गए ज़ख़्म जाग, मेरे सीने में आग, लगी साँस-साँस तपने . . .
हास्य-व्यंग्य | हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी वीरेन्द्र बहादुर सिंह1 Jan 2026 (अंक: 291, प्रथम, 2026 में प्रकाशित)
प्रेम का न कोई कारण होता है न कोई मारक। प्रेम का कोई मरण भी नहीं, प्रेम तो बस स्मरण होता है।
“मैं बिस्तर पर सोया रहूँगा,
ऐसा दिखाऊँगा जैसे
मौत दरवाज़े पर दस्तक दे रही हो।
मेरी आख़िरी साँसें चल रही होंगी,
सारे पड़ोसी जमा होंगे
मुझे आख़िरी बार देखने।
लेकिन जब वो आएगी,
तब किसी हक़ीम की ज़रूरत नहीं।
वह तो जानती ही होगी
कि मैं किस वजह से बीमार हूँ।”
यह कविता, जो यहाँ बिना किसी AI के मूल से गुजराती में उतारी गई है। दरअसल प्राचीन मिस्री (Egyptian) है। लगभग 3300 साल पुरानी!
इतनी लोकप्रिय रही होगी कि पुरातत्वविदों ने इसे अलग-अलग पुराने पपीरस, मिस्र की सभ्यता द्वारा वृक्ष की छाल से बने काग़ज़ और मिट्टी की तख़्तियों पर पाया है।
मतलब साढ़े तीन हज़ार साल पहले भी यही टीस थी कि जिसे दिल फाड़कर चाहो, वही भाव क्यों नहीं देता।
जैसे आज की क़व्वाली में गाया जाता है, “जो दवा के नाम पर दे ज़हर, वो चारागर की तलाश है।”
मिर्ज़ा ग़ालिब ने भी 200 वर्ष पहले यह दर्द झेला होगा, तभी लिखा होगा:
“पी-नस में गुज़रते हैं जो कूचे से वो मेरे,
कांधा भी कहारों को बदलने नहीं देते।”
यहाँ ‘पीनस’ अंग्रेज़ी वाला नहीं, उर्दू का ‘पालकी’ है।
मेरी महबूबा पालकी में बैठकर मेरी गली से गुज़री, कहार थककर कंधा बदलना चाहते थे, पर वह उन्हें रुकने नहीं देती, कहती, इस गली में पल भर भी ठहरना नहीं। यह उसके पुराने प्रेम का घर है। यानी उसकी बेरुख़ी ऐसी कि परदे भी नहीं ठहरते।
इसी प्रश्न को यश चोपड़ा ने ‘दिल तो पागल है’ में करिश्मा से कहलवाया, “भगवान बुरा है, दिल देता है, अहसास देता है, लेकिन उलझनें भी वही बनाता है, किसी को किसी से, किसी और को किसी तीसरे से प्यार हो जाए। कोई इंतज़ार करता रह जाए और जवाब वही, ‘आई डोंट फ़ील दैट फ़ॉर यू . . . वी आर जस्ट फ्रेंड्स’।”
और लड़कियाँ दोस्ती भी नहीं छोड़तीं, इसीलिए लड़के ‘ना-लायक’ से ‘नायक’ बनने की आस लगाए रहते हैं।
यही मुद्दा था ‘रांझणा’ में वन-साइडेड प्रेम का दाहक़ तीर और उसी का पुनर्लेखन है ‘तेरे इश्क़ में’, (लेखक: हिमांशु शेख़र, निर्देशक: आनंद एल राय, धड़कता प्रेम: धनुष . . .)
क्या कभी आपको प्रेम हुआ है?
जब नहाते हुए साबुन के झाग में कोई आकृति उभर आए तो मान लीजिए, आप प्रेम में हैं।
जब मोगरे की डाल हवा में डोल कर किसी कोमल हाथ सी लगे तो मानिए, आप प्रेम में हैं।
जब अकेले कपड़े बदलते वक़्त बिना वजह लगे कि कोई आपको निहार रहा है और रीढ़ तक एक मीठी लज्जा दौड़ जाए तो समझिए, आप प्रेम में हैं।
जब किसी के उड़ते चुंबन का निशान आपके गाल की शान बन जाए तो आप प्रेम में हैं।
किसी की ग़ैरहाजिरी में उसकी मौजूदगी महसूस होती रहे यही प्रेम है।
मिलने की तड़प, मिलने की ज़िद, यही प्रेम है।
प्रेम का कोई कारण नहीं होता, वह अकारण होता है। और फिर क़ब्र पर सूखते घास की तरह सदा बना रहता है। इसीलिए प्रेम का न कारण है, न अंत, बस स्मरण ही स्मरण। प्रेम में महबूब की आँख ही आशिक़ का दर्पण होती है। प्रेम में खो जाना, किसी की आशिक़ी में बह जाना, यह सब हर किसी के नसीब में नहीं।
क्योंकि प्रेम वह राह है जिसमें ‘ज़ेब्रा क्रासिंग’ नहीं होते। जहाँ सँभलकर चलने की अनुमति नहीं, केवल एक क्षण का बिजली सा चमत्कार और आशिक़ महबूब की आँख में मोती की तरह पिरो दिया जाता है।
उसके बाद आशिक़, महबूब की तस्बीह का एक दाना। प्रेम में तन नहीं, जतन होता है, अनवरत, अथाह, शाश्वत।
