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अक्षय कुमार—बोतल का बादशाह, कंगना—सिलेंडर क्वीन

 

“सरजी . . . सरजी . . . एक सुपरहिट फ़िल्म का आइडिया आया है!” असिस्टेंट प्रोड्यूसर ने सीनियर प्रोड्यूसर के कान फट जाएँ इतनी ज़ोर से चिल्लाते हुए कहा।

“क्या है? फिर से पाकिस्तान को तबाह करना है? रहने दे। पाकिस्तान तो ख़ुद ही इतना बरबाद हो चुका है कि अब उसे फ़िल्मी पर्दे पर तबाह होते देखने में पब्लिक को मज़ा नहीं आता।”

“सर . . . नो पाकिस्तान . . . बिगर आइडिया . . . बिगर कैनवस . . . ” असिस्टेंट हाँफते-हाँफते बोला।

“हैं? बिगर? यू मीन चीन? अरे चुप हो जा। अब तो चीन के साथ हमारी भाईबंदी है। चीन विरोधी फ़िल्म बनाएँगे तो हमारी ही सरकार हमें चीर कर रख देगी। हाँ, बाक़ी ‘लव इन चाइना’ जैसी कोई रोमांटिक फ़िल्म हो तो बोल . . . या फिर ‘गल्गोटिया रोबोट फ़्रॉम चाइना’ जैसी कोई कामेडी फ़िल्म बना लें।”

“सर, मुझे भी पता है कि हमें चीन के ख़िलाफ़ चूँ या चाँ नहीं करना है। इन फ़ैक्ट, अभी तो किसी और देश के ख़िलाफ़ भी उहूँ तक नहीं करना है। लेकिन मैं कहता हूँ कि अभी जो एलपीजी सिलेंडर की क्राइसिस चल रही है, उसी पर एक फटाफट फ़िल्म बना डालते हैं। ‘एलपीजी फ़ाइल्स’ . . . टाइटल कैसा रहेगा?”

“अरे मूर्ख तू मुझे जेल भिजवाकर ही दम लेगा। ‘फ़ाइल्स’ शब्द से लगेगा कि हम किसी विस्फोटक एपस्टीन फ़ाइल्स पर फ़िल्म बना रहे हैं। जा, अभी के अभी तुझे मेरे असिस्टेंट पद से निकालता हूँ। बाहर जा और पकौड़ी का ठेला लगा। समझदार लोग कह गए हैं कि उसी में रोज़गार है।”

“बॉस, अभी ठेला लगाना भी सम्भव नहीं है। गैस सिलेंडर ही कहाँ मिल रहे हैं? मेरी बात तो सुनिए। जब जनता संकट में हो, तब उसे मनोरंजन में उलझाए रखना बॉलीवुड और सरकार दोनों का धर्म है। इसलिए हम इस एलपीजी क्राइसिस पर फ़िल्म बनाएँ। हमारा हीरो या हीरोइन सीधे गल्फ देश पहुँच जाए और वहाँ से एलपीजी के 200 टैंकर खींचकर हमारे देश ले आए ऐसी फ़िल्म बनाएँ।”

“तू पगला गया है क्या? यहाँ एक सिलेंडर के लाले पड़े हैं और तू 200 टैंकर की डींगें मार रहा है! अरे, तू असिस्टेंट प्रोड्यूसर है, किसी नेता का भाषण लेखक नहीं।”

“अरे सरजी, आजकल देशभक्ति के नाम पर बड़े-बड़े तुक्के भी लोगों को कन्विन्सिंग लगते हैं। अगर हम अक्षय कुमार या कंगना रनौत जैसे देशभक्त कलाकारों को लेकर फ़िल्म बनाएँगे तो कुछ भी चल जाएगा। अक्षय के लिए ‘बोतल का बादशाह’ या फिर कंगना के लिए ‘सिलेंडर क्वीन’ जैसा कोई टाइटल रख दें तो?”

सीनियर प्रोड्यूसर सोच में पड़ गए। फिर धीरे से बोले, “हीरो-हीरोइन तो समझ में आ गए, लेकिन विलेन किसे बनाएँगे? मेरा मतलब किस कलाकार को लें यह नहीं, बल्कि देश-दुनिया के किस नेता को विलेन बना दें?”

सिर पर हाथ रखकर लंबा सोचने के बाद असिस्टेंट प्रोड्यूसर बोला, “छोड़िए . . . मैं आख़िर में इंडक्शन ख़रीदकर ही पकौड़े का ठेला शुरू करने जा रहा हूँ . . . लीजिए, यह मेरा इस्तीफ़ा।” 

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