नेताओं पर ब्रांडेड जूते फेंके जाएँ, तभी प्रगति कहलाएगी
हास्य-व्यंग्य | हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी वीरेन्द्र बहादुर सिंह1 Feb 2026 (अंक: 293, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
आदर्श लोकतंत्र में फेंकने का अधिकार सिर्फ़ नेताओं तक सीमित नहीं होना चाहिए। जनता भी कभी-कभार कुछ फेंक ले, जैसे नेताओं पर जूते। नेताओं पर जूते फेंकना किसी भी तरह से हिंसक घटना नहीं माना जाना चाहिए। आम लोग ‘शोले’ के ठाकुर जैसे कील लगे बूट नहीं पहनते और आज के नेता चाहे जितने भी खलनायक क्यों न हों, गब्बर सिंह की बराबरी तो बिलकुल नहीं करते।
नेताओं को इस तथ्य पर गंभीरता से ध्यान देना चाहिए कि अब तक विश्व इतिहास में ऐसा एक भी उदाहरण नहीं मिलता, जहाँ किसी नेता की मृत्यु जनता द्वारा फेंके गए जूतों से हुई हो और वह स्वर्ग सिधार गया हो (भूल-चूक माफ़ हो)। हाँ, जूते फेंके जाने से प्रचार का भरपूर लाभ मिलने के उदाहरण अवश्य मौजूद हैं। आजकल उग आए राजनीतिक कम्युनिकेशन स्ट्रेटेजिस्ट भविष्य में नेताओं के लिए सोशल मीडिया नीति, कास्ट्यूम डिज़ाइनिंग के साथ-साथ जूते फेंकवाने की योजना को भी प्रचार रणनीति का हिस्सा बना सकते हैं।
दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ते हुए भी जूते फेंकने के चयन के मामले में हम अब तक अपनी पुरानी ‘विकासशील राष्ट्र’ वाली मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाए हैं। चाहे आज ऐसे नेता भी हों, जो पार्षद बनने की योग्यता तक नहीं रखते, फिर भी हाईकमान की कृपा से राष्ट्रीय नेता बन गए हों, लेकिन पार्षद स्तर और राष्ट्रीय स्तर के नेताओं पर एक जैसे जूते फेंके जाएँ, यह कहाँ का न्याय है? नेता के स्तर के अनुसार (बौद्धिक नहीं, पद के स्तर के अनुसार) यह तय होना चाहिए कि उस पर कैसा जूता फेंका जाए।
पर्सनैलिटी ग्रूमिंग के प्रशिक्षक कहते हैं कि लोगों की नज़र सबसे पहले आपके जूतों पर जाती है और उसी से आपकी सलीक़ेदारी और ईमानदारी की पहली छाप बनती है। तो उसी तरह नेताओं का मूल्यांकन भी उन पर फेंके गए जूतों के प्रकार, ब्रांड और क़ीमत के आधार पर किया जाए, तो इसमें ग़लत क्या है?
किसी नेता पर पाँच साल पहले साधारण चप्पल फेंकी गई हो, लेकिन आज यदि उस पर कोई महँगा ब्रांडेड जूता फेंका जाए, तो ज़रा सोचिए, वह नेता अपनी ‘प्रगति’ से कितना ख़ुश होगा। पूरी ज़िन्दगी एक ही पार्टी में रहने के बाद, बुढ़ापे में अपने घोटालों पर क्लीन चिट पाने के लिए सत्ता पक्ष में शामिल होने वाले नेता पर यदि पैबंद लगी जूती फेंकी जाए, तो बात समझ में आती है। उसी तरह साठ वर्ष पार कर चुके किसी नेता पर यदि साधारण चप्पल फेंकी जाए, तो वे इस बात से संतुष्ट होंगे कि जनता उन्हें अब भी युवा नेता मानती है।
विश्वविद्यालय चाहें तो राजनीति विज्ञान में एम.ए. कर रहे छात्रों से भारत के नेताओं के राजनीतिक-आर्थिक विकास और उन पर समय-समय पर फेंके गए जूतों के बदलते स्तर पर एक तुलनात्मक अध्ययन करवा सकते हैं।
आज संग्रहालयों में विभिन्न कालखंडों के राजाओं या अन्य महापुरुषों के स्मारकों में उनके जूते प्रदर्शित किए जाते हैं, आश्रमों में धर्मगुरुओं की पादुकाएँ सहेज कर रखी जाती हैं। भविष्य के संग्रहालयों में यदि वर्तमान नेताओं पर फेंके गए जूते प्रदर्शनी में रखे जाएँ, तो उस दौर की जनता को भी कितनी अच्छी प्रेरणा मिलेगी और इस तरह लोकतंत्र की ‘फेंकशाही’ और भी मज़बूत होती जाएगी। कुछ चुने हुए नेताओं को देखकर सचमुच ऐसा लगता है कि जनता ने उन्हें वोट नहीं दिया, बल्कि वोट का घाव किया है।
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