जय इश्क़ेश्वर। यह जिगर पर नक़्क़ाशी कर देने वाला लेख भैरू कवि इलियास शेख़ का है, असली, राजसी, अनमोल। जिसे ऐसा प्रेम मिले, वह सड़क का मुफ़्लिस होकर भी राजसी जीवन जी लेता है। ट्रेजेडी तब है जब प्रेम वन-वे हो, आपका सिगनल खुला हो लेकिन सामने का बंद और आप टकराकर गिर पड़ें।
इसीलिए ‘तेरे इश्क़़ में’ का एक डॉयलाग अमर रहेगा—‘प्रेम में मृत्यु है, मुक्ति नहीं।’
यह फ़िल्म रांझणा जैसी प्रभावी नहीं, पर कुछ दृश्य दिल पर निशान छोड़ते हैं। और आजकल की चिकनी-चुपड़ी breakup, फ़िल्मों के बीच यह ‘रा’ तीव्रता दुर्लभ है। इश्क़, दोस्ती और फ़्रेंडज़ोन, दिल का कड़वा गणित केतन लाखानी लिखते हैं:
“लड़का प्रेम करे और लड़की प्रेम न करे। लड़की कुछ-कुछ करे और समय आने पर दोस्ती का गाजर दे दे।
लड़का तब तक बर्बाद हो चुका होता है। यही है फ़्रेंडजोन।”
प्रेम के उस पार दुनियादारी है।
लड़की की मुस्कान पर फ़िदा क्यों होते हो? उसके स्पर्श को इतना पवित्र क्यों मानते हो? उससे बातें करते वक़्त समय क्यों ठहर जाता है? बस हुआ प्रेम। अब दूर रहो तो तरसते रहो, पास जाओ तो डूबो और लड़के डूबना ही चुनते हैं।
प्रेम में पुरुष या तो आबाद होते हैं या बरबाद, अधिकांश बरबाद। ‘तेरे इश्क़़ में’—फ़्रेंडज़ोन का विकराल रूप।
आप उसे प्रेमिका नहीं कह सकते, उसे बेवफ़ा नहीं कह सकते, उसे सुख की साझीदार तो मिलती है, लड़के के पास सिर्फ़ दिल खोलकर प्रेम करने की तैयारी। लड़का भावुक, लड़की व्यावहारिक। लड़की ग़लत नहीं, लेकिन लड़के का प्रेम इतना गहरा कि वह ‘हाँ’ भी नहीं कह पाती, क्योंकि ऐसा लाल, कच्चा, जबर प्रेम उसने कभी देखा ही नहीं। दोनों के लिए पहली बार। जहाँ प्रेम की फ़्रीक्वेंसी बहुत ऊँची हो, लड़की भी उस कम्पन से बच नहीं पाती, चाहे उसकी मर्ज़ी न हो। यही सच्चे प्रेम की ताक़त है। वह आपको तमाचा भी मार सकती है, झिड़क भी सकती है, आप इनमें से कुछ नहीं कर सकते, लेकिन आँसुओं में गुलाल घोलकर उसके गालों पर लगा सकते हैं, यह आशिक़ का हक़ है। कोई और उसकी माँग में सिंदूर भरे, पर उस गुलाल का दाग़ कभी नहीं मिटता, वह याद रखती है कि कोई आया था और बेतहाशा प्रेम करके चला गया। यह ‘तुझमें रब दिखता है’ वाला दिव्य प्रेम नहीं। यह ‘तू मेरी नहीं तो किसी और की भी नहीं’ वाला दबंग प्रेम भी नहीं। यह तो बस आँसुओं से लिखा एक सवाल है, “मुझे प्रेम हुआ तो तुम्हें क्यों नहीं?”
प्रेम का आयुष्य इस पर निर्भर करता है, वह किया गया है या हो गया है। एक को प्रेम बहुत हो, दूसरे को न हो, यह अलग बात है। कभी ऐसा भी कि एक के दरवाज़े तब खुलें, जब दूसरे का प्रेम भाप बनकर उड़ चुका हो, जैसे तुर्की फ़िल्म Aşk Mevsimi में, प्रेम दोनों को हो, पर एक ही समय पर नहीं। कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता . . . और अंत में गुलज़ार का जादू आज जब ‘लव स्टोरी’ के नाम पर क्रूर, हिंसक फ़िल्में परोसी जाती हैं, ऐसी दो फ़िल्में, ‘तेरे इश्क़़ में’ और ‘गुस्ताख़़ इश्क़़’, पुराने ज़माने की महक वापस लाती हैं। काव्यात्मक, विंटेज, नर्म।
‘गुस्ताख़़ इश्क़’ प्रेम को नहीं, बीते समय की स्मृति को प्रेम करती है, विजय वर्मा और नसीरुद्दीन शाह के पात्रों के माध्यम से। और फ़िल्म के अंत में आया वह संवाद, “इस दुनिया में सबसे फिज़ूल काम क्या है? उसके बारे में सोचना, जो आपके बारे में सोचता ही नहीं।”
जिंग थिंग (गीत-गुलज़ार, “गुस्ताख़़ इश्क़’):
“निकम्मा, बेफिजूल, मगर फिर भी क़ुबूल,
ऊल-जलूल इश्क़़ ये, ऊल-जलूल . . .”
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