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इस साल के अंत का सूत्र: वन नेशन, वन पार्टी

 

“यह चालू साल ख़त्म होने वाला है और नया साल शुरू हो रहा है तो क्या हमें कोई घोषणा करनी चाहिए?” एक नेता ने पूछा। 

बिना झिझक झूला झूलते हुए दूसरे नेताजी बोले, “अरे इसमें क्या है? जब से हमारी सरकार सत्ता में आई है, तब से देश हर साल एक साल से दूसरे साल में प्रगति करता ही जा रहा है। देश का सबसे पिछड़ा हुआ आम आदमी भी बिना किसी मेहनत या परेशानी के नए साल में प्रवेश कर जाता है। यह हमारे शासन की उपलब्धि है। इस अवसर पर जनता को लाख-लाख बधाई के संदेश वायरल कर दो।” 

“नेताजी, अब डेढ़ लाख रुपए तोला सोने के ज़माने में जनता लाख-लाख बधाइयों से नहीं मानती। इसकी जगह अरब-अरब बधाइयाँ रखें,” तीसरे नेता ने सुझाव दिया। 

चौथे नेता ने आपत्ति उठाई, “आजकल की जनता तो संदेशों से वैसे भी नहीं मानती। उन्हें तो रील बनाकर समझाना पड़ता है कि साल ख़त्म हो गया, लेकिन आप अभी ख़त्म नहीं हुए हैं, इसके लिए हमारे सक्षम, मज़बूत और दूरदर्शी शासन को धन्यवाद दीजिए।” 

पाँचवें नेता चिंता में काँपने लगे। उन्होंने कहा, “आपका मतलब यह है कि अब हमें जनता तक यह संदेश पहुँचाने के लिए रील बनाकर नाचना पड़ेगा? भाईसाहब, मैं तो वैसे ही मंच पर बैठा होता हूँ, तब भी भद्दा लगता हूँ और आप मुझे नाचने के दलदल में कहाँ उतार रहे हैं?” 

इस वाजिब चिंता की गूँज में छठे नेताजी बोले, “असल में हमारा काम तो जनता को अपनी धुन पर नचाने का है। मेरा सुझाव है कि चालू साल की पूर्णाहुति और नए साल के आगमन के अवसर पर हम ‘वन नेशन, वन पार्टी’ की घोषणा करें। राजधानी में एक भव्य पार्टी रखें। वहाँ देशभर के शीर्ष कलाकारों को बुलाकर नाच-गाना करवाएँ। सभी टीवी चैनलों को इसका लाइव प्रसारण करना होगा। सभी इन्फ़्लुएंसर्स से कह देंगे कि वे सोशल मीडिया पर इसी पार्टी की रीलें चलाकर ‘मनोरंजन कराए वही श्रेष्ठ शासन’ का संदेश ख़ुद ही फैला दें। जनता भी ख़ुश और हम भी ख़ुश।” 

सातवें नेताजी बोले, “वाह, इस पार्टी के ज़रिए हम ‘वन नेशन, वन पार्टी’ का प्रचार सूत्र बहा देंगे। फिर चुनाव प्रचार में जनता से कह सकेंगे कि विपक्ष को नेस्तनाबूद कर दो और ‘वन नेशन, वन पार्टी’ के नारे को सही अर्थों में साकार कर दो।” 

सभी नेताओं ने इस आइडिया का तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत किया, लेकिन एक नेता ने गंभीर चेहरा बनाकर कहा, “नाच-गाने की पार्टी तक तो सब ठीक है, लेकिन विपक्ष को ख़त्म करने वाली बात रहने दो। अगर विपक्ष ही नहीं रहेगा तो हर चुनाव के समय हम दूसरे नेताओं को कहाँ से तोड़कर लाएँगे? हर चुनाव में भर्ती मेले के लिए भी हमें विपक्ष की ज़रूरत तो पड़ेगी ही।” 

यह सुनते ही सभी नेताओं का पार्टी मूड ऑफ़ हो गया। 

अंत में लोकतंत्र में पार्टियाँ ही पार्टी करती हैं, जनता के हिस्से तो बस ठोकरें ही आती हैं। 

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