अकेले आए थे, अकेले ही जाना होगा
काव्य साहित्य | कविता वीरेन्द्र बहादुर सिंह1 Jun 2026 (अंक: 298, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
अकेले आए थे इस धरती पर,
अकेले ही एक दिन जाना होगा,
भीड़ भरे इस मेले में भी
ख़ुद को ख़ुद से निभाना होगा।
ना कोई साथ जन्म से आया,
ना कोई अंत तक जाएगा,
बस कर्मों की ख़ुश्बू ही
सदियों तक रह जाएगी।
जब पहली बार आँख खुली थी,
ना दौलत थी, ना पहचान,
मुट्ठी भर साँसें थीं केवल
और जीवन का अनजान जहान।
धीरे-धीरे रिश्ते जुड़े,
कुछ अपने बने, कुछ पराए,
कुछ ने दिल में घर कर लिया,
कुछ मौसम बनकर आए।
कभी तालियाँ मिलीं बहुत,
कभी तानों का शोर मिला,
कभी अपनों ने हाथ थामा,
कभी अपनों से ही घाव मिला।
लेकिन हर ठोकर ने सिखाया
गिरकर फिर उठ जाना है,
अँधेरों से लड़ते-लड़ते
ख़ुद सूरज बन जाना है।
साहसी बनो, मज़बूत बनो,
आत्मविश्वास से भर जाओ,
अगर ख़ुद पर यक़ीन रहेगा
तो हर मुश्किल से लड़ जाओ।
दुनिया तुम्हें झुकाना चाहे,
तुम फिर भी अडिग खड़े रहना,
सच की राह कठिन सही
पर अपने उसूलों पर चलते रहना।
क्यों डरते हो हार से इतना,
हार तो जीवन का गहना है,
जो गिरकर फिर सँभल गया
असल में वही तो सोना है।
कभी अकेलापन चुभे अगर,
तो ख़ुद से बातें कर लेना,
अपने भीतर बैठे ईश्वर को
चुपके से महसूस कर लेना।
याद रखना,
तुम्हारी असली ताक़त
किसी और के हाथों में नहीं,
तुम्हारे अपने इरादों में है,
तुम्हारी सच्ची मेहनत में है।
लोग आएँगे, लोग जाएँगे,
कुछ तारीफ़ करेंगे, कुछ ठुकराएँगे,
लेकिन तुम्हारे अच्छे कर्म
हर दिल में दीप जलाएँगे।
जब मृत्यु का अंतिम क्षण आएगा
सब यहीं रह जाएगा,
ना महल साथ जाएगा कोई,
ना नाम का शोर बच पाएगा।
सिर्फ़ इंसानियत के कुछ क़िस्से
लोगों की ज़ुबाँ पर होंगे,
तुम्हारी सच्चाई के चर्चे
हर आँगन में ज़िन्दा होंगे।
इसलिए
अपने अच्छे कामों पर विश्वास रखो,
अपने सपनों को उड़ान दो,
जो टूट गए हैं भीतर से
उन्हें फिर जीने का अरमान दो।
जीवन एक बहती नदी है,
रुकना इसका काम नहीं,
जो चलते रहते हैं निरंतर
उनके लिए कोई शाम नहीं।
अकेले आए थे इस जग में,
अकेले ही जाना होगा,
पर जाते-जाते इस दुनिया को
प्रेम का दीप जलाना होगा।
अपने हिस्से की नेकी करके
हर दिल में मुस्कान भर जाना,
क्योंकि अंत में बस इतना ही
इंसान को इंसान बन जाना।
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