भीतर का युद्ध और अंतिम विजय
काव्य साहित्य | कविता वीरेन्द्र बहादुर सिंह15 May 2026 (अंक: 297, द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)
वीरेंद्र बहादुर सिंह
अगर ख़ुद से नहीं हारे,
तो जीत कोई संयोग नहीं
वह एक अनिवार्यता है,
जो समय की धूल से उभरकर
एक दिन स्पष्ट हो जाती है।
यह संसार तो बस दर्पण है,
जो भीतर की छवि को लौटाता है,
यदि मन में दरारें हों,
तो हर दृश्य टूटता-सा नज़र आता है।
असल युद्ध बाहर नहीं,
न ही तलवारों की खनक में,
वह तो चलता है निस्तब्ध,
विचारों की उलझी पगडंडियों में।
जहाँ डर अपनी जड़ें जमाता है,
और संदेह शाखाएँ फैलाता है,
जहाँ हर असफलता एक प्रश्न बनकर
आत्मा के द्वार पर दस्तक देता है।
कितनी बार गिरा है मन,
कितनी बार थककर बैठा है,
कितनी बार उसने ख़ुद ही
अपने सपनों को छोटा बताया है।
यही तो हार का पहला संकेत है
जब हम अपनी ही आँखों में
अपनी क़ीमत घटा देते हैं,
जब हम अपने ही अस्तित्व को
एक बोझ बना देते हैं।
पर यदि उसी क्षण,
कोई धीमी-सी आवाज़ उठे
जो कहे कि तुम अभी पूरे नहीं हुए,
तो समझो, हार अभी दूर खड़ी है।
वह आवाज़ ही तुम्हारा सत्य है,
वह तुम्हारी जिजीविषा है,
जो हर अँधेरे में
एक दीपक बनकर जलती है।
जीत का अर्थ केवल शिखर नहीं,
वह हर उस क़दम में छिपा है
जो भय के बावजूद आगे बढ़ता है,
जो असंभव के बीच भी
सम्भावना खोजता है।
कभी-कभी जीवन
तुम्हें वहीं ले जाकर खड़ा करता है
जहाँ सब कुछ छूट चुका होता है
साथ, सपने, और विश्वास भी।
वहाँ उस शून्य में,
तुम्हें अपने आप से मिलना होता है,
और वही मुलाक़ात तय करती है
कि तुम हारोगे या फिर जन्म लोगे।
क्योंकि हर व्यक्ति के भीतर
एक योद्धा और एक शरणार्थी रहता है,
एक लड़ना चाहता है,
दूसरा भाग जाना चाहता है।
जो योद्धा को चुनता है,
वह अपने भय को भी हथियार बना लेता है,
और जो शरणार्थी बनता है,
वह अपनी सम्भावनाओं से भी डर जाता है।
इसलिए जीत बाहरी नहीं,
एक आंतरिक अनुशासन है
अपने विचारों को साधना,
अपनी कमज़ोरियों को स्वीकारना,
और फिर उन्हें पार करना।
समय कभी स्थिर नहीं रहता,
वह हर घाव को कहानी बना देता है,
हर पीड़ा को अनुभव,
और हर संघर्ष को पहचान।
पर जो ख़ुद से हार गया,
उसके लिए समय भी मौन हो जाता है,
क्योंकि वह यात्रा अधूरी रह जाती है
जिसे वह पूरा कर सकता था।
इसलिए हर दिन,
अपने भीतर झाँको
देखो कि कहीं तुमने
अपने ही सपनों से समझौता तो नहीं कर लिया।
कहीं ऐसा तो नहीं
कि तुमने सुविधा को सत्य मान लिया हो,
और संघर्ष से बचने के लिए
अपने लक्ष्य को छोटा कर लिया हो।
याद रखो
जीत का मार्ग सरल नहीं होता,
वह काँटों से भरा होता है,
पर वही काँटे
तुम्हारे पाँवों को मज़बूत बनाते हैं।
जब तक भीतर की लौ जल रही है,
तब तक अँधेरा तुम्हें निगल नहीं सकता,
जब तक आत्मा जागृत है,
तब तक कोई भी परिस्थिति
तुम्हें पराजित नहीं कर सकती।
तुम गिरोगे
हाँ, बारबार गिरोगे,
पर हर गिरावट एक शिक्षा है,
एक नई दिशा का संकेत है।
और एक दिन,
जब तुम पीछे मुड़कर देखोगे,
तो समझोगे
कि जीत अचानक नहीं मिली थी,
वह हर उस क्षण में पनपी थी
जब तुमने हार मानने से इंकार किया था।
इसलिए,
ख़ुद से मत हारो
क्योंकि वही एकमात्र युद्ध है
जिसे हारकर कोई भी विजेता नहीं बन सकता।
अगर तुमने अपने विश्वास को थामे रखा,
अगर तुमने अपने साहस को ज़िन्दा रखा,
तो जीत तुम्हारी ओर बढ़ेगी
धीरे-धीरे, पर निश्चित रूप से।
क्योंकि अंततः,
जीत कोई बाहरी उपलब्धि नहीं,
वह आत्मा की वह स्थिति है
जहाँ तुम स्वयं से कह सको
मैंने कोशिश की,
मैंने डटकर सामना किया,
और सबसे बढ़कर
मैंने ख़ुद को कभी हारने नहीं दिया।
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