संपर्क और कनेक्शन
कथा साहित्य | लघुकथा वीरेन्द्र बहादुर सिंह1 Jun 2023 (अंक: 230, प्रथम, 2023 में प्रकाशित)
एक दिन ऑफ़िस में आया साइकोलॉजिस्ट यानी मनोवैज्ञानिक पारिवारिक बातें कर रहा था, तभी एक सॉफ़्टवेयर इंजीनियर युवक ने उस साइकोलॉजिस्ट से पूछा, “सर, यह संपर्क और कनेक्शन में क्या होता है?”
साइकोलॉजिस्ट ने उस युवक से पूछा, “आप के घर में कौन-कौन है?”
युवक ने कहा, “पिता का देहांत हो चुका है, माँ हैं। तीन भाई और एक बहन है। सभी की शादियाँ हो चुकी हैं।”
साइकोलॉजिस्ट ने अगला सवाल किया, “क्या आप अपनी माँ से बातें करते हैं? आपने अपनी माँ से आख़िरी बार कब बात की थी?”
“एक महीने पहले, ” सकुचाते हुए युवक ने कहा।
“आप ने आख़िरी बार परिवार के साथ बैठ कर कब बातचीत की थी या सब के साथ बैठ कर कब खाना खाया था?”
युवक ने कहा, “मैंने आख़िरी बार दो साल पहले त्योहार पर बैठ कर सब के साथ खाना खाया था और बातचीत की थी।”
“तुम सब कितने दिन साथ रहे?”
माथे पर पसीना पोंछते हुए युवक कहा, “तीन दिन . . .”
“आपने अपनी माँ के पास बैठ कर कितना समय बिताया?”
युवक अब परेशान और शर्मिंदा दिख रहा था। साइकोलॉजिस्ट ने कहा, “क्या आपने नाश्ता, दोपहर का भोजन या रात का खाना माँ के साथ किया? क्या आपने पूछा कि वह कैसी हैं? पिता की मौत के बाद उनके दिन कैसे बीत रहे हैं?”
युवक की आँखों से आँसू बहने लगे।
साइकोलॉजिस्ट ने आगे कहा, “शर्मिंदा, परेशान या उदास होने की ज़रूरत नहीं है। संपर्क और कनेक्शन यानी आपका अपनी माँ के साथ संपर्क तो है, लेकिन आप का उनसे 'कनेक्शन' नहीं है। आप उनसे जुड़े नहीं हैं। कनेक्शन दो दिलों के बीच होता है। एक साथ बैठना, भोजन करना और एक-दूसरे की देखभाल करना, छूना, हाथ मिलाना, आँख मिलाना, कुछ समय एक साथ बिताना। आप के सभी भाई-बहनों का एक-दूसरे से संपर्क तो है, लेकिन कोई कनेक्शन यानी जुड़ाव नहीं है।”
अन्य संबंधित लेख/रचनाएं
टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
हास्य-व्यंग्य आलेख-कहानी
- 10 मिनट में डिलीवरी भारतीय संस्कृति के ख़िलाफ़
- इंसानों को सीमाएँ रोकती हैं, भूतों को नहीं
- इस साल के अंत का सूत्र: वन नेशन, वन पार्टी
- कंडक्टर ने सीटी बजाई और फिर कलाकार बनकर डंका बजाया
- किसानों को राहत के बजट में 50 प्रतिशत रील के लिए
- गए ज़ख़्म जाग, मेरे सीने में आग, लगी साँस-साँस तपने . . .
