति पूजा या ईश्वर तथा सद्गुरु की तस्वीर रखने के विरोधी नहीं थे, पर यांत्रिक रूप से दर्शन करके पहले जैसे ही बने रहना निरर्थक है, इस पर वे ज़ोर देते थे। श्रीकृष्ण की तरह उन्होंने भी कर्मयोग को भक्ति योग से अधिक महत्त्व दिया। वे कहते थे कि प्रसन्न, आनंदित और ऊर्जावान होना ही सच्ची धार्मिकता और आध्यात्मिकता की पहली पहचान है। 

स्वामी विवेकानंद ने मंदिरों से अधिक शैक्षणिक और वैज्ञानिक संस्थानों तथा रोज़गार देने वाले उद्योगों की स्थापना पर बल दिया, जो देश की आर्थिक प्रगति में योगदान करें। जमशेदजी टाटा जब बड़ी राशि धार्मिक दान के रूप में देना चाहते थे, तब एक स्टीमर यात्रा के दौरान विवेकानंद ने उन्हें लौह उद्योग स्थापित करने की प्रेरणा दी। 

स्वामी विवेकानंद का हर भाषण और पत्र देश की युवा पीढ़ी को ध्यान में रखकर ही होता था। उनके लिए युवा ही देश के भाग्य विधाता थे। वे कहते थे कि छाती चौड़ी करके आगे बढ़ो। यदि मंदिर और व्यायाम में से किसी एक को चुनना हो, तो व्यायाम को प्राथमिकता दो। युवाओं को वे खेल के मैदान में देखने के पक्षधर थे। उन्होंने कहा कि यह पूरी दुनिया एक अखाड़ा है, जहाँ से हमें शारीरिक और मानसिक रूप से मज़बूत बनना सीखना है। 

19वीं सदी में ही स्वामी विवेकानंद ने रूढ़िवादियों को चुनौती देते हुए कहा कि भारत की महिलाओं में अपार सामर्थ्य और संघर्ष से जूझने का साहस है। उन्होंने महिला शोषण के विरोध में और महिलाओं के शिक्षा व स्वतंत्र अभिव्यक्ति के समर्थन में आवाज़ उठाई। 

जब लोग बारबार पुण्य और पाप की बातें करते थे, तब विवेकानंद ने मौलिक विचार दिया कि यदि कोई एक पाप है, तो वह स्वयं को कमज़ोर मानना है और दूसरों को कमज़ोर मानना भी पाप है। 

जब लोग पूजा, कर्मकांड, अंधश्रद्धा और ढोंगियों के जाल में फँस जाते थे, तब उन्होंने कहा कि कोई गुरु, साहित्य या विधि तुम्हें सुधार नहीं सकती। परिवर्तन स्वयं के भीतर से आता है, वह बाहरी माध्यमों से नहीं, आत्मदर्शन से ही सम्भव है। 

स्वामी विवेकानंद का एक अद्भुत कथन है कि शब्दों का वैभव गौण है, हम विचारों से जीते हैं। शब्द नहीं, विचार जीवनयात्रा कराते हैं। संसार का कोई भी ज्ञान बाहर से नहीं आता, वह हमारे भीतर से ही प्रकट होता है। 

अंत में, स्वामी विवेकानंद ने महर्षि अरविंद की तरह भारत के भविष्य की भविष्यवाणी की कि जब-जब संसार में सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संकट तथा अराजकता आएगी, तब भारत ही विश्व को पतन से उबारेगा। भारत अपनी जीवन पद्धति, सामाजिक व्यवस्था, धर्मग्रंथों और आध्यात्मिक प्रभाव से विश्व को प्रेरणा देगा। सच्चा दिव्य सुख भौतिकता से नहीं, बल्कि ध्यान, योग और सात्त्विक जीवन से प्राप्त होता है, यह भारत विश्व को सिखाएगा। हम किसी देश, धर्म या प्रांत के नहीं, बल्कि एक वैश्विक परिवार के सदस्य हैं, यह संदेश भी भारत देगा। 

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