- नई स्कीम घोषित: विवाह उपस्थिति सहायता अनुदान योजना
- पालिटिक्स में हँसी के लिए और प्रदूषण में खाँसी के लिए तैयार रहना पड़ता है
- पेंशन लेने का, टेंशन देने का
- प्रयोग बकनली का और बकबक नली का
- बारहवीं के बाद का बवाल
- मैच देखने का महासुख
- राजा सिंह के सहयोगी नेता नेवला कुमार के चुनाव जीतने का रहस्य
- शिक्षा में नई डिग्री—बीएलओ बीएड
- साल 3032 में शायद
- ग़रीबी, बेरोज़गारी, महँगाई, भुखमरी, भ्रष्टाचार: जंगल की अमूर्त विरासतें
कविता
- अकेला वृद्ध और सूखा पेड़
- कृष्ण की व्यथा
- जीवन
- तुम्हारा और मेरा प्यार
- नारी हूँ
- बिना पते का इतिहास
- बुढ़ापा
- बेटी हूँ
- भेड़
- मनुष्य
- माँ
- मेरा सब्ज़ीवाला
- मैं उन सड़कों पर नहीं चल सकता
- मैं तुम्हारी मीरा हूँ
- रंगमंच
- रणचंडी की पुकार
- रह गया
- रूखे तन की वेदना
- शब्द
- शीशों का नगर
- सूखा पेड़
- स्त्री क्या है?
- स्त्री मनुष्य के अलावा सब कुछ है
सामाजिक आलेख
- आज स्वामी विवेकानंद की जन्म जयंती: धर्म और भक्ति, युवा पीढ़ी, श्रद्धा, महिला जगत तथा भारत के भविष्य के बारे में उन्होंने क्या कहा . . .
- आर्टीफ़िशियल इंटेलिजेंस और बिना इंटेलिजेंस का जीवन
- क्या अब प्यार और सम्बन्ध भी डिजिटल हो जाएँगे
- ग्लोबल वर्कफ़ोर्स में जेन-ज़ी: एक कंपनी में औसतन 13 महीने की नौकरी
- तापमान भले शून्य हो पर सहनशक्ति शून्य नहीं होनी चाहिए
- नए वर्ष का संकल्प: दुख की शिकायत लेकर मत चलिए
- ब्राउन कुड़ी वेल्डर गर्ल हरपाल कौर
- हैं दीवारें गुम और छत भी नहीं है
चिन्तन
कहानी
किशोर साहित्य कहानी
ऐतिहासिक
ललित कला
बाल साहित्य कहानी
सांस्कृतिक आलेख
- अहं के आगे आस्था, श्रद्धा और निष्ठा की विजय यानी होलिका-दहन
- आसुरी शक्ति पर दैवी शक्ति की विजय-नवरात्र और दशहरा
- त्योहार के मूल को भुला कर अब लोग फ़न, फ़ूड और फ़ैशन की मस्ती में चूर
- मंगलसूत्र: महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा देने वाला वैवाहिक बंधन
- महाशिवरात्रि और शिवजी का प्रसाद भाँग
- हमें सुंदर घर बनाना तो आता है, पर उस घर में सुंदर जीवन जीना नहीं आता
लघुकथा
काम की बात
साहित्यिक आलेख
सिनेमा और साहित्य
स्वास्थ्य
सिनेमा चर्चा
- अनुराधा: कैसे दिन बीतें, कैसे बीती रतियाँ, पिया जाने न हाय . . .
- आज ख़ुश तो बहुत होगे तुम
- आशा की निराशा: शीशा हो या दिल हो आख़िर टूट जाता है
- कन्हैयालाल: कर भला तो हो भला
- काॅलेज रोमांस: सभी युवा इतनी गालियाँ क्यों देते हैं
- केतन मेहता और धीरूबेन की ‘भवनी भवाई’
- कोरा काग़ज़: तीन व्यक्तियों की भीड़ की पीड़ा
- गुड्डी: सिनेमा के ग्लेमर वर्ल्ड का असली-नक़ली
- दृष्टिभ्रम के मास्टर पीटर परेरा की मास्टरपीस ‘मिस्टर इंडिया'
- पेले और पालेकर: ‘गोल’ माल
- मिलन की रैना और ‘अभिमान’ का अंत
- मुग़ल-ए-आज़म की दूसरी अनारकली
पुस्तक चर्चा
विडियो
उपलब्ध नहीं
ऑडियो
उपलब्ध नहीं